UP Rajya Sabha Elections: भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग के बीच आठवां उम्मीदवार

UP Rajya Sabha Elections: मंडल की राजनीति वालों के लिए यह सोचने का विषय है कि उनकी राजनीति कमंडल में कैसे जा मिली है| न तो बिहार में मंडल की राजनीति करने वाले लालू यादव का परिवार पिछले 18 साल से अपने बूते पर कभी सत्ता में आ पाया है, न उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव का परिवार पिछले सात साल से सत्ता में है|

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इन दोनों ही राज्यों में पिछड़ों में सबसे बड़ी और ताकतवर जाति यादवों ने पिछड़ी जातियों में सत्ता का बंटवारा नहीं किया| इन दोनों ही राज्यों में मंडल राजनीति वालों ने एमवाई समीकरण को ज्यादा अहमियत दी| यानि मुस्लिम यादव का समीकरण बनाया, जिससे अति पिछड़ी अन्य जातियां सत्ता से ही नहीं, बल्कि आरक्षण के अधिकार से भी वंचित रही|

UP Rajya Sabha Election Eighth candidate amid BJPs social engineering

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने कमंडल की राजनीति के समांतर सोशल इंजीनियरिंग शुरू कर दी| गोविन्दाचार्य 1988 में भाजपा के महासचिव बने थे, मंडल आयोग की सिफारिशों का लागू होना और बाबरी ढांचा टूटने की दोनों घटनाएं उनके महासचिव रहते हुए ही हुई थीं| वह भले ही तमिल मूल के थे, लेकिन उनका बचपन और जवानी पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही बीती, उनकी सारी शिक्षा दीक्षा उत्तर प्रदेश में ही हुई थी| उत्तर प्रदेश और बिहार की जातीय राजनीति को वह अच्छी तरह समझते थे, इसलिए उन्होंने उत्तर प्रदेश और बिहार में सोशल इंजीनियरिंग की ऐसी रूपरेखा बनाई, जिसने भले ही देर से, लेकिन अंतत: मंडल की राजनीति पर विजय हासिल कर ली|

भले ही अटल बिहारी वाजपेयी से मतभेदों के कारण के.एन. गोविन्दाचार्य को 2000 में भाजपा छोड़नी पड़ी, लेकिन वह भाजपा के भीतर सोशल इंजीनियरिंग का बीज बो गए थे| जब गोविन्दाचार्य पार्टी के महासचिव थे, तभी नरेंद्र मोदी गुजरात से शिफ्ट हो कर पार्टी की राष्ट्रीय टीम में शामिल हुए थे|

UP Rajya Sabha Election Eighth candidate amid BJPs social engineering

2001 में गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने गोविन्दाचार्य की सोशल इंजीनियरिंग को पार्टी में आगे बढ़ाया| 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से उन्होंने पार्टी में छोटी छोटी पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधियों को जोड़ना शुरू किया, जातियों में प्रभाव रखने वाले नेताओं को पार्टी में शामिल करवाने या उनकी पार्टियों को एनडीए में शामिल करवाने की मुहिम चलाई गई| जिसका पहला प्रयोग तो 2014 के लोकसभा चुनाव में ही हो गया था, 2017 में सोशल इंजीनियरिंग के बूते ही भाजपा उत्तर प्रदेश में सत्ता में आ गई|

जहां भाजपा सभी पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ने के बाद संगठन और सत्ता में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने का काम कर रही है, वहीं बिहार में लालू यादव का राष्ट्रीय जनता दल और उत्तर प्रदेश में मुलायम यादव की समाजवादी पार्टी अपने ही परिवारों को बढ़ावा देने वाली पार्टियां बन कर रह गई|

अभी उत्तर प्रदेश का ताजा उदाहरण ही लेते हैं| अखिलेश यादव बात तो पीडीए यानि पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक की करते हैं, लेकिन राज्यसभा की तीन सीटों के लिए उन्होंने दो अगड़ी जातियों के नेताओं को और एक दलित नेता को टिकट दिया| वह भी मजबूरी में, क्योंकि पहले मायावती से गठबंधन टूटने और अब जयंत चौधरी के भाजपा के साथ चले जाने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन्हें दलित वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए किसी दलित को आगे बढ़ाने की जरूरत थी|

अखिलेश ने दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले रामजी लाल सुमन को टिकट दिया है, वह समाजवादी पार्टी के पुराने नेता और चार बार के सांसद रहे हैं| उनका आगरा, अलीगढ़, हाथरस और फिरोजाबाद के दलित समुदाय में अच्छा असर है| 1977, 1989, 1999 और 2004 में वह फिरोजाबाद सीट से लोकसभा चुनाव जीते थे| लेकिन 2014 और 2019 में हाथरस से लगातार दो बार लोकसभा चुनाव हारे|

