Tata Project Singur: पूरी हो गयी सिंगूर के संग्राम की अधूरी कहानी
Tata Project Singur: किसी कम्युनिस्ट शासन में पूंजीवादी विकास की एक ऐसी कहानी जिसे लिखने की शुरुआत 2006 में हुई थी, वो अब जाकर पूरी हुई है। आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल ने पश्चिम बंगाल के औद्योगिक विकास विभाग को कहा है कि वो टाटा मोटर्स को 766 करोड़ रूपये ब्याज समेत वापस लौटा दे। इसकी जानकारी खुद टाटा समूह ने 30 अक्टूबर को एक प्रेस रिलीज जारी करके मीडिया को दी है। सिंगूर के संग्राम की जिस पटकथा पर चलकर बंगाल ने ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव देखा, वह टाटा समूह को आर्थिक क्षतिपूर्ति के साथ पूरा हो गया है।
2000 के दशक में पश्चिम बंगाल के हंसुआ हथौड़ा वाले 'लाल सलाम' समूह को महसूस हुआ कि प्रदेश में बड़े पूंजी निवेश को आकर्षित करना चाहिए। यह वह समय था जब बुजुर्ग कॉमरेड ज्योति बसु कुर्सी छोड़कर किनारे हो गये थे और बंगाली भद्रलोक से जुड़े पके बालों वाले कॉमरेड साथी बुद्धदेब भट्टाचार्य को बंगाल की सत्ता मिल गयी थी। पूंजीवाद को लेकर बुद्धदेब ज्योति दा की अपेक्षा अधिक उदार थे। उदार तो ज्योति दा भी थे लेकिन उनकी औद्योगिक उदारता का दायरा उनके दामाद को आर्थिक लाभ पहुंचाने से आगे नहीं बढ़ पाया था।

बुद्धदेब बंगाल के औद्योगिक वातावरण में बदलाव चाहते थे। ऐसे में टाटा समूह की ओर से किसी ऐसी कार को बनाने का प्रपोजल मिले जिसकी कीमत एक लाख के आसपास हो तो कॉमरेड के लिए एक पंथ दो काज जैसा अवसर हो गया। पूंजीवाद भी सध गया और जनवाद भी कायम रहा। आखिर उस समय देश के कई राज्य टाटा को जमीन देने के लिए तैयार थे लेकिन जनता की नैनो कार अगर बंगाल के कम्युनिस्ट शासन से बनकर देशभर में जाती तो उसमें जनवाद की अलग ही छवि नजर आती।
लेकिन बुद्धदेब दा से एक चूक हो गयी। उन्होंने टाटा समूह को कोलकाता से 45 किलोमीटर दूर जिस सिंगूर में जमीन देने का ऐलान किया वह पूरी की पूरी खेती की जमीन थी। जमीन भी थोड़ी नहीं पूरे एक हजार एकड़ दे दी गयी। जमीन के अधिग्रहण का जिम्मा भी बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार ने ही नहीं, कम्युनिस्ट पार्टी के कॉमरेडों ने अपने हाथ में ले लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि सिंगूर औद्योगिक निवेश के बजाय राजनीति के खूनी संघर्ष का अखाड़ा बन गया।
किसान तो विरोध में उतरे ही क्योंकि उनको उचित मुआवजा नहीं दिया गया लेकिन वो कामगार भी विरोध में उतर आये जिनकी जीविका इसी जमीन पर निर्भर थी। एक दो नहीं बल्कि पूरे 6,000 परिवारों के विस्थापन और रोजी रोटी का सवाल था। इसलिए फायरब्रांड नेता ममता बनर्जी को इस मुद्दे में अपने राजनीतिक विकास की पूरी संभावना नजर आयी। मई 2006 में सिंगूर में जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरु हुई और जून-जुलाई से ममता बनर्जी अलग अलग मांगों के साथ मैदान में उतर गयीं। जैसे खेती की जमीन न ली जाए। अगर लिया भी जाए तो हर परिवार के कम से कम एक सदस्य को नौकरी दिया जाए। जो विस्थापित होंगे उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जाए। जिनकी जमीन ली जा रही है उनको पर्याप्त मुआवजा दिया जाए और सबसे बड़ी मांग सीपीएम के पार्टी काडर को इस पूरे प्रकरण से दूर रखा जाए।
स्वाभाविक है ये सब कुछ न होना था और न हुआ। विवाद बढ़ा तो पर्दे के पीछे से माओवादी और नक्सलबाड़ी के नक्सली भी किसान मजदूर के हित में लड़ने के लिए पहुंच गये। कहते हैं उस समय नक्सलियों के कमांडर किशन जी ने पर्दे के पीछे से ममता बनर्जी का साथ दिया। "किसान मजदूर का हित" साधना हो तो ममता बनर्जी को नक्सली किशन जी की मदद लेने से भी कोई परहेज नहीं था। सिंगूर में झड़पें होती रहीं। राजनीतिक संघर्ष ही नहीं खूनी संघर्ष भी हुए।
बात जितनी बिगड़ती जा रही थी बुद्धदेब की सरकार उतनी सख्त होती जा रही थी। तय हुआ कि भारी पुलिसबल की मौजूदगी में अधिगृहित जमीन की घेरेबंदी की जाएगी। यह काम शुरु भी हुआ भी लेकिन इस काम ने पूरे प्रकरण में आग में घी का काम किया।
