TMC Candidates: गठबंधन धर्म कांग्रेस ने नहीं निभाया या ममता ने?
TMC Candidates: ममता बनर्जी ने इंडी एलायंस की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए पश्चिम बंगाल की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवारों का एकतरफा एलान कर दिया| यह शुरू से ही स्पष्ट था कि वह बंगाल में कम्युनिस्टों के साथ किसी तरह का चुनावी गठबंधन करके उन्हें बंगाल की खोई हुई जमीन पर फिर से लौटने का मौक़ा नहीं देंगी|
पटना में हुई विपक्ष की पहली बैठक के बाद जब सीताराम येचुरी की ममता बनर्जी के साथ खड़े हुए तस्वीर वायरल हुई थी, तो बंगाल के कम्युनिस्ट काडर ने तीखी प्रतिक्रिया प्रकट की थी। बंगाल में दोनों पक्षों के काडर में राजनीतिक दुश्मनी खून खराबे की हद तक है, इसलिए वे माकपा महासचिव सीताराम येचुरी या भाकपा महासचिव डी. राजा को ममता के साथ खड़ा नहीं देख सकते|

तब माकपा के नेताओं को बंगाल में जाकर कहना पड़ा था कि वे तृणमूल कांग्रेस के साथ कोई चुनावी गठबंधन नहीं करेंगे| कम्युनिस्टों ने बंगाल के साथ साथ यह भी साफ़ कर दिया था कि वे केरल में भी कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग नहीं करेंगे|
इंडी एलायंस के लिए यह एक सही समय था कि कम्युनिस्टों को गठबंधन से बाहर रख कर विपक्षी मोर्चा बनता, जैसे कि 2004 में यूपीए बना था| कम्युनिस्टों ने 2004 से 2008 तक यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दिया था| 2008 में जब अमरीका के साथ परमाणु ईंधन समझौते के कारण कम्युनिस्टों ने समर्थन वापस लेकर अविश्वास प्रस्ताव पेश किया, तो उसके बाद ममता बनर्जी यूपीए में शामिल हुई|
2009 का लोकसभा चुनाव ममता बनर्जी ने यूपीए के साथ गठबंधन करके लड़ा क्योंकि कम्युनिस्टों का कांग्रेस से रिश्ता टूट चुका था| कांग्रेस के कम्युनिस्ट मोह के कारण ही ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी| 2009 के चुनाव के बाद वह कम्युनिस्टों के समर्थन के बिना बनी यूपीए सरकार में दुबारा रेल मंत्री भी बनी, इससे पहले एनडीए में रहते हुए भी वह वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री थी|

इससे ममता और कम्युनिस्टों की राजनीति को समझा जा सकता था| कांग्रेस अगर 2008 में धोखा देने वाले कम्युनिस्टों को इंडी गठबंधन से बाहर रखती, तो पश्चिम बंगाल में उसे अधीर रंजन के घोर ममता विरोधी होने के बावजूद तृणमूल कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग में दिक्कत नहीं आती|
कांग्रेस दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहती थी, लेकिन उसके हाथ में कुछ नहीं लगा| न बंगाल में ममता ने उन्हें कोई सीट दी, न केरल में कम्युनिस्टों ने उन्हें कोई सीट दी| ममता बनर्जी ने लंबी राजनीति के तहत कांग्रेस को बंगाल में अलग थलग किया है। वह देश भर में कम्युनिस्ट विरोध की राजनीति करना चाहती हैं, जबकि कांग्रेस बिना कम्युनिस्ट चलना नहीं चाहती, हालांकि कम्युनिस्ट सिर्फ केरल तक सिमट कर रह गए हैं|
तृणमूल कांग्रेस को फिर से कांग्रेस के मुकाबले राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाने के लिए ममता बनर्जी ने बिहार और गुजरात में पाँव फैलाना शुरू कर दिया है| उन्होंने बिहार के दो नेताओं शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आज़ाद को, तथा गुजरात के क्रिकेटर युसूफ पठान को पश्चिमी बंगाल में चुनाव मैदान में उतार दिया है|
कांग्रेस में भी ऐसे कई नेता हैं, जिनका मानना है कि राहुल गांधी ने कांग्रेस को कम्युनिस्ट पार्टी बना दिया है| श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के मुखर समर्थक होकर कांग्रेस की नीतियों का विरोध करने के कारण छह साल के लिए कांग्रेस से निकाले गए प्रमोद कृष्णम खुलेआम कहते हैं कि राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी को कम्युनिस्ट पार्टी बनाकर रख दिया है|
