Same Sex Marriage: समलैंगिक संबंधों को लेकर धुंधली हुई तस्वीर
Same Sex Marriage: उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिक विवाह पर कानून बनाने में यह कहते हुए असमर्थता जता दी है कि कानून बनाने का अधिकार संसद और विधानसभा के पास है। हालांकि निर्णय के विस्तार में जाएं तो समलैंगिकों के हितों की रक्षा के लिए भी बहुत सी बातें कही गई हैं। इन्हीं बातों को लेकर इस खेमे में निर्णय को लेकर निराशा होते हुए भी आशावादी दृष्टिकोण बचा हुआ है।
गौर करने वाली बात यह है कि समलैंगिकता को "असंवैधानिक" नहीं बताया गया है बल्कि इनके वैवाहिक बंधन की स्थिति को स्वीकारने में असमर्थता बतायी गई है। साथ ही विधायिका को निर्देशित भी किया गया है कि वह चाहे तो इस विषय पर कानून बना सकती है।

समलैंगिकता को सामाजिक मान्यता नहीं है। इसके वैवाहिक बंधन में बंधने की कल्पना तो समाज कर ही नहीं सकता। सामाजिक मान्यताओं के अनुसार ऐसे सम्बन्ध "अप्राकृतिक" हैं। अब अप्राकृतिक कहने का अभिप्राय क्या है, यह भी समझ के परे है। इस सम्बन्ध में कहा जाता है कि अप्राकृतिक रूप से संतति उत्पन्न नहीं की जा सकती है और सामाजिक परिभाषा के अनुसार विवाह सम्बन्ध संतति उत्पन्न करने का शारीरिक, आत्मिक और भावनात्मक बंधन समझा जाता है। इस कारण इसे अप्राकृतिक बताकर खारिज किया जाता है क्योंकि ये यौनसुख का जरिया हो तो सकता है लेकिन संतान उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसी आधार पर पति पत्नी के बीच शारीरिक सम्बन्ध बनाने के 'अन्य तरीकों' को भी संविधान "अप्राकृतिक" बताता है।
अब अगर प्राकृतिक का सामान्य अर्थ लिया जाए तो जो स्वाभाविक रूप से प्रकृति द्वारा विचार और व्यवहार में है, तो अगर प्रकृति होमो सेक्सुअलिटी को स्वीकारती नहीं है तो मानवों के लिए तो इसे 'बीमारी या मन बढ़ऊपन' की संज्ञा दे देते हैं। परन्तु प्रकृति के जब अन्य जीवों में भी यह पाया जाता है और बड़ी संख्या में पाया जाता है। तो इस स्थिति को प्राकृतिक कहेंगे या अप्राकृतिक?
1960 के दशक में ऑस्ट्रिया के नोबेल पुरस्कार विजेता जूलॉजिस्ट कोनराड लॉरेंज ने करीब 1,500 प्रजातियों में समलैंगिकता के लक्षणों को देखने के लिए शोध किया था। अपनी रिसर्च में उन्होंने करीब 450 प्रजातियों के जीवों में कभी न कभी समलैंगिकता के लक्षण देखे। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के डॉ नाथन बैली ने साल 2004-05 में प्रकाशित अपने एक रिसर्च पेपर में भी कुछ ऐसी ही जानकारी दी है।
इस तरह के शोध बताते हैं कि हर प्रजाति में कभी न कभी समलैंगिक लक्षण या व्यवहार अलग-अलग कारणों की वजह से देखा जाता है। बन्दर, शेर, हाथी और जिराफ जैसे जंगली जानवर भी कभी कभार समलैंगिक लक्षण दिखा देते हैं। शेरनियां और हथनियां भी कभी कभी समलिंगी आकर्षण दिखाती हैं, वही जिराफ के जोड़ों में भी समलिंगी लक्षण दिखते हैं।
पशुओं के अलावा कई पक्षी जैसे पेंग्विन, ब्लैक स्वान, अबाबील, सारस आदि भी कभी कभी समलैंगिक व्यवहार करते देखे जाते हैं। इतना ही नहीं कीट-पतंगों की बात करें तो मक्खी, ततैया, छिपकली जैसे कीट भी कई बार समलैंगिक व्यवहार करते हैं। हालांकि जानवरों में समलैंगिक लक्षण का मुख्य कारण वही है जो मनुष्यों में है, हार्मोनल असंतुलन। इसके अलावा जानवरों में यह प्रक्रिया दल के नेता बनने में वर्चस्व की स्थापना, सेक्सुअल प्लेज़र, दबंगई और कीटों के मामले में कन्फ्यूज़न के कारण होता है।
यह सच है कि समलैंगिक रिश्तों की सामाजिक स्वीकृति विवाह संस्था में बंधे बिना संभव नहीं इसलिए इसे अप्राकृतिक समझने के आधार पर चर्चा सबसे जरुरी है। इस मामले में न्याय व्यवस्था और विधायिका पक्ष एवं विपक्ष दोनों मोर्चों पर खेलती नज़र आती है। आप ना तो ब्लैक शेड अपनाकर इसे सिरे से खारिज करते नज़र आते हैं ना इनके विवाह को कानूनी जामा देकर आप इनके हितों की रक्षा करते नज़र आते हैं। कहना सरल है कि सरकार देखे कि इनके हितों की रक्षा हो और भेदभाव ना किया जाए पर सच्चाई यही है कि जो समाज अपने ही बच्चों में इसे बीमारी के तौर पर देखकर रेप तक कराने में गुरेज़ नहीं करता वो क्या वास्तविक पटल पर इनके हितों की सुरक्षा कर पायेगा?
