IT Act 66A : सर्वोच्च न्यायालय ने दुहराया अपना ही फैसला
सर्वोच्च न्यायालय ने जोर देकर कहा है कि सूचना प्रोद्यौगिकी अधिनियम, 2000 (आईटी एक्ट) की धारा 66ए के अन्तर्गत अब किसी नागरिक पर कार्रवाई ना की जाए।
सात साल पहले 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने कानून की विद्यार्थी श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ के मामले के अपने फैसले में ही इस धारा को असंवैधानिक घोषित कर दिया था लेकिन इसके बावजूद इसके तहत लोगों पर केस दर्ज किए जाते रहे। जिसमें सबसे अधिक गिरफ्तारी नेताओं पर नागरिकों की टिप्पणियों के कारण हुई।

श्रेया जिस मामले को न्यायालय तक लेकर आई थी, वह बाला साहब की मृत्यु के बाद मुम्बई बंद पर सोशल मीडिया की टिप्पणी से जुड़ी थी। इस आरोप में शाहीन और रेणु श्रीनिवासन को गिरफ्तार भी किया गया था।
2015 के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि जो बात किसी एक के लिए अपमानजनक हो सकती है, वह किसी दूसरे लिए नहीं भी हो सकती है।
वास्तव में सोशल मीडिया पर जब कोई लिख रहा होता है, उस लिखने का एक संदर्भ होता है। महत्वपूर्ण यह है कि लिखने वाले ने क्या संदर्भ लिया है। सोशल मीडिया पर यह बात लेखक से पूछी जा सकती है।
लेकिन देखा यह गया है कि टिप्पणी करने वालों का एक समूह कई बार लेखक के संदर्भ की परवाह तक नहीं करता। बात का मनचाहा मतलब निकालकर उस लेखक पर हमला कर देता है।
जिस मुद्दे पर टिप्पणियों के माध्यम से विमर्श होना चाहिए, वह समूह वहां कुछ नई बात शुरू कर देता है जिससे मुद्दे पर बात ना हो पाए।
कमेन्ट वाले हिस्से में गाली-गलौज देखकर कोई भी सभ्य व्यक्ति वहां जाकर टिप्पणी करने से परहेज करता है। कई बार असहमत होने वालों का समूह टैग करके भीड़ जुटा लेता है। इस ट्रोल समुदाय से शायद ही ऐसा कोई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हो जो अब तक बचा होगा।
कई वेबसाइट और यू ट्यूबर्स ने अपना कमेन्ट वाला हिस्सा इसलिए बंद कर लिया क्योंकि उसमें मुद्दे पर संवाद की इच्छा रखकर आने वालों की संख्या पर ट्रोल का हमला भारी पड़ने लगा।
कई बार अपनी बात को सही मनवाने का आग्रह इतना प्रबल हो जाता है कि लोग मर्यादा की लक्ष्मण रेखा पार कर जाते हैं और फिर कानून की आवश्यकता पड़ती है। जबकि दो लोग आपसी संवाद में मर्यादा का ध्यान रखें तो वे अपने संवाद को विमर्श के शिखर तक ले जा सकते हैं।
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सोशल मीडिया उस परंपरा को बढ़ाने के लिए एक आदर्श माध्यम हो सकता था लेकिन उस दिशा में काम नहीं हो सका। परिणाम यह हुआ कि सोशल मीडिया की गंभीरता कम हुई।
तकनीकी और कानून की बुनियादी समझ रखने वालों के लिए यह समझना मुश्किल नहीं है कि तकनीक के क्षेत्र में गत कुछ वर्षो में जिस तरह की क्रांति आई है, उस गति से भारतीय कानूनों में परिवर्तन संभव नहीं हुआ। इस वजह से कानून और तकनीकी के बीच एक दूरी बनी जो समय के साथ साथ बढ़ती गई।
तकनीकी और आईटी से जुड़े भारतीय कानूनों के बीच बीते दस-बीस सालों में खाई इतनी गहरी हो गई कि सामने आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए मौजूदा कानून में सुधार की आवश्यकता महसूस की जाने लगी।
आईटी से जुड़ा प्रारंभिक कानून वर्ष 2000 में लाया गया था। आईटी एक्ट 2000 के बिल को उस समय के सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रमोद महाजन ने संसद में पेश किया था। इसमें 2008 में सुधार किया गया।
इसके प्रावधान को लेकर एक याचिका सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंची और वर्ष 2015 में 66-ए को खत्म कर दिया गया लेकिन इसके अन्तर्गत गिरफ्तारी उसके बाद भी जारी रही। अब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित की अगुवाई वाली बेंच ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जिन लोगों के खिलाफ भी इस कानून के अन्तर्गत मामला चल रहा है उसे निरस्त किया जाए।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश है कि देश में किसी के भी खिलाफ आईटी एक्ट की धारा 66 ए के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज न किया जाए और न ही इस धारा के तहत किसी के खिलाफ अभियोजन चलाया जाए।
