इंडिया गेट से: मोहम्मद जुबैर पर इतनी मेहरबानी क्यों मी लार्ड?
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस चंद्रचूड़ ने अल्ट न्यूज वाले मोहम्मद जुबेर को जमानत दे दी है। उसके खिलाफ दायर सभी एफआईआर को दिल्ली ट्रांसफर करने के साथ आगे की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट में करने का आदेश भी दिया गया है। जस्टिस चन्द्रचूड ने अपने आदेश में यह भी लिख दिया है कि संबंधित मामले में उसके खिलाफ अगर कोई नई एफआईआर दाखिल होती है तो भी गिरफ्तारी नहीं होगी।

मोहम्मद जुबेर वही व्यक्ति है जिसने अपने ट्वीट के जरिए नूपुर शर्मा के खिलाफ मुसलमानों को भड़काया था। नतीजतन जुम्मे की नमाज के बाद अनेक मस्जिदों में मोहम्मद जुबेर के ट्वीट के पर्चे बांटे गए, जिन्हें पढ़कर वे भड़क गए और कई जगह पर आगजनी की घटनाएं हुई। उतर प्रदेश सरकार के वकीलों ने जस्टिस चन्द्रचूड के सामने मोहम्मद जुबेर के काले चिठ्ठों का पिटारा खोलकर रख दिया था। इसके बावजूद उन्होंने मोहम्मद जुबेर को क्लीन चिट दे दी।
सुप्रीम कोर्ट का यह गजब का आदेश है कि भविष्य की एफआईआर पर भी यही जमानत काम करेगी। जो वामपंथी मानवाधिकारवादी नूपुर शर्मा की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे, उन्हीं वामपंथी मानवाधिकारवादियों ने मोहम्मद जुबेर की गिरफ्तारी के खिलाफ अभियान छेड़ा हुआ था। खासकर दिल्ली में एक ऐसा गैंग सक्रिय है जो सिलेक्टिव मानवाधिकारवादी है। उन्हें जुबैर का मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आज़ादी तो दिखती है लेकिन उसकी सांप्रदायिक हिंसा फैलाने वाली प्रवृति नहीं दिखती।
मोहम्मद जुबेर फैक्ट चेक के नाम पर साम्प्रदायिकता भड़काता रहा है। इसी मोहम्मद जुबेर ने ही नूपुर शर्मा की टीवी डिबेट पर की गई हदीसों पर आधारित सामान्य प्रतिक्रिया को ईश निंदा बता कर देश और दुनिया के मुसलमानों को साम्प्रदायिक हिंसा के लिए भड़काया था। यहाँ तक कि हिन्दुमलकोट सीमा से रिजवान अशरफ नाम का एक युवक नूपुर शर्मा की हत्या करने लिए पाकिस्तान से भारत में घुस आया है।
नूपुर शर्मा मौत के साए में जी रही है और उसका समर्थन करने पर दो लोगों का सर काटा जा चुका है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जजों जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस सूर्यकांत ने इन घटनाओं के लिए मोहम्मद जुबेर को जिम्मेदार ठहराने की बजाए नूपुर शर्मा को जिम्मेदार ठहरा दिया था। हैरानी यह है कि अनेकों प्रमाण मौजूद होने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने मोहम्मद जुबेर को जमानत दे दी है, जबकि नूपुर शर्मा को कहा गया था कि वह हाईकोर्ट जाए। हालांकि देश भर में भारी विरोध प्रदर्शनों के बाद नूपुर
शर्मा पर बेजा टिप्पणियाँ करने वाले दोनों जजों ने अब नूपुर शर्मा की याचिका स्वीकार कर ली है। इसे कुछ लोग यूटर्न तो कुछ लोग अपनी गलती को सुधारना कर रहे हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाही को देखें तो ऐसा लगता है जैसे जजों ने कई किन्तु-परन्तु के साथ नुपुर शर्मा को 10 अगस्त तक गिरफ्तारी से जो राहत दी है वह एक प्रकार से जुबैर को संपूर्ण राहत देने के लिए रास्ता बनाया गया। जस्टिस चन्द्रचूड ने 18 जुलाई को ही संकेत दे दिया था कि वह मोहम्मद जुबेर को जमानत दे सकते हैं।