न्यायालय या विधायिका सामाजिक सोच नहीं बदल सकते। समलैंगिकता को लेकर कितने भी जन जागरूक अभियान चलाये जाएं, सच यही है कि समाज तो दूर परिवार तक इसे बिमारी और शर्मिंदगी के रूप में ही देखता है। समलैंगिक समाज के लिए काम करने वाले अनेक संस्थाओं ने यह रिपोर्ट किया है कि भूत-प्रेत की बाधा मानकर परिवार अक्सर इनकी झाड़-फूंक करवाते हैं।
दिल्ली की एक रिपोर्ट के अनुसार इलेक्ट्रिक शॉक तक से इलाज करवाने में भी परिवार पीछे नहीं रहता। सबसे दुखद और पीड़ादायी है 'सुधारात्मक बलात्कार' या 'उपचारात्मक बलात्कार'! परिवार समझता है कि गे या लेस्बियन बच्चों को पता ही नहीं है कि दूसरे लिंग के साथ सानिध्य का तात्पर्य या आनंद क्या है इसलिए उसका अनुभव देने के उद्देश्य से परिवार द्वारा ही उनसे जबरन संबंध बनवाया जाता है।
2015 में सिर्फ तेलांगना में 15 ऐसे बलात्कार के केस रिपोर्ट किये गए थे जहाँ 'अनुशासनात्मक कार्यवाही' और 'अनुभव' के नाम पर परिवार के सदस्य जिसमें अधिकांश चचेरे ममेरे भाई होते हैं, ऐसे बलात्कार को अंजाम देते हैं। गै लड़कों को "ठीक करने" के लिए रिश्ते की महिलाओं द्वारा जबरदस्ती संबंध बनाने के प्रयासों की अपुष्ट खबरें आ चुकी हैं। ऐसे कई मामले रिपोर्ट ही नहीं पाते हैं। निश्चित रूप से ऐसे कुकृत्य भावनात्मक पीड़ा और कष्ट की पराकाष्ठा होते हैं।
ऐसा नहीं है कि समलैंगिकों के खिलाफ सिर्फ समाज और परिवार ही अपराध करता है। अस्वीकृति के बोझ तले समलैंगिक भी कई बार अपराधी बन जाते हैं। कुछ साल पहले यूपी में मऊ की एक घटना ने सबको सकते में डाल दिया था जब वारिस हुसैन की चार साल की पुत्री इस्मत को एक नाबालिग लड़की ने इसलिए मार दिया था क्योंकि परिवार उसकी लेस्बियन पार्टनर इस्मत की बड़ी बहन से मिलने में बाधक बन रही थी। पुलिस ने हत्या में नाबालिग समेत उसके पिता बद्री सेठ और भाई मनीष को भी गिरफ्तार किया था।
ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिक संबंधों को लेकर असमर्थता जतायी और कई पहलू सही भी लगते हैं। जैसे विवाह संस्था में पति और पत्नी के अधिकार संविधान द्वारा दिये गए हैं। ऐसे समलैंगिक जोड़ों में मुश्किल होगा यह जानना कि पति कौन है और पत्नी कौन? घरेलू हिंसा, दहेज़ जैसे मामलों के निपटारे में असमंजस की स्थिति आएगी। सेम सेक्स मैरिज के बाद अगर तलाक की नौबत आती है तो कानून कैसे काम करेगा? इन सारे सवालों पर जस्टिस भट्ट ने ठीक ही कहा है कि "हम इस बात से सहमत हैं कि समलैंगिक जोड़ों को संबंध बनाने का अधिकार है। हम स्पष्ट रूप से मानते हैं कि यह अनुच्छेद 21 के अंतर्गत सबको अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार है परन्तु विवाह मौलिक अधिकार में आता ही नहीं है इसलिए इसे इस परिधि से दूर किया गया है।"
मौजूदा सरकार के मंतव्य के अनुसार यह न सिर्फ देश की सांस्कृतिक और नैतिक परंपरा के खिलाफ है, बल्कि इसे मान्यता देने से पहले 28 कानूनों के 160 प्रावधानों में बदलाव करना होगा। ऐसे हालात में समलैंगिक रिश्तों को वैध बताने के बाद भी विवाह की सामाजिक और कानूनी मुहर न लगाकार एक धुंधली सी स्थिति पैदा कर दी गई है। समलैंगिक जोड़ों की सुरक्षा और हितों की रक्षा सर्वोपरि है परन्तु जब सरकार ही इसे 'नैतिकता के विरुद्ध' बताएगी तो आगे रास्ता कैसे खुलेगा?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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