UCC: आसान नहीं है समान नागरिक संहिता की राह
UCC: मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का अंतिम साल चल रहा है और समय आ गया है कि पार्टी अपने कोर एजेंडा का तीसरा वायदा भी पूरा करे तथा वायदों को पूरा करने की उपलब्धि के साथ 2024 के आम चुनाव में जाए। भारतीय जनसंघ के गठन के वक्त संघ परिवार के पास जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का एजेंडा था। बाद के दिनों में समान नागरिक संहिता और फिर अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शामिल किया गया। केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बनी सरकार ने अनुच्छेद 370 को हटा दिया है। राम मंदिर का निर्माण कार्य हो रहा है। अब मामला तीसरे वायदे का है।
वैसे तो सरकार ने तीन तलाक को गैरकानूनी घोषित कर समान नागरिक संहिता को लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम पहले ही उठा लिया है, लेकिन सवाल इसे पूरी तरह लागू करने का है। केंद्र सरकार ठोक बजाकर आगे बढ़ने की रणनीति पर चल रही है। प्रयोग के तौर पर उत्तराखंड, हिमाचल अथवा गुजरात जैसे राज्य में कानून लागू कर जन मन की टोह लेकर आगे बढ़ने की रणनीति तैयार की थी।

2022 में उत्तराखंड में इस बहस ने जब तेजी पकड़ी थी जब भाजपा ने विधानसभा चुनाव में प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा किया था। दोबारा सत्ता पाने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 27 मई 2022 को समान नागरिक संहिता तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश व भारत के परिसीमन आयोग की प्रमुख रंजना देसाई की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय मसौदा समिति के गठन की घोषणा कर दी।
मई 2023 तक समिति के पास ढाई लाख से अधिक सुझाव प्राप्त हुए थे। समिति ने प्राप्त सुझावों का अध्ययन के बाद मसौदा तैयार कर लिया है। मसौदे में शादी की उम्र, विवाह पंजीयन, बहुपत्नी पर रोक, हलाला और इद्दत को खत्म करने, तलाक के नियम, भरण पोषण, गोद लेने का अधिकार, बच्चों की देखरेख, उत्तराधिकार कानून, जनसंख्या नियंत्रण, बच्चों की कस्टडी, लिव इन रिलेशनशिप पर गंभीरता से विचार किया गया है। मुख्यमंत्री ने दावा किया है कि समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार हो गया है इसे जल्द ही देवभूमि उत्तराखंड में लागू किया जाएगा।
लेकिन हाल में ही 4 जुलाई को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी दिल्ली आये तो समान नागरिक संहिता के उनके प्रयास पर कुहासा छा गया। अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। मुलाकात के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ यूसीसी पर कोई चर्चा किए जाने से न सिर्फ इनकार किया, बल्कि जल्द से जल्द राज्य में यूसीसी लागू किए जाने के उनके दावे को लेकर पत्रकारों द्वारा कुरेदे जाने पर बस इतना ही कहा कि इसमें कोई देरी नहीं करेंगे, लेकिन हम इसे लागू करने में अभी कोई जल्दबाजी भी नहीं करेंगे।
इस बीच समान नागरिक संहिता को लेकर प्रदेश के अधिकार पर भी बहस तेज हो गई है। कुछ जानकार लोग प्रदेश सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता को लेकर किए जा रहे दावों को बेतुका और सार्वजनिक धन की फिजूलखर्ची बता रहे हैं। भारत के संविधान के भाग 4 में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के तहत अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का उल्लेख है। अनुच्छेद 44 स्पष्ट कहता है कि यदि समान नागरिक संहिता बनाने की आवश्यकता महसूस की जाती है तो वह पूरे देश के लिए होगी। इसमें जो 'राज्य' शब्द है उसका आशय प्रांत या प्रदेश नहीं वरन राष्ट्र-राज्य है। लिहाजा एक प्रदेश के स्तर पर समान नागरिक संहिता बनाने की कवायद ही अर्थहीन है। यह संविधान सम्मत भी नहीं है।
माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने भोपाल में देशभर में यूसीसी कानून लागू करने का मुद्दा इसी आलोक में उठाया था। प्रधानमंत्री ने साफ तौर पर कहा था कि जब एक घर में अलग सदस्यों के अलग कानून हो तो घर नहीं चल सकता, तो फिर अलग कानून से देश कैसे चलेगा। भारतीय संविधान अनुच्छेद 44 के अनुसार समान नागरिक संहिता लागू करना राज्य (राष्ट्र) का कर्तव्य मानता है, लेकिन शादी, तलाक, विरासत और संपत्ति पर अधिकार आदि सामाजिक मुद्दे समवर्ती सूची में आते हैं, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों सरकारें इस पर कानून बना सकती हैं। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि इस पर केंद्र को आगे आना चाहिए।
वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि पर्सनल लॉ में बदलाव को समान नागरिक संहिता लागू करने से जोड़ना अनुचित है। तमाम अधिकारिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए इन दलों का तर्क है कि किसी एक धर्म नहीं बल्कि सभी धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों में ऐसे प्रावधान आज भी मौजूद हैं जो खासकर महिलाओं के प्रति भेदभावकारी हैं और भारत के संविधान में उल्लिखित समानता के मौलिक सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं। न्यायमूर्ति बीएस चौहान की अध्यक्षता में विधि आयोग ने भी परामर्श पत्र में लिखा है कि असमानता का मूल कारण भिन्नता नहीं बल्कि भेदभाव है।
मोटे तौर पर समान नागरिक संहिता को लेकर देश में तीन प्रकार के विचार समूह सामने हैं। एक आशावादी, दूसरा शंकावादी और तीसरा कुशंकावादी। आशावादी समूह में वे लोग हैं जो उम्मीद करते हैं कि समान नागरिक संहिता आने से देश में सांप्रदायिकता नियंत्रित होगी। दूसरे वे हैं जो शंका करते हैं कि क्या देश में यह लागू हो सकेगी? क्या इसके कुछ ठोस परिणाम आ सकेंगे? और तीसरे में वे हैं जिनके मन में कुशंका है कि समान नागरिक संहिता उनके धार्मिक कानून को समाप्त करने के लिए लाई जा रही है।
लेकिन अधिकांश लोग समान नागरिक संहिता के पक्ष में हैं और वे मानते हैं कि प्रगतिशील समाज को अपनी धार्मिक व सामाजिक गैरजरूरी परंपराओं और धर्म के नाम पर चल रही रूढ़ियों को छोड़ना चाहिए तथा धर्म के नाम पर विषमतामूलक परंपराओं से ऊपर उठना चाहिए। प्रगतिशीलता का मतलब केवल मशीन और तकनीक के सुख का उपयोग नहीं है बल्कि एक उन्नत और खुले मस्तिष्क के साथ एक नए भविष्य की ओर देखने वाली दृष्टि और सोच ही प्रगतिशीलता है।
इस बीच समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर बुलाई गई बैठक के दौरान जनजाति समाज के लोगों को इसके दायरे से बाहर रखे जाने की पुरजोर मांग की गई। सिख समुदाय की ओर से भी कानून को लेकर नकारात्मक संकेत प्राप्त हो रहे हैं। अकाली दल और अरुणाचल प्रदेश में भाजपा की सहयोगी पार्टियां भी समान नागरिक संहिता के विरोध का संकेत कर रही हैं। ऐसे में समान नागरिक संहिता पर आगे बढ़ने के लिए भाजपा को विपक्ष साधने के साथ साथ अपनों को भी सहमत करना होगा।
हालांकि समान नागरिक संहिता कानून के रास्ते में अभी ढेर सारी रुकावटें हैं, लेकिन हमें उम्मीद ही नहीं बल्कि यह प्रयास भी करना चाहिए कि देश में समान नागरिक संहिता को लेकर आमराय बने और प्राचीन कट्टरताओं से मुक्ति पाकर एक सभ्य और बराबरी का समाज बनाने का प्रयास हो। इस कानून के लागू होने से सांप्रदायिकता कम होगी, देश की एकता मजबूत होगी, सदियों से स्थापित विषमता और शोषण से मुक्ति पाकर तरक्की के रास्ते खुलेंगे साथ ही 42 वें संशोधन के जरिए भारतीय संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया 'सेकुलर' शब्द सही अर्थों में लोक व्यवहार में भी प्रतिबिंबित होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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