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शेषन के सुधार और कंपनियों के प्रचार से उतर गया चुनावों का खुमार

Chunav Prachar: यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा की बची हुई कुल 57 सीटों पर मतदान के साथ एक जून को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव पूरा हो जाएगा। लगभग 100 करोड़ मतदाताओं वाले लोकतंत्र में चुनाव आया और चला गया लेकिन क्या आपको उस तरह से पता चला जैसे पहले पता चलता था?

जिन लोगों का जन्म चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन के कार्यकाल के बाद हुआ है उन्हें पता ही नहीं चलेगा कि भारत में चुनाव का मतलब असल में क्या होता था। उस समय तक भारत की जनसंख्या 100 करोड़ के नीचे थी लेकिन चुनाव की गहमा गहमी इतनी अधिक रहती थी कि शायद ही कोई हो जो इसका हिस्सा बनने से अपने आपको रोक पाये।

Chunav Prachar

उन दिनों न केवल मतदान बैलट पेपर पर होते थे बल्कि पूरा चुनाव प्रचार बैनर और पोस्टरों के सहारे लड़ा जाता था। हर दल भीषण जनसंपर्क करता था और इसके लिए हर लोकसभा सीट या विधानसभा सीट पर सैकड़ों टोलियां बनायी जाती थीं। चौक चौराहों और चाय पान नाश्ते जलपान की दुकानों पर जहां चले जाइये वहां हफ्तों चुनावी चर्चा चलती रहती थी।

लेकिन 1990 में चुनाव आयुक्त बने टीएन शेषन ने जो 'कठोर' चुनाव सुधार किये उसने तात्कालिक रूप से उतना असर तो नहीं पैदा किया लेकिन दीर्घकालिक रूप से चुनावी प्रक्रिया को ही एक सरकारी खानापूर्ति बना दिया। जिस समय टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त बने थे निश्चित रूप से वह भारतीय राजनीति का सबसे उथल पुथल भरा और अस्थिर काल था। टीएन शेषन न होते तो भारत का लोकतंत्र कहां पहुंच जाता कोई नहीं जानता। लेकिन उनके भीषण चुनाव सुधार ने उस समय तो लगा कि बेलगाम होते नेताओं पर नकेल कसकर लोकतंत्र को बचा लिया लेकिन वहीं से चुनावों के प्रति जनता की गहमा गहमी भी खत्म होने लगी।

टीएन शेषन के चुनाव सुधार ने भारत के चुनाव में फिजूलखर्ची रोकने के लिए चुनावी खर्चों की जो सीमा बांधी थी उसने भारतीय लोकतंत्र की उत्सवधर्मिता को ही मानो खत्म कर दिया। जंगल काटकर घर बनाने और गमले में पौधा लगाकर पर्यावरण बचानेवालों ने टीएन शेषन के इन चुनावी सुधारों को पर्यावरण से जोड़कर भी देखा कि अब जब पेपर का इस्तेमाल कम होगा तो पेड़ कम कटेंगे, पेड़ कम कटेंगे तो पर्यावरण बचेगा।

शेषन के चुनाव सुधार ने उन बेलगाम 'गंवई और देहाती' लोगों को सुधारने का काम भी किया जो शहरी लोगों की नजर में चुनाव आते ही हुड़दंग मचा देते थे। रही सही कसर 2004 में ईवीएम के इस्तेमाल ने पूरी कर दी। तकनीकी की तरफ आंख मूंदकर दौड़ते भारत के लोगों को यह समझाया गया कि जब टेक्नॉलाजी इतनी एडवांस हो गयी है कि एक बटन दबाने से काम हो जाता है तो फिर कागज के बैलट पर ठप्पा मोहर मारकर उन्हें डब्बा में भरने की जरूरत क्या है?

टीएन शेषन ने जो चुनाव सुधार किया था उसका असर आने में समय जरूर लगा लेकिन असर हुआ। मसलन, हर उम्मीदवार को एक निश्चित सीमा तक ही पैसा खर्च करने की अनुमति दी गयी। इससे चुनाव में फिजूलखर्ची पर रोक तो लगी लेकिन इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर जो कारोबार पैदा होता था, वह खत्म हो गया। पहले पार्टियां उम्मीदवारों को अपनी ओर से कुछ पैसा देती थीं ताकि उम्मीदवार जमकर चुनाव लड़ सके। अब क्योंकि उसके खर्च की सीमा निर्धारित हो गयी है तो पार्टियों ने बजाय उम्मीदवार को पैसा देने के, पार्टी के प्रचार पर पैसा खर्च करना शुरु कर दिया। इससे चुनाव आयोग की बंदिश भी खत्म हो गयी और पार्टी सिम्बल का प्रचार भी हो गया।

