EWS Quota: आर्थिक आधार पर आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट की मुहर से क्यों खुश हो रही है बीजेपी ?
EWS verdict Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को 10% आरक्षण देने के केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के ऐतिहासिक फैसले को संविधान के अनुकूल बताया है। यह फैसला भाजपा के लिए आने वाले चुनावों से लेकर अगले लोकसभा चुनावों तक के लिए वोटों का बूस्टर माना जा रहा है। क्योंकि, इस फैसले से उपचुनावों में बढ़िया प्रदर्शन के एक दिन बाद ही पार्टी का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच गया है। फिलहाल तो हिमाचल प्रदेश और गुजरात में उसे इसका लाभ मिल सकता है।

मोदी सरकार के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर
आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का फैसला केंद्र में भारतीय जनता पार्टी का था, जिसपर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने मुहर लगा दी है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने ऊंची जातियों या सामान्य वर्ग के गरीबों को आर्थिक आधार पर सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में नामांकन के लिए 10% आरक्षण की व्यवस्था की थी। इसके लिए मोदी सरकार ने संसद से 103वां संविधान संसोधन पारित करवाया था। यह कदम 2018 के आखिर में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव परिणामों के तत्काल बाद यानि 2019 के जनवरी महीने में उठाया गया था। इन तीनों राज्यों में भाजपा की सरकारें चली गई थीं।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर जश्न
2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ऊंची जातियों के गरीबों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का फैसला पूरी तरह से राजनीतिक निर्णय था और आमतौर पर बाकी विपक्षी दलों के लिए भी इसका सामने से विरोध करना नामुमकिन था। ऊंची जातियों को भाजपा के एक आधार वोटर बेस में गिना जाता है। हालांकि, समाज के एक तबके में तभी से विभिन्न दलीलों के साथ इसपर आपत्ति भी जताई जाने लगी थी। आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को 10 फीसदी आरक्षण देने के फैसले को तत्काल ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई थी, जिसमें सीजेआई यूयू ललित की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय संवैधानिक खंडपीठ ने सोमवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जिसके बाद से देश में जश्न भी शुरू हो चुके हैं। (ऊपर वाली तस्वीर फैसले के बाद-जम्मू की है, जहा शिवसेना डोगा फ्रंट ने जश्न मनाया है।)

बीजेपी के लिए बूस्टर की तरह है फैसला
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपने फैसले पर शुरू से यही दलील रखी थी कि इससे लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में मदद मिलेगी और उसका फैसला किसी भी तरह से संवैधानिक प्रावधानों या सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों का उल्लंघन नहीं करता है। सोमवार को आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला मोदी सरकार के उसी नजरिए की जीत है। जाहिर है कि गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों से ठीक पहले आया यह फैसला बीजेपी के लिए मनोबल और वोटों के बूस्टर के तौर पर काम करेगा।

पीएम मोदी के गरीब कल्याण के नजरिए को श्रेय मिला-भाजपा
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष ने तत्काल इस फैसले पर ट्विटर के जरिए प्रतिक्रिया देते हुए कहा है, 'सुप्रीम कोर्ट ने अनारक्षित वर्ग को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के तहत आरक्षण दिए जाने की कानूनी वैद्यता बरकरार रखी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गरीब कल्याण की दृष्टि को एक और बड़ा श्रेय मिला है। सामाजिक न्याय की दिशा में भी एक बड़ा प्रोत्साहन। ' भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव सीटी रवि ने भी संतोष के नजरिए का समर्थन करते हुए कहा है कि भारत के गरीबों को सामाजिक न्याय दिलाने के मोदी के मिशन के लिए यह फैसला एक और बड़ी जीत है।

हिमाचल और गुजरात में भाजपा को मिल सकता है लाभ
आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% आरक्षण का कोटा 2019 से ही लागू है और सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सिर्फ इस फैसले को बरकरार रखा है। लेकिन, भाजपा के जोश हाई होने की वजह हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनावों से लेकर 2024 के लोकसभा चुनावों तक मिलने वाले संभावित फायदे के तौर पर देखा जा सकता है। हिमाचल प्रदेश में सामान्य वर्ग की आबादी एचटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 50.72% है। जबकि, गुजरात में सामान्य वर्ग की जनसंख्या करीब 26% बताई जाती है। इसी तरह से नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक देशभर में सामान्य वर्ग की जनसंख्या करीब 30% बताई जाती है।

कांग्रेस की असमंजस कायम!
कांग्रेस समेत ज्यादातर विपक्षी दलों ने ईडब्ल्यूएस कोटा का विरोध नहीं किया था। लेकिन, तमिलनाडू राज्य समेत कम से कम 40 याचिकाएं इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट में डाली गई थीं। तमिलनाडु देश का वह राज्य है, जहां सबसे ज्यादा आरक्षण दिया जाता है। बीजेपी के नजरिए से साफ है कि इस फैसले से उसका अपना जनाधार और मजबूत हुआ है और निश्चित तौर पर वह आने वाले चुनावों में इसका फायदा उठाने की कोशिश करेगी। लेकिन, कांग्रेस अब एक नए असमंजस में दिख रही है। पार्टी नेता उदित राज ने सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद कहा है कि वह 'आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को आरक्षण का विरोध नहीं कर रहे, लेकिन मैं सुप्रीम कोर्ट की ऊंची जाति वाली मानसिकता को चुनौती देता हूं। जब अनुसूचित जाति/ जनजाति/ओबीसी के लिए आरक्षण का दायरा 50% से बढ़ाने की बात आती है तो वह इंद्रा साहनी फैसले का हवाला देता है। आज उन्होंने संविधान का हवाला देकर कहा कि ऐसी कोई सीमा नहीं है.......'
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