सत्ता पर निर्भरता और वैचारिक मतिभ्रम के कारण डूब रहा कांग्रेस का जहाज
अपनी स्थापना के बाद से सबसे बुरे संगठनात्मक व राजनीतिक दौर से गुजर रही कांग्रेस को राहत मिलती दिखाई नहीं दे रही है। हिमाचल प्रदेश के क़द्दावर नेता आनंद शर्मा ने प्रदेश चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। इससे पूर्व जम्मू-कश्मीर के हेवीवेट कांग्रेसी नेता ग़ुलाम नबी आजाद ने भी प्रदेश चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष पद को छोड़ दिया था। दोनों नेताओं ने अपना उक्त पद मिलने के कुछ ही समय बाद छोड़ दिया जिसे अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता। दोनों ने ही पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र, आंतरिक चुनाव, अपमान आदि को मुद्दा बनाकर पद छोड़ा है।

गौरतलब है कि दोनों नेता कांग्रेस के असंतुष्ट जी-23 के सदस्य हैं। यह उन वरिष्ठ नेताओं का गुट है जो पार्टी की नीतियों से खुश नहीं हैं। हालाँकि कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार दोनों ही नेता अपनी भूमिका को अधिक बड़ा मानकर चल रहे थे। ग़ुलाम नबी आज़ाद जम्मू-कश्मीर में अध्यक्ष पद चाहते थे तो आनंद शर्मा की भी यही इच्छा रही होगी। अंदरखाने चाहे जो हो किन्तु इससे समाज में कांग्रेस के मृतप्रायः संगठन की पोल पुनः खुल गई है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस की दशा ऐसी ही रहने वाली है? या फिर वह पुन: उठ खड़ी होगी? वे कौन से कारक हैं जिनसे कांग्रेस पुनः जीवंत हो सकती है?
2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की प्रचंड जीत हुई और उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस लगातार हारती रही तो चिंतन शिविरों के माध्यम से पार्टी की हार के कारणों पर समीक्षा हुई। परंतु इन चिंतन शिविरों में कांग्रेस के संगठन को दुरुस्त करने से अधिक चिंता राहुल गाँधी को स्थापित करने में होने लगी। हालाँकि इस चिंता के बाद भी राहुल गाँधी पिछले 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही अध्यक्ष नहीं बन पाये हैं।
दरअसल, इस समय कांग्रेस भीषण वैचारिक द्वंद से दो-चार हो रही है। या तो वह गाँधी-नेहरू परिवार की छाया से मुक्त होकर जमीनी कार्यकर्ताओं की पार्टी बन जाये अथवा गाँधी-नेहरू परिवार के करिश्माई व्यक्तित्व से ही आगे बढ़े। हालाँकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में प्रादुर्भाव के बाद से गाँधी-नेहरू परिवार का महत्व घटा है। इसके कारण गांधी नेहरू परिवार के करिश्माई नेतृत्व पर सवालिया निशान भी लगे हैं। यहाँ तक कि हालिया उत्तर प्रदेश चुनाव में प्रियंका गाँधी नाम का ट्रम्प कार्ड भी नहीं चला। वहीं मध्य प्रदेश में कमलनाथ, राजस्थान में अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने कई बार अपनी संगठनात्मक पकड़ को दर्शाकर परिवार के एकाधिकार को चुनौती दी है।
यदि ज्योतिरादित्य सिंधिया पार्टी नहीं छोड़ते तो मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार पूरे 5 वर्ष चलती। लेकिन जहां कांग्रेस सत्ता में है, वहां उसके नेताओं का आंतरिक संघर्ष विपक्षी दलों से बड़ा संकट है। अभी जहां भी कांग्रेस की सरकार है, वहाँ आंतरिक सत्ता संघर्ष चल रहा है और जैसे-तैसे कांग्रेसी मुख्यमंत्री अपनी कुर्सी बचाये हुये हैं। पर क्या यह गर्त में जा रही पार्टी के लिये ठीक है? आखिर कांग्रेस को वह संजीवनी कब मिलेगी, जब वह अपने पुराने स्वरूप में लौटेगी?