ऐसा लगता है कि मोहम्मद जुबेर की तरह नूपुर शर्मा की गिरफ्तारी पर रोक लगाना बेलेंसिंग एक्ट है। यह कैसे हुआ कि तीनों जजों के फैसले अचानक एक जैसे हो गए? हालांकि उन दोनों जजों ने अभी भी नूपुर शर्मा के खिलाफ दायर सभी एफआईआर को दिल्ली ट्रांसफर नहीं किया है। दोनों जजों ने राज्यों को आदेश देकर 10 अगस्त तक उनका जवाब मांगा है जबकि जस्टिस चन्द्रचूड ने मोहम्मद जुबेर के खिलाफ दायर सभी एफआईआर को दिल्ली ट्रांसफर करने के आदेश जारी कर दिए। यह सुप्रीमकोर्ट का दोहरा चेहरा उजागर करता ही है, सांप्रदायिक नफरत फैलाने वालों को प्रोत्साहित करने वाला कदम भी है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने मोहम्मद जुबेर की उस याचिका का कड़ा विरोध किया था, जिसमें उसने उसके खिलाफ दायर सभी एफआईआर रद्द करने की मांग की थी। जुबेर की याचिका का विरोध करते हुए यूपी सरकार की वकील ने कहा था कि वह कोई पत्रकार नहीं है, वह खुद को फैक्ट चेकर कहता है, लेकिन उसके वायरल ट्वीट फैक्ट चेक से संबंधित नहीं होते, बल्कि सांप्रदायिक हिंसा भड़काने वाले होते हैं, जिसके बाकायदा उसे पैसे मिलते हैं।
कोर्ट में सरकारी वकील ने कहा की मोहम्मद जुबेर ने पूछताछ के दौरान यह कबूल किया है कि उसे ट्वीट करने के लिए 2 करोड़ रूपए मिले हैं। नागरिकों का फर्ज बनता है कि वे सांप्रदायिकता फैलाने वाले वीडियो की सूचना पुलिस को दें, लेकिन मोहम्मद जुबेर सांप्रदायिकता फैलाने वाले वीडियो और भाषणों का लाभ उठाता है और प्रचारित करके सांप्रदायिकता फैलाने का काम करता है।
कोर्ट में गाजियाबाद की वह घटना भी बताई गई, जिसमें मोहम्मद जुबेर और दो वामपंथी पत्रकारों सबा नकवी और राणा अय्यूब ने एक मुस्लिम की दाढी काटने और जय श्रीराम के नारे लगवाने वाला झूठा वीडियो पोस्ट किया था। उस वीडियो ने पूरे देश का माहौल खराब कर दिया था, जबकि दाढी काटने वाले आरोपियों में एक हिन्दू को छोड़ कर बाकी सारे मुस्लिम थे और कोई नारेबाजी नहीं करवाई गई थी।
यह एक आपसी झगड़े का मामला था, लेकिन मोहम्मद जुबेर और इन दोनों पत्रकारों ने झूठी अफवाह फैला कर विपक्ष के नेताओं को भी गुमराह किया, जिन्होंने इसे बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक रंग देकर मुसलमानों को भड़काया। देश की प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने तो अपना प्रतिनिधिमंडल ही प्रभावित के घर भेज दिया था।
गाजियाबाद की घटना में कोई सांप्रदायिक एंगल नहीं था, लेकिन उसने अपने ट्वीट्स में ऐसे शब्द जोड़े जिन्होंने मुसलमानों की भावनाएं भडका दीं थीं। यह आपसी झगड़े का एक स्थानीय मुद्दा था लेकिन वह अपने हर ट्वीट्स में पूरे देश के बारे में बात करना शुरू कर देता है।
वैसे तो वह खुद को फैक्ट चेकर कहता है लेकिन गाजियाबाद की इस घटना का फैक्ट चेक करने की बजाए देश भर में सांप्रदायिक हिंसा फैलाने का काम किया। इसी तरह उसने एक टीवी डिबेट का वीडियो ट्वीट करते हुए कहा कि यह बजरंग मुनि के बारे में है, जबकि उसका बजरंग मुनि से कोई लेना-देना नहीं था।
यूपी सरकार की वकील ने सुनवाई के दौरान जस्टिस चन्द्रचूड को यह भी बताया कि उसने 10 साल की बच्ची के बारे में भी ट्वीट किया, जिस पर बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने उसके खिलाफ पोक्सो एक्ट में एफआईआर दर्ज करवाई थी। इसी तरह खैराबाद मामले में किसी के आपत्तिजनक बयान की पुलिस को सूचना देने के बजाय उसने भड़काने वाला एक और ट्वीट किया, जिसके वायरल होने से स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई थी कि भारी पुलिस बल की जरूरत पड़ी। इन सब तथ्यों के बावजूद जस्टिस चन्द्रचूड ने स्वयंभू मानवाधिकारवादियों की ओर से उसके बचाव में चलाये जा रहे अभियान से प्रभावित हो कर उसे जमानत दे दी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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