बाकी राज्यों में जहां इंडी गठबंधन टूट गया है, वहां के अलग अलग कारण हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल और केरल में इंडी गठबंधन टूटने का कारण कांग्रेस का कम्युनिस्ट मोह है| पश्चिम बंगाल, केरल, बिहार और पंजाब में इंडी गठबंधन टूटने का दूसरा बड़ा कारण कांग्रेस की सीट शेयरिंग को लेकर लापरवाही भी है|
ममता बनर्जी की तरह बिहार में नीतीश कुमार जल्दी से जल्दी सीट शेयरिंग की मांग कर रहे थे, लेकिन लालू यादव भीतरघात की राजनीति करते हुए नीतीश कुमार की सरकार गिरा कर अपने बेटे तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने की राजनीति कर रहे थे| जिसे सही वक्त पर भांप कर नीतीश कुमार ने इंडी गठबंधन ही छोड़ दिया|
राजनीतिक गठबंधन के दो बेसिक रूल हैं, या तो पहले सीट शेयरिंग हो, या चुनाव के बाद कार्यक्रम आधारित गठबंधन हो| इंडी एलायंस इन दोनों रूल का पालन नहीं कर रहा था| गठबंधन कर लिया, लेकिन सीट शेयरिंग नौ महीने तक टली रही| क्षेत्रीय दल पहले दिन से कह रहे थे कि मीटिंग मीटिंग छोड़ो, पहले सीट शेयरिंग करो। लेकिन कांग्रेस के मन में बेईमानी थी, इसलिए सीट शेयरिंग को छोड़ कर राहुल गांधी को जन समर्थन लेने के लिए यात्रा पर भेज दिया| यह क्षेत्रीय दलों पर दबाव बनाने की रणनीति थी कि कांग्रेस ज्यादा मजबूत है, इसलिए उसे उनके राज्यों में ज्यादा सीट चाहिए| इसलिए बेईमानी की नींव पर खड़ा इंडी एलायंस चुनावों से पहले ही अपनी ताकत खो चुका है|
जबसे देश में गठबंधन की राजनीति शुरू हुई है, हम पिछले 35 सालों से देख रहे हैं कि हर चुनाव से पहले गठबन्धनों में रि-एलायनमेंट होता है| एनडीए 1998 से कायम है, लेकिन हर चुनाव में उसके साथ कई दल छोड़कर जाते रहे, कई नए दल जुटते रहे| ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने 2004 तक का चुनाव एनडीए के साथ मिलकर लड़ा था, लेकिन 2009 का चुनाव यूपीए के साथ गठबंधन करके लड़ा|
2004 में लोकसभा चुनावों के बाद बना यूपीए टूट चुका है| उसकी जगह जो इंडी एलायंस बना उसमें कम्युनिस्ट भी शामिल किए गए, जबकि इससे पहले कम्युनिस्ट किसी भी विपक्षी गठबंधन का हिस्सा नहीं थे| अब इस समय देश के सामने दो गठबंधन हैं| इंडी एलायंस गठबंधन के दोनों मूल सिद्धांतों पर खरा नहीं उतरता, क्योंकि इसमें पहले न सीट शेयरिंग हुई, न कार्यक्रम तय हुआ, न विचारधारा के मोर्चे पर सहमति है| गठबंधन का आधार सिर्फ और सिर्फ भाजपा और मोदी विरोध है| इसका नतीजा यह निकला है कि अपने अपने स्वार्थों के चलते जम्मू कश्मीर, पंजाब, केरल, बंगाल और बिहार में चुनाव से पहले ही गठबंधन टूट चुका है|
दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी जिस दल को भी एनडीए में शामिल कर रही है, उससे पहले सीट शेयरिंग कर रही है| टीडीपी को तब तक एनडीए में शामिल नहीं किया, जब तक उसके साथ आंध्र प्रदेश में सीट शेयरिंग नहीं हुआ| हालांकि टीडीपी पिछले कम से कम एक साल से एनडीए में दुबारा शामिल होने की कोशिश कर रही थी|
आपसी सहमति के बावजूद बीजू जनता दल की एनडीए में तब तक एंट्री नहीं होगी, जब तक सीट शेयरिंग नहीं होगी| यही बात पंजाब में अकाली दल से है| महाराष्ट्र और बिहार की बात अलग है, क्योंकि वहां चुनावों से पहले एनडीए की सरकारों का गठन हो गया था, इसलिए वहां सीट शेयरिंग अब हो रही है|
भारतीय जनता पार्टी अपने पुराने अनुभव के आधार पर गठबंधन की राजनीति कर रही है| भाजपा गठबंधन की राजनीति का अनुभव उसके जन्म से पहले जनसंघ के जमाने से 1967 से चल रहा है| जबकि कांग्रेस का गठबंधन का अनुभव सिर्फ 2004 से 2014 का है| तब कांग्रेस ने चुनाव बाद ईमानदारी से सरकार बनाने के लिए गठबंधन किया था, इस बार गठबंधन में बेईमानी ज्यादा थी, इसलिए सीट शेयरिंग को जानबूझ कर लटकाया गया| अब क्षेत्रीय दलों का धैर्य भी समाप्त हो रहा है और तृणमूल कांग्रेस की तरह वे भी अपने उम्मीदवारों की घोषणा करने पर विचार कर सकते हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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