EWS Reservation: आर्थिक आधार पर आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, मोदी सरकार को मिली नैतिक जीत
EWS Reservation: आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से केंद्र सरकार को नैतिक जीत मिली है। आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण (EWS resrvation) पर सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगा दी है।
सुप्रीम कोर्ट में 5 जजों की बेंच ने 3-2 से 10 प्रतिशत आरक्षण का समर्थन किया है। जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने समर्थन में जबकि चीफ जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस रविंद्र भट्ट इसके खिलाफ रहे।

दरअसल, 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार ने सामान्य वर्ग के लोगों को आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए संविधान में 103वां संशोधन किया था। इसके विरोध में सर्वोच्च न्यायालय में 40 से अधिक याचिकाएं दायर हुई थीं, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 27 सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के 103वें संशोधन को वैधानिक मान्यता दे दी है तो आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण पर स्वीकारोक्ति की मुहर लग गई है।
EWS आरक्षण और 103वां संविधान संशोधन
मोदी सरकार ने वर्ष 2019 में 103वें संविधान संशोधन के माध्यम से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 में संशोधन किया। संशोधन के माध्यम से भारतीय संविधान में अनुच्छेद 15 (6) और अनुच्छेद 16 (6) सम्मिलित किया गया ताकि अनारक्षित वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण का लाभ प्रदान किया सके। उक्त संशोधन में संविधान के अनुच्छेद 30 के खंड (1) में संदर्भित अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को शामिल नहीं किया गया। संशोधन के तहत आरक्षण की अधिकतम सीमा 10 प्रतिशत है जो कि मौजूदा आरक्षण के अतिरिक्त है।
विरोध में उतरे थे सैकड़ों संगठन
मोदी सरकार के इस निर्णय के विरुद्ध देशभर के सैकड़ों संगठन सड़क से संसद तक विरोध में उतर गए थे और दर्जनों संगठनों ने न्यायालयों का रुख कर लिया था। याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि 103वां संविधान संशोधन संविधान के मूल ढाँचे में बदलाव करता है और उसकी मूल भावना के विरुद्ध है। उनका यह भी कहना था कि सरकार द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिये लागू किये गए आरक्षण के प्रावधान सुप्रीम कोर्ट द्वारा लागू की गई 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन करते हैं।
गौरतलब है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को पहले से ही क्रमशः 15 प्रतिशत, 7.5 प्रतिशत और 27 प्रतिशत की दर से आरक्षण दिया जा चुका है। हालांकि याचिकाकर्ताओं के इस तर्क पर सवाल उठे थे क्योंकि तमिलनाडु सहित कई राज्यों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक है। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका में यह भी कहा गया था कि उक्त संविधान संशोधन 1992 में इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गए निर्णय के विपरीत है जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि पिछड़े वर्ग का निर्धारण केवल आर्थिक कसौटी के संदर्भ में नहीं किया जा सकता।
सरकार ने भी पुरजोर तरीके से रखा अपना पक्ष
सर्वोच्च न्यायालय में केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए तर्क दिया था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के सामाजिक उत्थान के लिये आरक्षण की व्यवस्था करना आवश्यक है क्योंकि इस वर्ग को आरक्षण प्रावधानों का लाभ नहीं मिलता है। उनके लिए आरक्षण के प्रावधान से लगभग 20 करोड़ लोगों को लाभ होगा जो अभी भी गरीबी रेखा से नीचे हैं। तत्कालीन अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी आरक्षण के 50 प्रतिशत के प्रावधान को सरकार ने नहीं तोड़ा है। उन्होंने कहा था, यह आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा से बाहर आने वाले सामान्य वर्ग के लोगों के लिए है और यह 50 प्रतिशत आरक्षण वाले समूह (वंचित समूह) का हक नहीं मारता।
कौन होंगे EWS आरक्षण के पात्र
इस आरक्षण के प्रावधान के अनुसार सामान्य वर्ग के ऐसे व्यक्ति जिनके परिवार की सालाना आय 8 लाख से अधिक न हो, कृषि योग्य भूमि 5 एकड़ से कम हो, 1000 फीट से कम में आवासीय घर हो, अधिसूचित नगरपालिका में 100 गज से कम का प्लाट तथा गैर अधिसूचित नगरपालिका में 200 गज से कम का प्लाट हो; को इसका लाभ मिलेगा। इसमें SC, ST और OBC वर्ग के लोगों को शामिल नहीं किया जाएगा। इसी कारण से चीफ जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस रविंद्र भट्ट ने अपनी असहमति व्यक्त की।
चीफ जस्टिस यूयू ललित ने व्यक्त की असहमति
भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में मात्र 74 दिन कार्यभार संभालने वाले जस्टिस यू.यू. ललित का कार्यकाल 8 नवंबर को पूरा हो गया। अपने कार्यकाल के अंतिम दिन उन्होंने EWS आरक्षण पर पीठ के फैसले से असहमति जताई। वे फैसला सुनाने वाली 5 जजों की संवैधानिक पीठ के अध्यक्ष थे।
फैसले से सामाजिक न्याय का भाव पुष्ट होगा
सुप्रीम कोर्ट के गरीब सवर्णों के 10 प्रतिशत आरक्षण पर मुहर लगाने से अब निश्चित रूप से सामाजिक न्याय का भाव पुष्ट होगा। दरअसल, आरक्षण को भी राजनीतिक दलों ने अपनी सुविधानुसार राजनीति चमकाने का जरिया बनाया हुआ है। 'संविधान की मूल भावना से खिलवाड़' सही मायनों में राजनीतिक दलों ने ही किया है अन्यथा क्या कारण है कि कई राज्यों में जहाँ परिवारवाद की राजनीति का बोलबाला है, वहां आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा को पार कर चुका है और इस पर कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है।
बदलती आर्थिक व्यवस्थाओं में गरीबी अमीरी जाति देखकर नहीं आती है। देखने में ये आ रहा है कि गरीबी और पिछड़ापन उनमें भी है जिन्हें अगड़ा कहा जाता है। ऐसे में उन अगड़ों में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को भी 10 प्रतिशत का आरक्षण मिलता है तो यह किसी कल्याणकारी राज्य का कार्य ही समझा जाएगा। लेकिन बीते कुछ समय से इसके खिलाफ कुतर्कों की बाढ़ आ गई थी। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा इस पर मोहर लगा देने के बाद अब विपक्ष को इस पर राजनीति बंद कर देना चाहिये। जो हुआ है वह भारतीय लोकतंत्र और संविधान निर्माताओं की भावना के अनुरूप ही हुआ है।
यह भी पढ़ें: EWS Quota: आर्थिक आधार पर आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट की मुहर से क्यों खुश हो रही है बीजेपी ?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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