सिंगूर में टाटा कार प्रोजेक्ट के विरोध में 4 दिसंबर 2006 को ममता बनर्जी कोलकाता में आमरण अनशन पर बैठ गयीं। उनकी मांग थी कि सरकार तत्काल फेन्सिंग और पुलिस बल दोनों वहां से हटा ले। ममता बनर्जी का आमरण अनशन जैसे जैसे बढ़ता गया उनके प्रति देश भर में राजनीतिक समर्थन भी बढ़ता गया। कुल 25 दिन की भूख हड़ताल उन्होंने राष्ट्रीय नेताओं के बहुत समझाने बुझाने पर 29 दिसंबर को खत्म की और तत्काल उन्हें अस्पताल ले जाया गया। वहां से उनका स्वास्थ्य जो गिरा तो फिर पहले वाली स्थिति में कभी नहीं आ पाया।
खैर, सितंबर 2008 तक हर पक्ष की ओर से खींचतान चलती रही। सिंगूर से रहस्यमय तरीके से मार दिये किसानों की लाशें मिलती रहीं। इधर यह सब देखकर देशभर के कॉमरेड बुद्धिजीवी एकदम से अपने ही विचारधारा वाली सरकार के खिलाफ हो गये। उन्हें भी लग रहा था कि सिंगूर में साम्यवादी सरकार किसान मजदूर के बजाय टाटा समूह के साथ खड़ी है। सिंगूर में लगातार होती हिंसा और किसानों मजदूरों की रहस्यमयी मौतों को देखकर कोलकाता से लेकर दिल्ली तक जनवादी लेखकों, बुद्धिजीवियों, रंगकर्मियों ने जनवादी सरकार का ही विरोध किया, जिसके कारण आखिरकार बुद्धदेव सरकार बैकफुट पर जाने लगी।
ममता बनर्जी ने भी अपना रुख नरम करते हुए कहा कि अगर 400 किसानों की जमीन उन्हें वापस कर दी जाए जिन्होंने मुआवजा नहीं लिया है तो वो भी प्रोजेक्ट का विरोध छोड़ देंगी। तर्क यह भी दिया गया कि टाटा समूह को इतनी जमीन की जरूरत ही नहीं है जितनी उसे दे दी गई है। लेकिन अब तक टाटा समूह और बुद्धदेब सरकार दोनों समझ गये थे अब नैनो कार की फैक्ट्री सिंगूर में नहीं लग पायेगी। सब धीरे धीरे पीछे हटने लगे। शायद साम्यवादी सरकार में किये गये इस पूंजीवादी प्रयोग को लेकर इतने बवाल की उम्मीद किसी को नहीं रही होगी। न टाटा समूह को, न बुद्धदेब को और न ही उन किसानों को जिनकी जमीनें कब्जाई गयी थीं।
आखिरकार फरवरी 2008 में टाटा समूह ने ऐलान किया कि वो बंगाल छोड़कर गुजरात जा रहे हैं। कुछ साल बाद 2011 में बंगाल विधानसभा का चुनाव हुआ तो कम्युनिस्ट शासन भी बंगाल से बाहर चला गया। सिंगूर और नंदीग्राम प्रकरण से हीरो बनकर उभरी ममता बनर्जी राज्य की कुर्सी पर आसीन हो गयीं और आज तक मुख्यमंत्री बनी हुई हैं। ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के छह महीने के भीतर ही नवंबर 2011 में वो किशन जी भी पुलिस मुठभेड़ में मार दिये गये जो सिंगूर में पर्दे के पीछे से सक्रिय थे। इस तरह संसार से किशन जी भी विदा हो गये।
ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनी तो कानून बनाकर सिंगूर के किसानों की जमीन उन्हें वापस कर दी। देर से ही सही किसानों का भी संघर्ष सफल हुआ। वो भी खुशी खुशी इस पूरे प्रकरण से विदा हो गये। बच गया टाटा जिसका पैसा सिंगूर की जमीन खरीदने में खर्च हुआ था। अब आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने उनके पूंजी निवेश को अदा करने का आदेश बंगाल के उसी उद्योग विभाग को दिया है जिसके नाम पर सिंगूर में जमीन का अधिग्रहण किया गया था। स्वाभाविक है यह पैसा उन्हीं ममता बनर्जी की सरकार टाटा को अदा करेगी जिनकी वजह से टाटा को वहां से आखिरकार बाहर जाना पड़ा था।
अब सिंगूर में कोई घाटे में नहीं रहा। सबकी जितनी क्षति हुई उससे अधिक उसकी पूर्ति कर दी गयी। सिंगूर के किसानों को उनकी जमीन और मुआवजा दोनों मिल गया। ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की कुर्सी मिल गयी और टाटा समूह को मय सूद ब्याज के उनका पूंजी निवेश वापस मिल गया। इस पूरे प्रकरण में अगर कोई घाटे में रहा तो वह थी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी जिसकी सरकार ने हंसुए को हथौड़े से भिड़ने को मजबूर कर दिया था। बंगाल से कम्युनिस्ट शासन खत्म हुआ तो दिल्ली में उनका दबदबा जाता रहा। उनको जो क्षति हुई उसकी पूर्ति अब शायद कभी न हो। लेकिन राजनीतिक नैरेटिव के लिहाज से पूरी तरह बदल चुके भारत में क्या इस क्षति की पूर्ति कोई करना भी चाहेगा?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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