उत्तर प्रदेश चुनाव : क्या भारतीय संदर्भ में जिन्ना स्वतंत्रता सेनानी हैं ?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जिन्ना का नाम उछाल कर वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश शुरू हो गयी है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने जिन्ना को गांधी-नेहरू-पटेल की तरह स्वतंत्रता सेनानी बता दिया। उनके सहयोगी बने ओमप्रकाश राजभर एक कदम और आगे निकल गये। उन्होंने बयान दे मारा कि अगर जिन्ना को प्रधानमंत्री बना दिया गया होता तो भारत का विभाजन नहीं हुआ होता। अब सवाल ये है कि एक भारतीय प्रांत के चुनाव से पहले जिन्ना का जिक्र क्यों किया गया ? जिस जिन्ना को भारत विभाजन के लिए जिम्मेदार माना जाता है, उसकी तरफदारी क्यों ? क्या वोट की राजनीति के लिए ऐसा किया जा रहा है ? इस देश में किस्म-किस्म का इतिहास लिखा गया। वामपंथियों, दक्षिणपंथियों और अंग्रेजों ने इतिहास को अपने-अपने हिसाब से लिखा। किसने तटस्थ हो कर लिखा और किसने पूर्वाग्रह के साथ, कहना मुश्किल है। अब जैसे अखिलेश यादव ने मोहम्मद अली जिन्ना को गांधी-नेहरू-पटेल की तरह स्वतंत्रता सेनानी बता दिया। लेकिन दूसरी तरफ चर्चित लेखक डोमिनीक लेपिएर और लैरी कॉलिंस ने जिन्ना को जिद्दी और भारत विभाजन के लिए जिम्मेदार माना है। वे अपनी किताब फ्रीडम एट मिट नाइट में लिखते हैं, “जिन्ना मुसलमानों का मसीहा था... जिद्दी और कठोर.. जिन्ना ने कसम खायी थी, हम भारत को बांट कर रहेंगे... या फिर इसे.... कर देंगे..।”( पृष्ठ संख्या-31)

लेपिएर और कॉलिंस की नजर में भारत की आजादी
डोमिनिक लेपिएर फ्रांस के रहने वाले थे जब कि लैरी कॉलिंस अमेरिका के। लेकिन इनकी जोड़ी ने आधुनिक विश्व इतिहास की चर्चित पुस्तकें लिखीं हैं। इज पेरिस बर्निंग, ओ जेरुशलम, फ्रीडम एट मिड नाइट इनकी विश्व विख्यात पुस्तकें हैं। फ्रीडम एट मिडनाइट में उन्होंने बताया है कि किन राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के बीच भारत को आजादी मिली थी। इस किताब में लार्ड माउंटबेटन को नायक के रूप में दिखाया गया है। इस दौरान लेपिएर और कॉलिंस ने महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना और ब्रिटिश राजशाही का अपने नजरिये से चित्रण किया है। लेकिन सवाल यह है कि भारतीय संदर्भ में यह लेखकीय जोड़ी कितनी विश्वसनीय हैं ? इस संदर्भ में एक तथ्य का उल्लेख किया जा सकता है। 2008 में जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तब भारत सरकार ने गणतंत्र दिवस के मौके पर डोमिनीक लेपिएर को पद्मभूषण से सम्मानित किया था। अनु प्रकाशन ने फ्रीडम एट मिड नाइट का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया है। हिंदी अनुवाद किया है मनहर चौहान ने। इस किताब के आधार पर समझते हैं कि 15 गस्त 1947 के पहले गांधी जी और जिन्ना क्या भूमिका थी।
आजादी से पहले की परिस्थितियां
डोमिनीक लेपिएर और लैरी कॉलिंस लिखते हैं, ब्रिटेन में 1945 में चुनाव हुआ जिसमें विंस्टन चर्चिल की कंजरवेटिव पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। चर्चिल का मानना था कि जब तक अंग्रेजों का भारत में राज है तब तक दुनिया में इंग्लैंड की साख पर कोई आंच नहीं आ सकती... वह गांधी जी और उनके अनुयायियों को 'फालतू लोग’ समझता था... लेबर पार्टी के क्लिमेंट एटली प्रधानमंत्री बने... एक दिन एटली ने हाउस ऑफ कॉमंस (लोकसभा) में एक प्रस्ताव रखा... उसने वह ऐतिहासिक घोषणा पढ़ कर सुनायी तो सदन में ठंडक छा गयी... महामना सम्राट की सरकार ने भारत का शासन वहीं के किसी योग्य हाथों में सौंप देने का निर्णय लिया है... सरकार उन सभी आवश्यक कदमों को उठाना चाहती है ताकि जून 1948 तक शक्तियों का हस्तांतरण हो जाए... भारी बहुमत से यह प्रस्ताव पारित हो गया.... एटली ने मोहनदास गांधी की एक ऐसी सलाह (भारत को भगवान भरोसे छोड़ दो) मान ली जो सिर्फ गांधी जैसा..... आदमी ही दे सकता था.... । (पृष्ठ संख्या-57)
गृह युद्ध में फंसे भारत का विभाजन !