इस मामले के वकील संजय पारिख एक साल पहले भी सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे पर गए थे कि उसके आदेश के बाद भी समाज में जागरूकता नहीं आई है। इस दिशा में न्यायालय को ध्यान देना चाहिए।
अब तक सैकड़ों मामले 2015 के आदेश के बावजूद देश भर के न्यायालयों में विचाराधीन हैं। अब न्यायालय ने निर्देश दिया है कि 66 ए अन्तर्गत जितने भी मामले विचाराधीन हैं, उन्हें खत्म किया जाएगा। वे न्यायालय में चलेंगे नहीं। अब कोई भी पुलिस अधिकारी आईटी की धारा 66ए के अन्तर्गत कोई मामला दर्ज नहीं करेंगा।
आईटी की धारा 66ए के अन्तर्गत हुई कुछ गिरफ्तारियों ने इस कानून के दुरुपयोग की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसमें बाला साहब की मृत्यु के बाद पालघर से हुई दो छात्राओं की गिरफ्तारी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का कार्टून बनाने के लिए जाधवपुर विश्वविद्यालय से अम्बिकेश महापात्रा और सुब्रता सेनगुप्ता की गिरफ्तारी, पी चिदम्बरम के बेटे कार्ति चिदम्बरम पर पोस्ट करने के लिए व्यावसायी रवि श्रीनिवासन का जेल जाना, उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार की आलोचना करने के लिए अनुसूचित जाति से आने वाले लेखक कंवल भारती की गिरफ्तारी कुछ प्रमुख मामले हैं।
वर्ष 2015 के फैसले में 66 ए को खत्म करने की बात अवश्य की गई थी लेकिन साथ ही साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की 69 ए को सही ठहराया गया था। इस अधिनियम ने साइबर अपराध से निपटने के लिए केन्द्र सरकार को कई विशेषाधिकार दिए हैं।
इसके अन्तर्गत केन्द्र सरकार को ऑनलाइन कन्टेन्ट को ब्लॉक करने और साइबर अपराधी को गिरफ्तार करने का अधिकार मिलता है। इससे सरकार को साइबर अपराध और इलेक्ट्रॉनिक कामर्स से जुड़े अपराधों से निपटने में मदद मिलती है। केन्द्र सरकार किसी भी सोशल मीडिया और वेबसाइट से आपत्तिजनक सामग्री हटाने के लिए दिशानिर्देश जारी कर सकती है।
वैसे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद एक बार फिर यह बहस चल पड़ी है कि सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी की हद क्या होगी? क्या इसका मतलब कुछ लोगों के लिए सोशल मीडिया पर अपशब्द कहने का पूर्ण स्वराज माना जाएगा? यह बात पूरी तरह सच नहीं है।
66 ए के अतिरिक्त भी सरकारों के पास कई तरह के कानूनी अधिकार हैं, जिसके दायरे में रहकर साइबर अपराधियों पर ना सिर्फ वह नजर रख सकती है बल्कि उन पर नकेल भी कस सकती है। इसके अतिरिक्त अपराधियों पर पोर्नोग्राफी, हेट स्पीच, मानहानि से जुड़े कानून के अन्तर्गत भी कार्रवाई की जा सकती है।
गृह मंत्रालय ने 20 दिसम्बर 2018 को एक आदेश जारी किया था। जिसमें मंत्रालय ने दस केन्द्रीय एजेन्सियों को यह अधिकार प्रदान किया है कि वह किसी भी कम्प्यूटर की सामग्री को मॉनीटर कर सकते हैं। किसी सामग्री को प्रसारित होने से रोकें और आवश्यकता पड़ने पर उसे डिकोड करें।
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69 ए केन्द्र सरकार को यह शक्ति प्रदान करती है कि देश की संप्रभुता और देश की रक्षा-सुरक्षा, दूसरे देशों के साथ मित्रतापूर्ण संबंध यदि किसी आनलाइन सामग्री से प्रभावित हो सकता हो तो उसे ब्लॉक कर दें। आवश्यकता हो तो उस व्यक्ति को गिरफ्तार भी कर ले।
सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी वैधता को स्वीकार किया है और माना है कि किसी प्रावधान में जिस तरह के संतुलन की आश्यकता होनी चाहिए वह 69 ए में है।
यह सच है कि सर्वोच्च न्यायालय ने हमारे कहने की आजादी के पक्ष में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। इस तरह उसने आम नागरिकों की अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा की है। ऐसे में अब क्या देश का आम नागरिक होने के नाते हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि हम भी सोशल मीडिया का उपयोग सोच समझ कर करें?
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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