Minority Status: अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर बुरी फंसी हुई है मोदी सरकार

Minority Status: भारत की आज़ादी के साथ साथ जब धार्मिक आधार पर देश का बंटवारा हो गया था, तो किसी ने कल्पना नहीं की थी कि हिन्दू बहुल आबादी के आधार पर बने भारत में कभी हिंदू ही अपने लिए अल्पसंख्यक का दर्जा मांगेंगे।
संविधान में अल्पसंख्यक शब्द का उल्लेख तो है, लेकिन उसकी परिभाषा निर्धारित नहीं की गई। संविधान के मसौदे में सिख, जैन और बौद्ध संप्रदायों को हिंदू ही माना गया था। संविधान के लागू होने के बाद जैनियों ने इसका विरोध किया तो उन्हें अलग धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा दे दिया गया। इसी तरह सिखों ने भी इसका विरोध किया, तो उन्हें भी अलग धर्म का दर्जा दे दिया गया। हिन्दुओं को बांटने की यह राजनीति वोट बैंक के लिए थी, किसी सिद्धांत पर आधारित नहीं थी।

1978 में गृहमंत्रालय में और फिर कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत अल्पसंख्यक आयोग बनाया गया। 1991 में स्पष्ट जनादेश नहीं आने के कारण मजबूरी में बनी कांग्रेस की अल्पसंख्यक सरकार ने सत्ता में बने रहने के लिए कई गुल खिलाए। 1991 के धर्म स्थल क़ानून से लेकर वक्फ बोर्ड क़ानून और अल्पसंख्यक मंत्रालय तक। नरसिंह राव के शासनकाल में ही 1993 में क़ानून बना कर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग स्थापित किया गया, जिसमें पांच धार्मिक समुदायों मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और पारसी को अल्पसंख्यक समुदायों के रूप में नोटिफाई किया गया।
फिर मनमोहन सरकार के अंतिम साल 2014 में जैनियों को भी अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में नोटिफाई कर दिया गया। इस तरह बांटों और राज करो की प्रवृति बढती गई। देश में यहूदी और बहाई धर्म के लोग भी हैं, लेकिन उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं दिया गया क्योंकि वे बड़े वोट बैंक नहीं हैं।
अब मामला यह है कि अल्पसंख्यकों का निर्धारण केंद्र से राष्ट्रीय आबादी के आधार पर होने के कारण आठ राज्यों में बहुसंख्यक धार्मिक समुदायों को अल्पसंख्यकों का दर्जा मिला हुआ है। जबकि इन आठ राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं।
2002 में सुप्रीम कोर्ट की 11 जजों की बेंच ने कह दिया था कि राष्ट्रीय स्तर पर भाषा और धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं दिया जा सकता। दोनों की पहचान राज्य स्तर पर की जाएगी, लेकिन वाजपेयी, मनमोहन और मोदी सरकारें सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले पर कुंडली मार कर सोए रहीं।
अश्विनी उपाध्याय की समान नागरिक संहिता वाली याचिका पर पिछले महीने मोदी सरकार ने कोर्ट में यह कह दिया था कि सुप्रीमकोर्ट संसद को किसी तरह का क़ानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती। लेकिन उन्हीं अश्विनी उपाध्याय की अल्पसंख्यक निर्धारण वाली याचिका में मोदी सरकार फंस गई है।
अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल की थी कि 2002 के फैसले के बावजूद केंद्र सरकार ने राज्य स्तर पर गाइडलाइन क्यों तैयार नहीं की, जिससे राज्यों में अल्पसंख्यक समुदाय की पहचान की जा सके।
2021 में मोदी सरकार ने सुप्रीमकोर्ट में कहा था कि जैसे 2016 में महाराष्ट्र सरकार ने यहूदियों को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दिया था, वैसे ही राज्य, धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक का दर्जा दे सकते हैं। यह विषय समवर्ती सूची में आता है।
कर्नाटक ने भी उर्दू, तेलुगू, तमिल, मलयालम, मराठी, तुलु, लमानी, हिंदी, कोंकणी और गुजराती को अपने राज्य में अल्पसंख्यक भाषाओं का दर्जा दिया है। लेकिन मोदी सरकार इसके पक्ष में नहीं थी कि सिर्फ राज्यों को ही अल्पसंख्यकों के विषय पर कानून बनाने का अधिकार दिया जाए। केंद्र अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर अधिसूचना जारी करने का अधिकार खुद के पास भी रखना चाहता है। क्योंकि जैसे ही राज्यों को धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक तय करने का अधिकार मिल जाएगा, आठ राज्यों में स्थिति बदल जाएगी, इन आठ राज्यों में केंद्र सरकार भी उन धार्मिक समूहों को अल्पसंख्यक के लाभ नहीं दे सकेगी, जो बहुमत में होते हुए भी लाभ उठा रहे हैं।