इस तरीके का सबसे अधिक इस्तेमाल भाजपा में मोदी शाह की जोड़ी ने किया है। मोदी शाह के आगमन से पहले 2009 से ही भाजपा ने कॉरपोरेट घरानों को चुनावी व्यापार देना शुरु कर दिया था। चुनावी रणनीतिकार, रिसर्च, सर्वेक्षण, टीवी-अखबार और डिजिटल मीडिया में प्रचार के साथ साथ आउटडोर और परिवहन माध्यमों से भी प्रचार प्रसार कुछ ऐसे क्षेत्र विकसित हो गये जिसमें पार्टी वर्कर नहीं बल्कि व्यावसायिक कंपनियों के प्रोफेशनल काम करते हैं। अब चुनाव सामान्य पार्टी समर्थकों के लिए लाभ का अवसर होने के बजाय बड़े व्यावसायिक घरानों के लिए लाभ का अवसर बन गया।

जब भाजपा ने ये तरीके अपनाने शुरु किये तो कांग्रेस ने भी अपने परंपरागत प्रचार तंत्र को शिथिल करते हुए कंपनियों के जरिए प्रचार पर जोर देना शुरु कर दिया। 2014 से कांग्रेस ने भी वो तरीके अपनाने शुरु कर दिये जिसमें भाजपा मीलों आगे निकल चुकी थी। इस तरह चुनाव में फिजूलखर्ची तो रुकी लेकिन केवल स्थानीय स्तर के समर्थकों या प्रचार सामग्री छापने वालों के लिए। चुनावी खर्च कम नहीं हुआ। वह पैसा कॉरपोरेट घरानों की ओर चला गया और चुनाव भी एक प्रकार की ऐसी कॉरपोरेट गतिविधि बनता जा रहा है जहां कुछ कंपनियों के लिए करोड़ों, अरबों का बिजनेस जनरेट होता है।

इसका असर स्थानीय लोगों के उत्साह पर पड़ना था और वह 2024 में भरपूर दिखाई दे रहा है। 2024 का आम चुनाव बीते दो दशक का सबसे उदास और निराश चुनाव लग रहा है। भाजपा की ओर से खर्चों और चुनाव प्रचार का अत्यधिक केन्द्रीयकरण कर दिया गया है। भाजपा का सारा जोर मोदी और कमल निशान के प्रचार पर है। अलग अलग मीडिया माध्यमों से उन्हीं का प्रचार प्रसार भी हो रहा है। उसकी रणनीति संभवत: यह है कि जब लोगों को बटन कमल के निशान पर ही दबाना है और ऐसा करवाने के लिए उनके पास ब्रांड मोदी है तो किसी और पर पैसा खर्च करने की जरूरत क्या है?

कुछ ऐसी ही रणनीति दूसरे दलों की भी बनती जा रही है। अपने पार्टी सिम्बल और केन्द्रीय नेता के प्रचार पर हर दल जोर दे रहे हैं और स्थानीय गतिविधियों को सीमित करके अधिक से अधिक कॉरपोरेट शैली में काम करने को बेहतर मान रहे हैं। इसका नतीज यह हो रहा है कि स्थानीय समर्थक अपनी पार्टियों के प्रति इस बार उदासीन दिखाई दे रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह संकट अकेले बीजेपी के साथ है। बाकी दलों में भी कमोबेश यही हाल है जिसके कारण 2024 का आम चुनाव एक खानापूर्ति बनकर रह गया है।

समय आ गया है कि चुनावी खर्चों को तकनीकी रूप से बचाने के लिए पार्टियां अत्यधिक केन्द्रीयकरण पर जोर देने से बचें। चुनाव आयोग को भी चाहिए कि लोकतंत्र की चुनावी उत्सवधर्मिता को बचाये रखने के लिए कुछ नियमों को शिथिल करे ताकि स्थानीय स्तर पर पूंजी और उत्साह दोनों का प्रवाह बढे। यह बात सही है कि इस बार चुनाव आयोग ने मतदान बढाने और मतदाताओं को इसके बारे में जानकारी देने के लिए हर प्रकार से काम किया है। मतदाताओं को लगातार एसएमएस और एमएमएस भेजे गये ताकि वह मतदान की तिथि भूल न जाए। इसके अलावा बूथों को आदर्शबूथ बनाने के उपाय भी किये गये ताकि वहां पहुंचने पर लगे कि आज कोई त्यौहार है।

लेकिन इन प्रयासों के बाद भी न तो चुनाव में सरगर्मी आयी और न मतदान में। टीवी, अखबार और मोबाइल पर चुनाव की चाहे जो गहमा गहमी रही हो लेकिन जमीन पर लगभग सन्नाटा ही पसरा रहा। इससे पार पाने के लिए राजनीतिक दलों को ही नहीं, चुनाव आयोग को भी पुनर्विचार करना होगा क्या वो सटीक योजनाओं के साथ आगे बढ रहे हैं या कहीं कोई गंभीर चूक हो गयी है? अगर इसी दिशा में हम आगे बढते रहे तो चुनाव भी 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे सरकारी कार्यक्रम होकर रह जाएंगे जिन्हें सरकारी सिस्टम तो सबसे बड़ा उत्सव घोषित करती है लेकिन आम आदमी के लिए वह छुट्टी का एक दिन होने से अधिक कुछ नहीं होता।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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