Uniform Civil Code: समान नागरिक संहिता विरोधी बैकफुट पर

तुगलक के संपादक एस गुरुमूर्ति के इस लेख ने मुसलमानों में बहस शुरू कर दी है कि भारत में लागू शरीयत क़ानून कुरआन के अनुरूप नहीं है।

न सिर्फ कुरआन और हदीसों के मुताबिक़ नहीं है, बल्कि 1937 का यह क़ानून हिन्दुओं और मुसलमानों में बड़ी विभाजन रेखा खींचने के लिए बनाया गया था।

Uniform Civil Code: Anti Uniform Civil Code on the backfoot

उन्होंने लिखा है कि 1937 में शरीयत क़ानून लागू होने से पहले प्रॉपर्टी का उत्तराधिकार, बच्चा गोद लेने या वसीयत के नियम हिंदुओं और मुसलमानों के लिए एक समान थे। यह क़ानून भारत का विभाजन करने के लिए अंग्रेजों की मोहम्मद अली जिन्ना के साथ मिल कर बनाई गई साजिश का हिस्सा था।

शरीयत क़ानून की धारा 2 में दस मामलों का जिक्र किया गया है, जिनका फैसला मुस्लिम परंपराओं के अनुसार होगा। इन दस की सूची में बच्चा गोद लेने और वसीयत का जिक्र नहीं है, जबकि इस्लाम में इन दोनों की मनाही है। जिन्ना ने ही अपने व्यक्तिगत कारणों से इन दोनों मुद्दों को मुस्लिम परंपराओं में शामिल नहीं होने दिया। जिन्ना खोजा मुस्लिम थे, जो हिन्दू परम्पराओं का पालन करते हैं, जिनमें गोद लेना और वसीयत भी शामिल हैं।

Uniform Civil Code: Anti Uniform Civil Code on the backfoot

उस समय अदालतों को यह निर्देश भी दिया गया था कि गोद लेने, वसीयत और विरासत से जुड़े मामलों में अदालतों को अधिनियम की धारा 2 के तहत मुस्लिम कानून लागू करने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि ये विषय उक्त धारा में शामिल नहीं हैं। लेकिन शरीयत एक्ट की धारा 3 में प्रावधान है कि अदालतें गोद लेने, वसीयत और विरासत के मामलों में मुस्लिम कानून के नियमों को तभी लागू कर सकती हैं, जब कोई कोर्ट में स्पष्ट तौर पर घोषणा करे कि वह इन मामलों में भी मुस्लिम कानून से फैसला चाहता है।

खोजा मुस्लिम कुरआन को नहीं मानते, बल्कि उनका धर्म ग्रंथ दशावतार है, जिसमें नौ अवतार तो हिन्दू हैं, लेकिन दसवां अवतार अली है। यहां एक उदाहरण भी दिया जा सकता है कि जिन्ना की बेटी दीना वाडिया, जिसने अपने पिता की इच्छा के खिलाफ पारसी नेविल वाडिया (नुस्ली वाडिया के पिता) से शादी की थी, वह बंटवारे के बाद भारत में ही रही थी। उसने 2007 में मुम्बई हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी कि जिन्ना के मुम्बई वाले घर पर उसका हक है, क्योंकि कि उनके पिता खोजा शिया थे, इसलिए उन पर विरासत का हिन्दू क़ानून लागू होना चाहिए।

ब्रिटिश राज में शुरू शुरू में अदालतें स्थानीय परंपराओं के अनुसार फैसले करती थीं। स्थानीय परंपराओं में महिलाओं को प्रापर्टी में हक नहीं होता था। हालांकि इस्लाम में औरतों को जायदाद में आधा हिस्सा मिलने का रिवाज था, लेकिन भारतीय मुसलमान भी इसी परंपरा को मानते थे। बाद में अंग्रेजों ने तय किया कि हिन्दुओं से संबंधित फैसले हिन्दुओं की परंपराओं, और मुसलमानों से संबंधित फैसले मुस्लिम परंपराओं के अनुसार किए जाएंगे।

1873 के मद्रास सिविल कोर्ट एक्ट और 1876 के अवध लॉज़ एक्ट में लिखा गया कि मज़हबी क़ानून पर स्थानीय परंपरा को तरजीह दी जाएगी। मुसलमानों के मुकद्दमों का फैसला करने के लिए अदालतें इस्लामिक मौलवियों का सहारा लेती थीं, बाद में अंग्रेजों ने तय किया कि वे मुल्ला मौलवियों का सहारा लेने की बजाए हदीसों और इस्लामिक परंपराओं पर आधारित क़ानून बनाएंगे।

राजनीतिक प्रोजेक्ट के तहत चार्ल्स हैमिल्टन से हदीसों और इस्लामिक परंपराओं पर आधारित किताब लिखवाई गई, जिसका नाम था "अल हादिया"। जो अंग्रेज़ हिंदुस्तान आकर वकालत करना चाहते थे, उनके लिए इस किताब को पढ़ना जरूरी कर दिया गया था। बाद में बनाया गया मुस्लिम पर्सनल लॉ इसी किताब पर आधारित है। पर्सनल लॉ को कोडिफाई नहीं किया गया है, बस इतना लिख दिया गया कि दोनों पक्ष मुस्लिम हों, तो शादी, तलाक़, जायदाद, विरासत से जुड़े दस मुद्दों का फैसला शरीयत के हिसाब से होगा, वरना देश का सामान्य क़ानून लागू होगा।