मोदी सरकार को लगता है कि इससे उन आठ राज्यों में सिख, मुस्लिम और ईसाई राजनीतिक आन्दोलन शुरू कर सकते हैं, इसलिए वे उन राज्यों में उन धार्मिक समुदाओं को केन्द्रीय नोटिफिकेशन के जरिए अल्पसंख्यकों के लाभों को बरकरार रखना चाहती है।
अब सवाल पैदा होता है कि क्या अल्पसंख्यकों का निर्धारण राज्य स्तर पर होना चाहिए या नहीं, अगर ऐसा होता है, तो दोहरी व्ययवस्था कैसे रखी जा सकती है। मोदी सरकार दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहती है, लेकिन यह न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है। इस तरह तो उन आठ राज्यों में सभी अल्पसंख्यक हो जाएंगे, कुछ राज्य स्तर के अल्पसंख्यक और बाकी राष्ट्रीय स्तर के अल्पसंख्यक।
31 अक्टूबर, 2022 को दायर अपने चौथे हलफनामे में केंद्र ने कहा है कि उसे इस मुद्दे पर अब तक 14 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों से टिप्पणियाँ मिली हैं, और अन्य राज्यों को जल्द से जल्द मामले में उनके विचार भेजने के लिए रिमाइंडर भेजा है।
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से उन राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की माँगों पर विचार-विमर्श पूरा करने के लिए और समय माँगा है, जहाँ उनकी संख्या दूसरों से कम हो गई है। मोदी सरकार को फैसला तो लेना पड़ेगा, बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी।
स्वाभाविक है कि सुप्रीमकोर्ट 2002 का 11 जजों का फैसला लागू करवाएगी। अब जैसे ही सुप्रीमकोर्ट राज्य स्तर पर अल्पसंख्यक तय करने का निर्देश जारी करेगी, उसी समय आठ राज्यों में स्थिति बदल जाएगी।
अब तक सिर्फ छह संप्रदायों को राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्जा है, इन में सिख बहुमत वाले पंजाब में, मुस्लिम बहुमत वाले लक्षद्वीप और जम्मू कश्मीर में, बोद्ध बहुमत वाले लद्दाख में, ईसाई बहुमत वाले मिजोरम, नगालैंड, मेघालय, अरुणांचल प्रदेश और मणिपुर में अल्पसंख्यक का दर्जा हासिल किए हुए हैं। इन आठों राज्यों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देना पड़ेगा। जो अब तक बहुमत में होते हुए भी अल्पसंख्यकों को मिलने वालों फायदों का नाजायज लाभ उठाते रहे हैं, उन्हें उन लाभों से वंचित होना पड़ेगा।
जिन लोगों को भाषा और धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक का दर्जा मिला हुआ है उन्हें सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन, बैंक से सस्ता लोन और अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त शिक्षण संस्थानों में दाखिले के समय प्रमुखता मिलती है। पंजाब में सिख, जम्मू कश्मीर और लक्षद्वीप में मुस्लिम, लद्दाख में बोद्ध और बाकी चारों राज्यों में ईसाईयों को अल्पसंख्यकों के तौर पर मिलने वाले लाभों से वंचित होना पड़ेगा।
उदाहरण के लिए जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी को धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा मिला हुआ है। यहां करीब 50 प्रतिशत सीटें मुस्लिम समाज के बच्चों के लिए आरक्षित है। यहां जाति आधारित कोटा सिस्टम नहीं चलता। यानी एससी, एसटी और ओबीसी को जामिया मिलिया में आरक्षण नहीं मिलता। इन आठों राज्यों में जब हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा मिल जाएगा, तो वे धर्म आधारित शिक्षा के लिए गुरुकुल खोल सकेंगे।
अल्पसंख्यक मंत्रालय के मुताबिक 2014 के बाद से पारसी, जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई और मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले करीब 5 करोड़ विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति दी गई। हो सकता है, आठ राज्यों में यह अधिकार हिन्दुओं को भी मिल जाएगा।
यह भी पढ़ें: Minority Status to Hindus: क्यों उठ रही है कुछ राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा देने की मांग?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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