देखा जाये तो कांग्रेस के संगठन को दुरुस्त करने की राहुल गाँधी की योजना बहुत अच्छी थी। एनएसयूआई, युवा कांग्रेस, सेवादल जैसे संगठनों में उन्होंने चुनाव की जो प्रक्रिया शुरू की थी, यदि वह पार्टी में स्वीकार की जाती तो इससे आंतरिक लोकतंत्र स्थापित होता। साथ ही ज़मीन से जुड़े कार्यकर्ता आगे आते, किन्तु नेताओं के पुत्रमोह ने राहुल गाँधी की योजना को फेल कर दिया। यहाँ तक कि पुत्रमोह में फंसे उन्हीं नेताओं ने कांग्रेस की बदहाली का आरोप भी राहुल गांधी के सिर पर मढ़ दिया।
अगली पीढ़ी में सत्ता हस्तांतरण से कांग्रेस ज़मीन से कट गई और रही-सही कसर सोशल मीडिया के बयानवीरों ने पूरी कर दी जिन्होंने इतिहास को नकारते हुये गाँधी-नेहरू के व्यक्तित्व को विकृत कर दिया। यह सच है कि गाँधी-नेहरू की भूमिका के इतर कांग्रेस का कोई अस्तित्व नहीं है और उससे भी बड़ा सच यह है कि कांग्रेस को भारतीय राजनीति से मिटाया नहीं जा सकता। पार्टी एक-दो चुनाव जीत कर प्रासंगिक तो रहेगी पर यह काफी नहीं है।
कांग्रेस पार्टी के चिंतकों को वास्तव में पार्टी के लिये चिंता करनी होगी। सत्ता सुख से परे सड़क पर संघर्ष करना होगा। अभी कांग्रेस में जितने भी असंतुष्ट नेता हैं उन्होंने हमेशा ही सत्ता सुख भोगा है, सड़क के संघर्ष की राजनीति उन्हें नहीं आती। इसके इतर भाजपा ने हमेशा संघर्ष कर अपना शीर्ष पाया है जिसमें कांग्रेस फेल हुई है। फिर बीते कुछ दशकों से कांग्रेस की मुस्लिम परस्त छवि का जो निर्माण हुआ है, उसे भी ध्वस्त कर सर्वसमाज का दल बनने की प्रक्रिया में आना भी कांग्रेस के चिंतकों के लिये बड़ा टास्क होगा।
वर्तमान में महंगाई का मुद्दा मध्यमवर्गीय समाज की कमर तोड़ रहा है किन्तु कांग्रेस के नेता नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गाँधी की पेशी के खिलाफ धरना दे रहे हैं। यह राजनीतिक स्वामीभक्ति के लिये ठीक हो सकता है किन्तु समाज में यह कृत्य चाटुकारिता की श्रेणी में आता है जिसे अब जनता सिरे से नकार देती है। इसके अलावा कांग्रेस को संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता चाहिये क्योंकि वर्तमान में पार्टी में कार्यकर्ता से अधिक नेता हो गये हैं जो उस पर बोझ बन गये हैं। आप किसी भी राज्य की कार्यकारिणी देख लें, जमीनी कार्यकर्ता गायब दिखेंगे। यदि कांग्रेस को पुनः अपना खोया जनाधार पाना है तो उसे "कार्यकर्ता सर्वोपरि" के भाव को मानना होगा।
कांग्रेस के बड़े नेताओं को भी बदलना होगा। उन्हें खुले मन से यह स्वीकार करना होगा कि उनकी राजा वाली छवि अब नहीं रही। लोकतंत्र में जितना जनता से जुड़ाव होगा, उतना ही आपका जनाधार बचा रहेगा। रही बात राहुल गाँधी की तो उनकी छवि के साथ जो कृत्य हुआ है उससे वे बेचारे लगने लगे हैं। उन्हें अपनी छवि बदलने के लिये जनता के लिये, जनता के साथ सड़क पर उतरना होगा तभी वे पार्टी अध्यक्ष बनें अन्यथा तो उनके पार्टी अध्यक्ष बनने से पार्टी का ही नुक़सान होगा।