लार्ड माउंटबेटन अंतिम वायसराय बन कर भारत आये थे... माउंटबेटन को इंग्लैंड में ही सावधान कर दिया गया था कि भारत तेजी से गृहयुद्ध की तरफ बढ़ रहा है... भारत की दशा उस जहाज जैसी है जिसमें से आग की लपटें धू-धू कर उठ रही हैं और जिसके गर्भ में बारूद भरा हुआ हो... जातीय दंगों की ताकत सैन्य ताकत से भी आगे बढ़ चुकी थी... जिस कांग्रेस और मुस्लिम लीग के सहयोग से भारत का ढांचा खड़ा किया जाना था उनमें जबर्दस्त मनमुटाव था...( पृष्ठ संख्या -74)। इस तरह लेपिएर और कॉलिंस ने आजादी से पहले के भारत की तस्वीर खींची थी। उन्होंने जवाहर लाल नेहरू को अधार्मिक व्यक्ति करार दिया था और भारत जैसे धार्मिक देश की सत्ता सौंपे जाने पर आश्चर्य प्रगट किया था। उस वक्त जवाहर लाल ने खुलेआम कहा था कि वे आस्तिक नहीं हैं। लेकिन इन दोनों लेखकों ने जवाहर लाल नेहरू को श्रेष्ठ वक्ता और लेखक माना है।

“तो पूरा भारत जिन्ना को दे दो”
“अभी कल-परसों ही प्रार्थना सभा में गांधी जी ने कहा था, जब तक मैं जिंदा हूं, भारत का विभाजन नहीं होने दूंगा... तब माउंटबेटन ने पूछा, विभाजन के अलावा क्या आपके पास कोई अन्य उपाय है ? तब गांधी ने कहा, हां है... उन्होंने राजा सोलोमन की तरह सोच रखा था, बच्चे को काट कर आधा-आधा न बांटो। पूरा बच्चा ही मुसलमानों को दे दो... जिन्ना अपनी मुस्लिम लीग के साथ आएं और सरकार बनाएं... भारत का मात्र एक टुकड़ा जिन्ना को क्यों दिया जाए ?... क्यों न पूरा भारत दे दिया जाय ? यह सुन कर माउंटबेटन आश्चर्य के साथ गांधी जी की र देखने लगे... गांधी जी का यह प्रस्ताव सुन कर माउंटबेटन ने पूछा, क्या कांग्रेस इस विचार को मान लेगी? तब गांधी जी ने कहा, कांग्रेस की केवल इतना चाहती है कि भारत का विभाजन नहीं हो। माउंटबेटन ने फिर सवाल किया, इस प्रस्ताव पर जिन्ना क्या कहेंगे तब गांधी जी ने जवाब दिया, अगर जिन्ना को ये मालूम हुआ कि यह प्रस्ताव मैंने दिया है तो वे कहेंगे, यह गांधी की मक्कारी की हद है। इतना कह कर गांधी जोर से हंस पड़े।”(पृष्ठ संख्या-85)
जिन्ना का विवादास्पद चित्रण
इस किताब में जिन्ना का भी चरित्र चित्रण किया गया है। पृष्ठ संख्या 93-94 पर उनके बारे में विस्तार से लिखा गया है। दोनों लेखकों के मुताबिक, जब जिन्ना बैरिस्टरी पढ़ कर लंदन से लौटे तो वे अभारतीय बन कर लौटे और पक्के अंग्रेज बन चुके थे। इस किताब में जिन्ना के संदर्भ में कई विवादास्पद बातें लिखीं गयी हैं। ऐसे में अगर कोई भारतीय जिन्ना को स्वतंत्रता सेनानी मानता है तो यह आश्चर्य का ही विषय है।
(पुस्तक- आधी रात को आजादी, लेखक- डोमिनीक लेपिएर, लैरी कॉलिंस, अनुवाद- मनहर चौहान, प्रकाशक- अनु प्रकाशन से साभार)
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