Atique Ahmed News: एक माफिया का मीडिया वैल्यू इतना हाई क्यों है भाई?
मीडिया किसी शेयर मार्केट की तरह होता है। यहां नामी लोगों की मार्केट वैल्यू चढ़ती उतरती है। फिलहाल एक माफिया अतीक अहमद की मीडिया वैल्यू इस समय हाई है।

Atique Ahmed News: मीडिया की अपनी वैल्यू क्या होती है इसका अंदाज आप इस बात से लगा सकते हैं कि आज के इलेक्ट्रॉनिक दौर में उसकेे कारण ही लोगों की वैल्यू बनती या बिगड़ती है। मीडिया एक शेयर बाजार की तरह होता है जहां किसी के व्यक्तित्व का भाव चढ़ और उतरता है। और ऐसा सिर्फ राजनेता या फिल्म कलाकार को लेकर नहीं होता। माफिया, क्रिमिनल, बिजनेसमैन, आर्टिस्ट या फिर जन सामान्य का जो कोई भी मीडिया में सुर्खियों में आ जाता है, उसकी मार्केट वैल्यू बढ़ जाती है। जैसे इस समय माफिया अतीक अहमद की बढ़ गयी है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जब सामूहिक रुप से किसी को रिपोर्ट करता है तब किसी एक चैनल या वेबसाइट का सवाल नहीं रह जाता कि वह उस भीड़ के साथ है या नहीं। अगर किसी शेयर का भाव बहुत बढ़ जाता है तो हर कोई चाहता है कि कुछ हिस्सा उसके पास भी आ जाए। उस समय किसी एक खास मीडिया हाउस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। लेकिन मीडिया की मंडी में सामूहिक रूप से किसी का शेयर कैसे बढ़ता घटता है?
इसे जन सामान्य के लिए समझना मुश्किल होता है। कई दफा तो मीडिया के लोग भी इस बात को नहीं समझ पाते। एक इवेन्ट आता है और वो उसे फॉलो करने लगते हैं। उस समय क्योंकि उस न्यूज या इवेन्ट के बारे में ज्यादा से ज्यादा पढ़ा या देखा जा रहा होता है इसलिए बहती न्यूज गंगा में जो गोता लगाता है वह पवित्र हो जाता है।
लेकिन ऐसी न्यूज गंगा में कई बार मगरमच्छों की मार्केट वैल्यू भी बढ़ जाती है। जैसे अतीक अहमद की अहमदाबाद से इलाहाबाद (प्रयागराज) तक की सड़क यात्रा को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने गांधी की दांडी यात्रा बना दिया। 24 घंटे की यात्रा को कवर करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने विशेष 'प्रबंध' किये। सवाल उठता है कि यह विशेष प्रबंध क्यों? क्या वह कोई जननेता है? क्या वह लोक कल्याण यात्रा पर है? क्या उसने मानवता की सेवा में कोई ऐसा कार्य कर दिया है जिसका उदाहरण संसार में दूसरा नहीं मिलेगा?
एक क्रिमिनल और माफिया को एक जेल से दूसरी जेल ले जाने को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा इतना महत्व आखिर क्यों दिया गया? आमतौर पर ऐसे सवालों का जवाब मीडिया में कभी किसी के पास नहीं हुआ करता। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विजुअल और इवेन्ट पर चला करते हैं। याद करिए एक छुटभैया गुण्डे विकास दूबे की महाकाल यात्रा को। उस समय उसे उज्जैन से कानपुर लाया जा रहा था और बीच रास्ते में एनकाउण्टर कर दिया गया। हालांकि एनकाउण्टर से पहले मीडिया को एक खास जगह पर रोक दिया गया था लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस एनकाउण्टर यात्रा के कवरेज को अपनी महान उपलब्धि माना था।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को लगा कि हो सकता है अतीक अहमद का भी रास्ते में विकास दूबे की तरह एनकाउण्टर कर दिया जाए। ऐसे में अगर वह लगातार अतीक अहमद के कारवां का पीछा करता है तो उसको लाइव रिपोर्टिंग का 'एज' मिल जाएगा। लेकिन क्या इलेक्ट्रानिक मीडिया से यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि आकलन और संभावना पर मंहगे एयरटाइम के 24 घण्टे बर्बाद करना कहां की पत्रकारिता है? अगर उन्हें ऐसा लगता भी है तो वो चुपचाप पीछा कर सकते हैं, मिनट दर मिनट ऐसी महत्वहीन घटनाओं को ऑन एयर करके नेशनल इवेन्ट बनाने की जरुरत क्या है?