दूसरी तरफ भाजपा ने आसानी से जीतने वाली सात सीटों पर उम्मीदवार तय करते समय सोशल इंजीनियरिंग का पूरा ध्यान रखा| भाजपा ने चार उम्मीदवार पिछड़े वर्ग से उतारे हैं| पिछड़े वर्ग में कुर्मी, जाट, बिंद और मौर्य को भाजपा का वोट बैंक माना जाता है| कुर्मी वोट बैंक को साधने के लिए कांग्रेस से आए पूर्वांचल के कुर्मी नेता आरपीएन सिंह को उम्मीदवार बनाया गया है| वहीं कुशवाहा, शाक्य, सैनी वोट बैंक को साधने के लिए अमरपाल मौर्य को टिकट दिया है|

इसी तरह एक तरफ तो जाट वोट बैंक साधने के लिए जयंत चौधरी से गठबंधन किया गया है, तो दूसरी तरफ मथुरा में जाट कार्ड खेलते हुए भाजपा ने पूर्व सांसद तेजवीर सिंह को मैदान में उतारा है| पूर्वांचल में बिंद मतदाताओं को साधने के लिए पार्टी ने संगीता बलवंत बिंद को राज्यसभा भेजने का फैसला किया है, वैश्य समाज से नवीन जैन को टिकट दिया है, तो ब्राह्मण समाज से सुधांशु त्रिवेदी को ही दोबारा टिकट दिया गया है| इसी तरह चंदौली से राजपूत समाज की साधना सिंह को टिकट दिया गया है| इस तरह ओबीसी और राजपूत वर्ग से दो महिलाएं भी हो गईं| यह है भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग|

विधानसभा सीटों के हिसाब से देखें तो भाजपा सात और समाजवादी पार्टी तीन सीटों पर बिना मतदान के ही जीतने की स्थिति में थी| लेकिन अखिलेश यादव की ओर से जया बच्चन को पांचवी बार और पूर्व आईएएस अफसर आलोक रंजन को टिकट देने से सपा में असंतोष व्याप्त हो गया है, इस असंतोष को देखते हुए भाजपा ने आठवाँ उम्मीदवार उतार दिया है|

उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए फर्स्ट प्रिफरेंस के 37 विधायकों की जरूरत है| 403 सदस्यीय विधानसभा में चार सीटें खाली हैं, बाकी 399 सीटों में भाजपा के 252, भाजपा के सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) के 13, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के छह और निषाद पार्टी के छह सदस्य हैं| जयंत चौधरी की पार्टी रालोद के 9 विधायक भी जोड़ दें तो कुल संख्या 286 वोट हैं| इस तरह 259 विधायकों की पहली वरीयता से सात उम्मीदवारों की आसान जीत के बाद भाजपा के पास 27 वोट बच जाते हैं|

दूसरी तरफ सपा को तीनों उमीदवार जिताने के लिए 111 विधायकों की जरूरत है। सपा के 108 और कांग्रेस के दो सदस्य हैं, उन्हें सिर्फ एक विधायक के फर्स्ट प्रिफरेंस की जरूरत है| जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के दो और बसपा का एक सदस्य है, इन तीनों में से एक वोट का जुगाड़ करना कोई मुश्किल नहीं| लेकिन अपना दल कमेरावादी की नेता पल्लवी पटेल की नाराजगी और स्वामी प्रसाद मौर्य के महासचिव पद से इस्तीफे ने अखिलेश यादव और सपा का संकट बढ़ा दिया है|

पल्लवी पटेल हालांकि सपा की टिकट पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन उन्होंने एलान कर दिया है कि वह सपा के राज्यसभा चुनाव के प्रत्याशियों से नाखुश हैं| अखिलेश की पीडीए रणनीति पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा है कि जया बच्चन और आलोक पीडीए नहीं हैं| उन्होंने सपा उम्मीदवारों को वोट नहीं देने का एलान भी कर दिया है, इससे सपा प्रमुख की मुश्किलें बढ़ गई हैं|

उधर अतीक अहमद का बेटा अब्बास अंसारी सुभासपा का विधायक है, यह पार्टी हाल ही में समाजवादी पार्टी का साथ छोड़कर भाजपा से जा मिली है| अब्बास अंसारी का वोट समाजवादी पार्टी को मिल सकता है, इसके अलावा जयंत चौधरी की आरएलडी के नौ विधायकों में से भी तीन-चार विधायक आरएलडी के भाजपा से गठबंधन से नाराज बताए जा रहे हैं| लेकिन भाजपा ने आठवाँ उम्मीदवार खड़ा करके उत्तर प्रदेश के राज्यसभा चुनाव को बहुत ही दिलचस्प बना दिया है| संजय सेठ ने आठवें उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल कर दिया है|

एक तरफ जया बच्चन और आलोक रंजन को टिकट देने से सपा से क्रास वोटिंग की आशंका है, तो दूसरी तरफ ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा के अब्बास अंसारी और जयंत चौधरी की आरएलडी के नाराज विधायकों की क्रास वोटिंग की आशंका से चुनाव बड़ा ही दिलचस्प हो गया है| अब भाजपा के सात और सपा के दो उम्मीदवार तो आसानी से जीत जाएंगे, लेकिन दसवीं सीट के लिए चुनाव रोचक होगा| देखते हैं जनसत्ता पार्टी के दो विधायक और बसपा के एक विधायक का क्या रूख होगा|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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