आज़ादी के बाद भारत की संविधान सभा सभी पर्सनल एक्ट को खत्म करके समान नागरिक संहिता बनाना चाहती थी, डा. भीमराव अंबेडकर ने समान नागरिक संहिता की जमकर वकालत की थी। उन्होंने संविधान सभा में मुस्लिम लीग के उन सदस्यों की आलोचना की थी जिन्होंने समान नागरिक संहिता के खिलाफ यह कहते हुए बहस की थी कि शरिया मुसलमानों के लिए लाजिमी है।

डा. अंबेडकर ने शरिया को लाजिमी बताने वालों को बताया था कि अगर यह मुसलमानों के लिए लाजिमी है, तो 1937 तक हिंदू कानून का पालन क्यों हो रहा था। 1937 तक संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत और बॉम्बे में भी उत्तराधिकार के मामलों में फैसले हिंदू कानून के मुताबिक़ तय होते थे। लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरू की रहनुमाई में कांग्रेस के नेताओं ने अंग्रेजों की तरह धर्मों की परंपराओं के मुताबिक़ क़ानून पर जोर दिया। नतीजतन अंग्रेजों का हिन्दू-मुस्लिम में फूट डालने के लिए बनाया गया मुस्लिम पर्सनल एक्ट जस का तस रह गया। संविधान सभा में यह सहमति हुई कि अनुच्छेद 44 में यह लिखा जाए कि आने वाली सरकारें भारत में सभी को मान्य समान नागरिक संहिता बनाएगी।

सुप्रीमकोर्ट और अनेक हाईकोर्ट सरकारों को याद दिलाते रहे हैं कि समान नागरिक संहिता लागू करना है, लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण और वोट बैंक के कारण कांग्रेस और कांग्रेस समर्थित सरकारें अदालतों के निर्देशों की अनदेखी करती रही। जबकि समान नागरिक संहिता को लागू करना हमेशा से भाजपा के चुनाव घोषणा पत्र में रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में सरकार बनने पर भी 21वें विधि आयोग को इस विषय पर काम करने की जिम्मेदारी दी थी, और अब 22वें विधि आयोग को भी दी जिम्मेदारी दी हुई है।

आयोग पिछले तीन साल से इस विषय पर काम कर रहा है। अब अपने काम में तेजी लाते हुए आयोग ने 14 जुलाई तक लोगों से सुझाव मांगे हैं। मोदी सरकार लोकसभा चुनावों से पहले समान नागरिक संहिता का बिल पास करवाने के मूड में है। हो सकता संसद के मॉनसून सत्र में ही एक बिल पेश किया जाए और सभी दलों के सांसदों में आम राय बनाने के लिए गृह मंत्रालय की स्थाई समिति में भेज दिया जाए। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपना विरोध जता दिया है, मुस्लिम समुदाय ने जिस आधार पर संविधान सभा में विरोध किया था, उनका विरोध आज भी उसी आधार पर है।

उनका तर्क है कि पर्सनल लॉ उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान का एक अभिन्न अंग हैं, समान संहिता लागू करने से उनके अधिकारों का उल्लंघन होगा और उनकी विशिष्ट पहचान पर बुरा असर होगा। लेकिन राजनीतिक दलों में समान नागरिक संहिता का विरोध उस तरह नहीं हो रहा, जैसे समूचे विपक्ष ने नागरिकता संशोधन क़ानून का किया था, सभी राजनीतिक दल बिल के प्रारूप का इन्तजार कर रहे हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि मुस्लिम महिलाएं बड़ी तादाद में उसी तरह समान नागरिक संहिता का समर्थन कर रही हैं, जैसे तीन तलाक बैन करने का समर्थन किया था।

मुस्लिम महिलाएं लंबे समय से मुस्लिम पर्सनल लॉ को कोडिफाइड करके मुस्लिम फैमिली क़ानून लाने की मांग करती रही हैं। लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर हावी लोग इसकी जरूरत नहीं समझते, इसलिए अब बदलाव की मांग करने वाली मुस्लिम महिलाएं खुल कर समान नागरिक संहिता के पक्ष में बोलने लगी हैं। मुस्लिमं महिलाएं चाहती हैं कि शादी के लिए उम्र 18 और 21 साल जो सबके लिए है वह मुस्लिमों के लिए भी हो। जबकि इस्लाम कहता है कि 13 साल की बच्ची शादी करने लायक हो जाती है।

जब इस्लाम में शादी एक सोशल कॉन्ट्रैक्ट है तो 13 साल की बच्ची इस काबिल कैसे हो सकती है कि वह सोशल कॉन्ट्रैक्ट को समझे। मुस्लिम महिलाएं इस मांग के लिए भी लंबे समय से लड़ रही हैं कि बिना पहली पत्नी की सहमति के मर्द को दूसरी शादी की इजाजत नहीं होनी चाहिए। इसी तरह 21वीं सदी में चार शादियों की इजाजत खत्म होनी चाहिए, वह जमाना अलग था, जब चार चार शादियों की इजाजत थी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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