UP By-election: उत्तर प्रदेश में मुस्लिम सियासत की भावी पटकथा लिखेंगे उपचुनाव के नतीजे
यूपी में लोकसभा की मैनपुरी और विधानसभा की रामपुर एवं मुजफ्फरनगर की खतौली सीटों के उप चुनाव परिणाम प्रदेश की भावी राजनीति का संकेत देंगे। मैनपुरी में यादव राजनीति की प्रतिष्ठा दांव पर है।

UP By-election: प्रदेश की सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाले जिले रामपुर की रामपुर विधानसभा सीट के मतदाता आजम खां के साथ अब भी पहले की तरह मजबूती से खड़े हैं या नहीं? पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में श्रद्धा हत्याकांड जैसी घटनाओं ने एक दशक पहले हुए मुजफ्फरनगर दंगे के घावों को लोगों के दिल व दिमाग में फिर ताजा कर दिया है या नहीं? कारण, मुजफ्फरनगर दंगे की पृष्ठभूमि भी हूबहू न सही लेकिन इसी तरह की मानसिकता को लेकर घटी घटना थी।
ये ऐसे सवाल हैं जो उत्तर प्रदेश में तीन सीटों पर हुए उपचुनाव के बाद उठ रहे हैं। इन उपचुनाव की सीटें भले ही गिनती की तीन हों लेकिन समीकरणों के मद्देनजर इनके नतीजे पार्टी व प्रत्याशी की जीत-हार से ज्यादा प्रदेश में मुस्लिम राजनीति के भविष्य की भूमिका तय करते नजर आ रहे हैं।
सीटें तीन लेकिन सियासी सरोकारों का विस्तार
तीनों सीटों के सियासी सरोकार प्रदेश की सियासत के लिहाज से काफी गहरे और विस्तार लिए हैं, जो एक तरह से प्रदेश में बीते चार दशक की राजनीति का प्रतीक बनकर उभरे हैं। इनमें जातीय समीकरण भी महत्वपूर्ण दिख रहे हैं और हिंदुत्व की राजनीति के भी नए आयाम छिपे नजर आ रहे हैं।
लोकसभा की मैनपुरी सीट स्व. मुलायम सिंह यादव की विरासत एवं सियासत से जुड़ी होने के कारण यहां का परिणाम यादव परिवार की अपने गढ़ में ताकत का पैमाना बन गई है। पर, इससे ज्यादा इस सीट के नतीजे की प्रासंगिकता समाजवादी पार्टी की जातीय गोलबंदी या पिछड़ों पर पकड़ की कसौटी से जुड़ी दिख रही है।
वहीं विधानसभा की रामपुर सीट सपा के प्रमुख मुस्लिम चेहरे आजम खां के अस्तित्व से जुड़ी होने के साथ पार्टी की मुस्लिमों पर पकड़ के पैमाने का भी प्रतीक बन गई है। खतौली सीट जिस पर सपा गठबंधन में शामिल राष्ट्रीय लोकदल का उम्मीदवार लड़ रहा है उसका मुजफ्फरनगर जिले में होना ही अपने आप में सियासी सरोकारों को विस्तार दे रहा है।
मुजफ्फरनगर दंगा और सपा की मुस्लिम राजनीति
मुजफ्फरनगर दंगे के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एवं आजम खां का रवैया भाजपा के लिए समाजवादी पार्टी पर हमले का मुख्य हथियार बन गया था। इस दंगे ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे प्रदेश में हिंदुओं के भाजपा के पक्ष में गोलबंदी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
रामपुर प्रदेश का सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला जिला है। जिस रामपुर सीट पर चुनाव हो रहा है वहां के लगभग पौने चार लाख मतदाताओं में आधे से ज्यादा मुस्लिम हैं। जाहिर है कि इन उप चुनावों के नतीजे जीत हार से ज्यादा प्रदेश की मुस्लिम सियासत की दिशा तय करते दिख रहे हैं। इन दो सीटों के नतीजे 2024 के मद्देनजर तो प्रदेश के भविष्य के सियासी समीकरणों की भूमिका तय ही करेंगे, भाजपा या सपा के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त दिलाने या चुनौती बढ़ाने वाले भी होंगे। इन दो सीटों के चुनाव परिणाम प्रदेश की लगभग 19 प्रतिशत मुस्लिम आबादी की भविष्य की राजनीति के लिए एक तरह से उत्प्रेरक की भूमिका भी निभा सकते हैं।
इसलिए मुस्लिम सियासत का भविष्य अहम
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. ए.पी. तिवारी कहते हैं कि इन चुनावों में किसी भी सीट पर बसपा और कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं। मुकाबला सीधा सपा बनाम भाजपा है। ऐसे में नतीजों से यह बात स्पष्ट रूप से सामने आ जाएगी कि वर्तमान परिस्थितियों में मुस्लिम मतदाता के दिल और दिमाग में क्या चल रहा है। वह पूरी एकजुटता से सपा के साथ खड़ा है या भाजपा की कल्याणकारी योजनाओं ने मुसलमानों के बीच भी एक ऐसा वर्ग बनाना शुरू कर दिया है जो मोदी योगी के कामकाज के बाद हिंदुत्ववादी पार्टी कही जाने वाली भाजपा के बारे में भी सोचने लगा है। भले ही यह प्रतिशत अभी कम हो लेकिन इससे संकेत मिलेगा कि वह भविष्य के लिए किसी अन्य विकल्प के बारे में भी सोच रहा है।
प्रो. तिवारी की बात सही है। तीन दशक से सपा के मुस्लिम सियासत के चेहरे आजम खां पर इस समय कानून का शिकंजा कसा हुआ है। उनकी विधानसभा सदस्यता भी रद्द हो चुकी है। ऐसे में रामपुर का नतीजा मुस्लिम मन का संकेत माना जा रहा है, जो बताएगा कि आजम पर लगे आरोपों ने मुसलमानों के बीच उनकी प्रासंगिकता को कमजोर कर दिया है या उनकी वही पकड़-पहुंच बनी हुई है जिसके दम पर उनका रामपुर सीट पर चार दशक से ज्यादा वक्त से दबदबा चला आ रहा है।
कुल मिलाकर इन चुनावों में सपा यदि अपनी परंपरागत मैनपुरी और रामपुर सीट बरकरार नहीं रख पाती हैं तो इसका अर्थ होगा कि 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर प्रदेश का मुस्लिम मतदाता विकल्प की तलाश करता नजर आ रहा है। पर, यदि इन सीटों पर सपा जीत हासिल कर लेती है तो उसकी न सिर्फ मुस्लिम मतदाताओं पर पकड़ बढ़ेगी बल्कि बसपा और कांग्रेस के लिए प्रदेश में राजनीतिक चुनौती और बढ़ जाएगी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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