Uttar Pradesh Congress: यूपी में कांग्रेस को लड़ने से पहले खड़े होने की चुनौती
Uttar Pradesh Congress: उत्तर प्रदेश में भाजपा का मुकाबला कांग्रेस, सपा और रालोद मिलकर करेंगे या फिर अलग-अलग लड़ेंगे, यह अभी तय नहीं हुआ है। सीट के बंटवारे को लेकर भी राह इतनी आसान नहीं रहने वाली है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की कोशिश भले ही चल रही हो, लेकिन प्रादेशिक स्तर पर गठबंधन में शामिल कई दलों की सियासत एक दूसरे के विरोध पर टिकी हुई है। तीन बैठकों के बाद भी गठबंधन की तस्वीर साफ नहीं है। ऐसे में विपक्षी गठबंधन कोई मजबूत शक्ल ले पायेगा, और सीटों का बंटवारा आसानी से हो पायेगा, यह बड़ा सवाल है।
गठबंधन के सवालों के इतर कांग्रेस ने अजय राय को अध्यक्ष बनाकर उन अगड़ों को संदेश देने और जोड़ने की कोशिश की है, जो फिलहाल भाजपा खेमे में खुद को असहज पा रहा है। दरअसल, भाजपा दिल्ली की सत्ता में वापसी के लिये पिछड़ों का जनाधार मजबूत करने में लगी हुई है। ओबीसी वर्ग के नेताओं को पार्टी के भीतर प्रमुखता दी जा रही है। कांग्रेस इसी को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रही है। अगर भाजपा का जोर पिछड़ों पर है तो कांग्रेस का प्रयास अपने पुराने जिताऊ कॉम्बिनेशन ब्राह्मण, दलित और मुसलमान को अपने पाले में लाने का है।

भाजपा में दरकिनार किये जाने से नाराज सवर्ण वोटर भी विकल्प तलाश रहा है। घोसी उपचुनाव में सवर्ण मतदाता ने खुलकर सपा गठबंधन के पक्ष में अपना मत देकर संकेत भी दे दिया है कि वह भाजपा का बंधुआ नहीं है। जबकि विधानसभा चुनाव के दौरान यह वर्ग भाजपा के साथ था। बहरहाल, इस स्थिति के बाद भी कांग्रेस की राह इतनी आसान नहीं है। सवर्ण वोटरों का भरोसा जीतना कांग्रेस के लिये सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति सवर्णों के नजदीक आने की राह में सबसे बड़ी बाधा मानी जाती रही है। यह स्थिति ध्रुवीकरण बढ़ाती है, जिससे कांग्रेस को नुकसान होता है।
लेकिन भाजपा से लड़ने से पहले कांग्रेस के सामने यूपी में अपने संगठन को जमीन पर खड़ा करने की असल चुनौती है। सबसे ज्यादा सदस्यों वाली भाजपा को मात देने के लिए कांग्रेस को भी उसी स्तर की तैयारी की जरूरत है। हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास इतनी ताकत नहीं बची है कि वह अपने बूते किसी भी चुनाव में चमत्कार कर सके। कांग्रेस को प्रदेश के सभी बूथों पर कार्यकर्ता मिलना तक मुश्किल है। जाहिर है, जब तक कांग्रेस बूथ स्तर पर खुद को मजबूत नहीं करेगी, तब तक किसी बड़े बदलाव की संभावना नहीं है।
उदाहरण के तौर पर देखें तो विधानसभा चुनाव से पहले तत्कालीन अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार सड़कों पर रही। कांग्रेस आंदोलनों के जरिए भाजपा सरकार को बैकफुट पर ढकेलने की कोशिश करती रही। सपा की बजाय कांग्रेस ही यूपी में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में दिखी। कांग्रेस महासचिव एवं यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी राज्य में घटित तमाम घटनाओं पर योगी सरकार को घेरने का प्रयास किया। आंदोलन किया तथा राज्य के माहौल को गरमाने की पूरी कोशिश की, लेकिन जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आये तो कांग्रेस अपने राजनीतिक इतिहास के सबसे खराब दौर में पहुंच गई।
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के मात्र दो विधायक ही चुनाव जीत पाये। दोनों ही विधायक पार्टी की बजाय खुद की पकड़ की बदौलत विधानसभा पहुंचने में सफल हुए। कांग्रेस का वोट प्रतिशत भी सात फीसदी से सिमटकर तीन फीसदी पर पहुंच गया। दरअसल, कांग्रेस को यूपी में फिर से जिंदा करने के लिये केवल तेजतर्रार अध्यक्ष से काम नहीं बनने वाला है बल्कि इसके लिये जनता के एक बड़े वर्ग का भरोसा भी जीतना होगा, जो बहुत आसान नहीं है। अजय राय कांग्रेस के सक्रिय नेताओं में गिने जाते हैं, लेकिन उनका प्रभाव क्षेत्र बनारस तक ही सीमित है तथा उनकी जाति के वोटरों की संख्या भी पूरे प्रदेश में सियासी रूप से अप्रभावी है।
यह भी एक तथ्य है कि केवल आंदोलन से कार्यकर्ताओं को सक्रिय नहीं किया जा सकता है। संगठन को भी गति देनी होगी। संगठन के स्तर पर अजय राय को काम करने का कोई विशेष अनुभव नहीं है, ना ही उनके सांगठनिक कौशल की कभी परीक्षा हुई है। बीते वर्ष उन्हें जोनल अध्यक्ष बनाया गया था, लेकिन अपने जोन में कांग्रेस को फिर से खड़ा करने का प्रयास करते उन्हें नहीं देखा गया। विधानसभा चुनाव से पहले प्रियंका गांधी वाड्रा भी यूपी में खासी सक्रिय रहीं, लेकिन विधानसभा में मिली करारी हार के बाद उन्होंने भी इस राज्य से मुंह मोड़ लिया है।
ऐसी स्थिति में कांग्रेस को खड़ा करना अजय राय के लिये बहुत बड़ी चुनौती बनने वाली है। यूपी की सत्ता से कांग्रेस जब से बाहर हुई है, उसका ग्राफ लगातार गिरता जा रहा है। वर्ष 2009 में कांग्रेस ने भले ही यूपी में 21 सीटें जीती हों, उसके बाद के चुनावों में वह क्रमश: दो एवं एक सीट पर सिमट गई। अजय राय के सामने एक और बड़ी चुनौती गठबंधन में सीटों का बंटवारा भी है। कांग्रेस की मंशा 2009 को आधार मानकर सीटों का बंटवारा करने पर है, लेकिन सियासी जानकार कहते हैं कि अखिलेश यादव 2014 के आधार पर कांग्रेस को सीट देने की पेशकश कर सकते हैं।
गठबंधन की राह में सपा की महत्वाकांक्षा से निपटना भी कड़ी चुनौती है। लोकसभा चुनाव में गठबंधन से पहले सपा मध्य प्रदेश एवं राजस्थान के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन चाहती है। अतीत में सपा इन दोनों राज्यों में कुछ सीटें जीतती रही है। इस बार उसे लग रहा है कि मध्य प्रदेश में सपा सरकार का हिस्सा बन सकती है। सपा की कोशिश है कि कांग्रेस दोनों राज्यों में बड़ा दिल दिखाते हुए कुछ सीटें गठबंधन के तहत उसे भी दे ताकि वह भी सरकार बनने की स्थिति में सत्ता का हिस्सा बन सके। अब देखना है कि कांग्रेस इस पर क्या रवैया अपनाती है। उसके कदम पर ही यूपी में गठबंधन का भविष्य टिका हुआ है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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