इंडिया गेट से: उपराष्ट्रपति चुनाव, जाटों को मोदी की धनकड़ सौगात
केंद्र में भाजपा के राज में राजस्थान को दूसरी बार उपराष्ट्रपति मिल रहा है। जगदीप धनकड़ का नाम संभावित उम्मीदवारों की सूची में नहीं था। वह भाजपा में बहुत पुराने भी नहीं है, लेकिन अगले साल होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनाव और उन का जाट होना उन के पक्ष में समीकरण बना गया। किसान आन्दोलन में जाटों की अहम भूमिका रही है।

राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में जाट वोट काफी मायने रखता है। किसान आन्दोलन में जाटों की प्रमुख भूमिका के कारण भाजपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काफी नुकसान झेलना पड़ा था। राजस्थान में अगले साल विधानसभा चुनाव है, और वह चुनाव जीतना भाजपा के लिए बहुत ही अहम है। इसी किसान आन्दोलन में जाट नेता हनुमान बेनीवाल ने अपनी पार्टी का राजस्थान में भाजपा के साथ चल रहा गठबंधन तोड़ दिया था।
मेघालय के राज्यपाल सतपाल मलिक ने भी इस आन्दोलन के बहाने जाटों को भाजपा के खिलाफ भड़काने का काम किया। वह जाटों को भड़काने के लिए कई बार राजस्थान गए। उन्होंने एलान कर रखा है कि राज्यपाल पद से रिटायर होने के बाद वह जाटों को भाजपा के खिलाफ लामबंद करेंगे।
हालांकि इस समय राजस्थान प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया भी जाट हैं, लेकिन जाटों का ज्यादा से ज्यादा समर्थन पाने के लिए भाजपा ने यह कदम उठाया है। जाट समुदाय में जगदीप धनकड़ का सम्मान सतपाल मलिक से कहीं ज्यादा है, क्योंकि धनकड़ ने राजस्थान में जाटों को आरक्षण दिलाने के लिए उन्होंने लंबी लड़ाई लड़ी थी। राजस्थान की 200 विधानसभा सीटों में से 30 से लेकर 40 सीटों पर जाट उम्मीदवार चुनाव जीतते रहे हैं।
बाड़मेर, जोधपुर, नागौर, बीकानेर, चुरू, सीकर, झुंझुनू, और जयपुर जिलों में जाटों का अच्छा खासा प्रभाव है। राजस्थान से चार-पांच जाट सांसद हमेशा ही जीतते रहे हैं। इस लिए जाट वोटों को लुभाने का भाजपा का यह तुरुप का पत्ता सिर्फ विधानसभा चुनावों में ही कारगर साबित नहीं होगा, 2024 के लोकसभा चुनावों में भी लाभकारी होगा।
हालांकि जगदीप धनकड़ का संसदीय अनुभव सिर्फ दो साल है, जब वह जनता दल के टिकट पर झुंझुनू से 1989 से 91 तक सांसद रहे और चन्द्रशेखर सरकार में मंत्री भी रहे। फिर वह कांग्रेस में चले गए। कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ कर हारे और 2003 में भाजपा में शामिल हुए। यानि उनका भाजपा में सफर सिर्फ 19 साल का है, और इस में भी वह पांच साल राज्यपाल रह चुके। उपराष्ट्रपति का मुख्य काम राज्यसभा के सभापति के नाते सदन को सुचारू ढंग से चलाने का होता है। उनके कम संसदीय अनुभव को देखते हुए भाजपा के पास कई बेहतर विकल्प मौजूद थे। लेकिन कोई भी सत्ताधारी दल अपने किसी भी राजनीतिक फैसले में कई तरह के समीकरणों का फायदा नुक्सान देख कर ही फैसला करता है।
राज्यसभा में राजग को अभी भी स्पष्ट बहुमत नहीं है, इसलिए कई बार सभापति को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ती है। हामिद अंसारी के साथ सरकार का टकराव इसलिए बढ़ गया था, क्योंकि वह बिलों को पास करवाने में सरकार को सहयोग नहीं करते थे। एक बार नरेंद्र मोदी ने खुद उनके चेम्बर में जाकर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी थी। बिल पर वोटिंग के वक्त विपक्ष हल्ला मचा देता था और हामिद अंसारी सदन की कार्यवाही स्थगित कर देते थे। यही बात वैंकैया नायडू के दुबारा उपराष्ट्रपति बनने में बाधा बनी क्योंकि महत्त्वपूर्ण बिलों को पास करवाने के मौके पर वह उपसभापति को चेयर संभाल कर अपने चेंबर में चले जाते थे।
जगदीप धनकड़ ने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के तौर पर अक्खड़ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ आए दिन टकराव झेला है, बंगाल का अनुभव उन्हें राज्यसभा के संचालन में मददगार होगा। सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील के नाते क़ानून का अच्छा अनुभव भी उनके काम आएगा।
आदिवासी समाज की द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद किसी दलित, पिछड़े या अल्पसंख्यक को उपराष्ट्रपति बनाए जाने के कयास लगाए जा रहे थे। दलित के रूप में संघ पृष्टभूमि के थावरचंद गहलोत का नाम चल रहा था। वह भाजपा संसदीय बोर्ड के सचिव और राज्यसभा में संसदीय दल के नेता रहे हैं। अल्पसंख्यक के तौर पर आरिफ मोहम्मद खान, मुख्तार अब्बास नकवी, एस. एस. आहलुवालिया और हरदीप सिंह पुरी के नाम थे। बीच में सुमित्रा महाजन, नजमा हेपतुल्ला और अमरिंदर सिंह के नाम भी चर्चा में आते रहे, लेकिन जगदीप धनकड़ का नाम कहीं नहीं था। जगदीप धनकड़ को उम्मीदवार बनाकर मोदी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह कोई भी फैसला राजनीतिक लाभ-हानि सोचे बिना नहीं करते।
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)












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