अब जब आपको मिनट दर मिनट कोई न कोई नया अपडेट देना है ताकि आप अपने आपको सबसे तेज चैनल साबित कर सकें तब कैसी कैसी मूर्खताएं करनी पड़ती हैं वह मीडिया की अतीक यात्रा में भी दिख रहा है। कितनी गाड़ियां साथ चल रही हैं, गाड़ी का काफिला कहां कहां से गुजर रहा है, कहां कहां रुक रहा है, कौन कौन साथ में है, कहां कहां रुककर नाश्ता और खाना खाया जा रहा है और कहां रुककर लोग फ्रेश हो रहे हैं, इन सबकी अद्यतन जानकारी जनता को मुहैया करायी गयी। हद तो तब हो गयी जब एक सबसे तेज चैनल ने अतीक अहमद को पेशाब करते हुए लाइव दिखा दिया।
अगर एक मिनट को रुककर सोचें कि एक अपराधी और हत्यारे की एक जेल से दूसरी जेल के बीच यात्रा से सामान्य लोगों का क्या लेना देना? परंतु मंहगे एयरटाइम पर जब ऐसी सस्ती दो कौड़ी की चीजें दिखाई जाती हैं तो एक अपराधी का मार्केट वैल्यू बढ़ता है और वह माफिया या फिर गॉडफादर बन जाता है। लंबे समय तक मुंबई की माफिया इंडस्ट्री को मीडिया ने इसी तरह रिपोर्ट करके दाऊद जैसे क्रिमिनल और आतंकवादी को मुंबई का किंग बना दिया था। हालांकि वह तो फिर भी प्रिंट मीडिया का दौर था। चटकारे वाली कहानियां बनायी और छापी जाती थीं, आज तो सब कुछ लाइव हो गया है।
2008 में मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले या फिर उससे पहले कारगिल युद्ध के दौरान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की रिपोर्टिंग सवालों के घेरे में आयी थी। 2008 में एक भीषण आतंकी वारदात को लाइव दिखाने के चक्कर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मानों सारे सिद्धांत भूल गया जिसका फायदा पाकिस्तान में बैठे आतंकवादियों के हैंडलर ने उठाया। तब पहली बार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर हदबंदी की चर्चा हुई। सरकार ने आतंकी घटनाओं के दौरान लाइव रिपोर्टिंग पर रोक लगा दी। अब कहीं भी आतंकी वारदात के दौरान सैन्य या पुलिस कार्रवाई हो रही है तो टीवी चैनलों को वहां पर प्रवेश वर्जित है।
नेशनल ब्रॉडकास्टर्स एसोशिएशन ने भी एक गाइडलाइन बनायी कि आतंकी वारदातों के दौरान कैसे सावधानी रखनी है। लेकिन सवाल अकेले आतंकी वारदात का तो नहीं है। विकास दूबे प्रकरण के बाद खासकर यूपी के मामले में इलेक्ट्रानिक मीडिया नये सिरे से इवेन्ट तैयार कर रहा है। हो सकता है उनके मीडिया प्लान 'लांग लाइव प्लान' के तहत इसकी ऊंची कीमत वसूलने की मंशा बनाकर बैठे हों लेकिन मीडिया मतलब सिर्फ धंधा तो नहीं होता। अगर होता तो फिर एक मीडिया हाउस और एक माफिया हाउस में क्या अंतर रह जाएगा?
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अतीक अहमद की जेल यात्रा को जिस तरह से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पुराने ढर्रे पर चलकर अतीक यात्रा किया है उससे निकट भविष्य में शायद एनबीए को फिर कोई नई गाइडलाइन बनानी पड़े ताकि लाइव कवरेज के नाम पर वह उटपटांग कुछ न दिखा सके। कम से कम एनबीए को अपराधियों, माफियाओं की रिपोर्टिंग के मामलों पर एक बार विचार जरूर करना चाहिए जैसा मुंबई के आतंकी हमलों के बाद उसने किया था।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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