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस दोबारा मजबूत नहीं हो सकती। हो सकती है पर उसके लिए सामंती मानसिकता, पद की लालसा, सत्ता के लिये आंतरिक संघर्ष जैसी कुरीतियों से कांग्रेस को पार पाना होगा। जो अभी असंतुष्ट हैं, वे मात्र पद न मिलने से दुःखी हैं। यदि उन्हें पद देने का रास्ता मिले तो वे आपके साथ हैं, अन्यथा वे कहीं भी जाने को तैयार हैं। कपिल सिब्बल इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं जो येन-केन-प्रकरेण सपा के माध्यम से राज्यसभा जा पहुँचे। अतः कांग्रेस ऐसे नेताओं से जल्दी पार पा ले और उनके स्थान पर जमीनी कार्यकर्ता तैयार करे ताकि उनकी कमी भी पूरी हो और वे जो नुक़सान अंदरखाने पहुँचा रहे थे, वे किनारे हों।
इन सब कार्यों में समय लगेगा किन्तु जब पार्टी का आंतरिक संगठन मजबूत होगा और पार्टी में जमीनी कार्यकर्ता होंगे तो वे जनता से सीधे कनेक्ट करेंगे। जनता ही उन्हें फिर से चुनेगी क्योंकि भारतीय राजनीति में अपवादों से परे जनता एक ही चेहरे को लम्बे समय तक देखना पसंद नहीं करती जैसे छत्तीसगढ में हुआ। बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सिर्फ इसलिए सत्ता में आ गयी क्योंकि जनता रमन सिंह को देखकर उकता गयी थी। तमाम सर्वे एजंसियों के लिए यह तर्क बहुत चौंकानेवाला था, लेकिन भारतीय लोकमानस का सच यही है।
यह भी पढ़ेंः इंडिया गेट से: हवाई घोड़े पर सवार केजरीवाल फिर बन रहे हैं मुंगेरीलाल
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
-
Silver Rate Today: चांदी फिर हुई सस्ती, अचानक 11,000 गिरे दाम, दिल्ली से पटना तक ये है 100 ग्राम सिल्वर का रेट -
3 शादियां कर चुकीं 44 साल की फेमस एक्ट्रेस ने मोहनलाल संग शूट किया ऐसा इंटीमेट सीन, रखी 2 शर्तें और फिर जो हुआ -
Iran Israel War: 'भारत युद्ध रुकवा सकता है', खामेनेई के दूत ने कही ऐसी बात, टेंशन में ट्रंप -
Khushbu Sundar: इस मुस्लिम नेता के हिंदू पति की राजनीति में एंट्री, कभी लगा था Love Jihad का आरोप -
Gold Rate Today: ईरान जंग के बीच सोना में भारी गिरावट, अबतक 16000 सस्ता! 22k और 18k का अब ये है लेटेस्ट रेट -
Balen Shah Nepal PM: पीएम मोदी के नक्शेकदम पर बालेन शाह, नेपाल में अपनाया बीजेपी का ये फॉर्मूला -
Petrol Diesel Price: आपके शहर में कितना सस्ता हुआ पेट्रोल-डीजल? ₹10 की कटौती के बाद ये रही नई रेट लिस्ट -
Iran Vs America War: कब खत्म होगा अमेरिका ईरान युद्ध, ट्रंप के विदेश मंत्री ने बता दी तारीख -
Israel-Iran War: होर्मुज के बाद अब लाल सागर बंद करने की तैयारी, ईरान के खतरनाक प्लान लीक, भारत पर क्या असर? -
Delhi Power Cut: विकेंड पर दिल्ली के आधे हिस्से में 'ब्लैकआउट', शनिवार को इन पॉश इलाकों में नहीं आएगी बिजली -
PM Kisan Yojana: 31 मार्च से पहले कर लें यह काम, वरना अटक जाएगी पीएम किसान की अगली किस्त -
Mumbai Gold Silver Rate Today: सोना-चांदी के गिरे भाव, निवेशकों का चढ़ा पारा, जाने मुंबई में कहां पहुंचा रेट?












Click it and Unblock the Notifications