Subhadra Kumari Chauhan: सशक्त स्त्री चरित्र और नारीवादी विमर्श का आदर्श हैं सुभद्राकुमारी चौहान
राष्ट्र प्रेम एवं नारी सम्मान विषयों को मुखर स्वर देने वाली सुप्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की आज पुण्य तिथि है। मात्र 44 साल की उम्र में 15 फरवरी 1948 को उनका निधन हो गया था।

Subhadra Kumari Chauhan: सुभद्राकुमारी चौहान अपनी सीधी-सरल, सुस्पष्ट और आडम्बरहीन खड़ी बोली में सशक्त भावों की अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती हैं। इन्होंने कविता- कहानियों के साथ अपने साहसी व्यक्तित्व और कृतित्व से लोगों में स्वाधीनता के लिए राष्ट्रीय आन्दोलन की भावना को प्रबल किया। उन्हें जानने वाले बताते थे कि उनका स्वभाव बचपन से ही दबंग, बहादुर और विद्रोही था, जो उनकी लेखनी में भी दिखाई पड़ता है।
राष्ट्रीय आंदोलन के साथ ही सुभद्राकुमारी चौहान स्त्रियों की स्वाधीनता की पुरजोर समर्थक रही हैं। वे तत्कालीन नारीवादी विमर्श के लिए प्रसिद्ध रही हैं। किन्तु उनका नारीवाद, वर्तमान नारीवाद की धारा जैसा बिल्कुल भी नहीं है। अपने लेखन में इन्होंने प्रमुखता से दो रस चित्रित किए हैं- वीर तथा वात्सल्य। अपने काव्य में सुभद्राकुमारी पारिवारिक जीवन के मोहक चित्र भी उकेरती हैं, उन चित्रों में वात्सल्य की अत्यंत मधुर व्यंजना है।
जब भी उन्हें याद किया जाए तो उनके नारी सशक्तिकरण के विमर्श को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समझना महत्वपूर्ण है। उनका नारीवाद, पितृसत्तात्मकता के विरोध की बात नहीं बल्कि स्त्रीत्व मनोभावों से अलंकृत वीरता और स्त्री स्वतंत्रता की बात है। सुभद्राकुमारी चौहान की नायिका का स्त्रीत्व बोध बहुत मजबूत, भाव प्रवण और संतुलित है। जहां वर्तमान में स्त्री स्वतंत्रता के विमर्श को पुरुष के साथ तुलनात्मक विश्लेषण के रूप में खड़ा किया जा रहा है वहीं सुभद्राकुमारी चौहान का नारी विमर्श उनके आंतरिक सौंदर्यबोध, प्रेम, वात्सल्य भाव से परिपूर्ण, राष्ट्र प्रेम और वीरता का आह्वान करता है। यह स्त्री विमर्श झांसी की रानी को नायिका मानता है जो इन गुणों से सुसज्जित होकर समाज और देश के लिए श्रद्धेय और वंदनीय हो जाती हैं।
सुभद्रा कुमारी चौहान का अपना व्यक्तित्व भी मात्र एक रचनाकार का नहीं था, वे स्वयं स्वतंत्रता आन्दोलन के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली भारतीय नारी थीं। अर्थात् उनकी रचनाओं की नायिका कपोल कल्पित नहीं है वे स्वयं उस भाव को सहेजे अपने कार्यों में भी उसे उतारती हैं। 'मेरा जीवन' नामक कविता में वे लिखती हैं -
मैंने हंसना सीखा है, मैं नहीं जानती रोना;
बरसा करता पल-पल पर मेरे जीवन में सोना।
मैं अब तक जान न पाई कैसी होती है पीड़ा
हंस-हंस जीवन में कैसे करती है चिंता क्रीड़ा।
उनकी कविता "मेरा नया बचपन' उस समय की बालिका के सहज भावों से परिचित कराता है। जहां माँ का वात्सल्य, परिवार बोध का चित्रण है वहीं स्त्री के समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बोध का भी अनुशीलन इसमें दिखाई पड़ता है। उसमें कहीं भी स्त्री के मन में अपनी भूमिका को लेकर कोई संभ्रम नहीं है। उनकी नायिका एक सांस्कृतिक अवबोधन से भरी हुई अलंकृत मनोभावों वाली स्त्री है। जो अपने परिवार दायित्व का निर्वहन करते हुए देश, समाज के प्रति भी अपने उत्तरदायित्व को समझती है। उसमें वात्सल्य और वीरता दोनों भाव एकसाथ प्रवाहित होते हैं। वह कहीं भी निरर्थक पुरुषों से प्रतिस्पर्धा में नहीं खड़ी होती। वह स्त्री है, कहीं वह प्रेम विरहिणी भी है, जो स्त्री-पुरुष के परस्पर सहयोग के भाव को व्याख्यायित करती है। तो दूसरी ओर वह अपने स्त्री बोध के गौरव को अत्यंत सहजता से सहेजते भी दिखाई देती है।
सुभद्राकुमारी की सुप्रसिद्ध कविता 'झांसी की रानी' वीर रस से भरी हुई अतुलित रचना है। किन्तु इस रचना में नारी का एक ऐसा स्वरूप उन्होंने उकेरा है जहां वे साहस की प्रतिमूर्ति के साथ, एक वात्सल्य भाव से भरी मां के रूप को भी उतना ही सशक्त देखती हैं। अपने दत्तक पुत्र के प्रति उनका वात्सल्य और ममत्व मात्र बाइस तेईस वर्ष की आयु में आज की स्त्रियों के लिए मनन योग्य है। जो प्रजा वत्सल रानी हैं, राष्ट्र और प्रजा के प्रति प्रबल कर्तव्य बोध उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ है। उसमें मातृत्व और मातृभूमि के प्रति कर्तव्यों को लेकर कहीं कोई दुविधा नहीं प्रतीत होती है। यह मात्र एक साहसी रानी को ही नायिका के रूप में नहीं उद्धृत करती हैं। उनकी नायिकाओं में मानसिक दृढ़ता और चारित्रिक बल दोनों गरिमामय स्वरूप में उभर कर सामने आता है। दूसरे शब्दों में कहें तो सुभद्राकुमारी की अधिकतर रचनाएं स्त्रियोचित गुणों को आत्मसात किए हुए मानसिक रूप से दृढ़ और सुस्पष्ट विचारों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
आज का कथित नारीवाद कहीं इसके आसपास भी नहीं दिखता। माई बॉडी माई चॉइस जैसे नारे, तुलनात्मक रूप से स्त्री के बाह्य आवरण और अपने मन और देह के प्रति आत्मबल को कमजोर करने वाले ही प्रतीत होते हैं। हमेशा परिवार, बच्चे और व्यावसायिक जीवन के संघर्ष में उलझी स्त्रियां ही आधुनिक नारी विमर्श का आदर्श हैं।
सुभद्राकुमारी चौहान का नारीवाद इसके विपरीत बाह्य स्वरूप में श्रृंगार, आभूषण - अलंकारों से सुसज्जित, भारतीय सांस्कृतिक अवबोधन से संपृक्त, मन से दृढ़ है। कहीं भी वह समाज में अलग-थलग या प्रतिपक्ष में नहीं दिखती है। वह समाज की धुरी के रूप में स्त्री के सभी रूपों को बहुत सहजता से निभाते हुए नारी सशक्तिकरण की बात करती है।
हमारा आज का स्त्री विमर्श, एक ऐसी दिशा में मोड़ा जा रहा है जहां उन बातों की बराबरी के लिए संघर्ष प्रायोजित किया जाता है, जिनकी बराबरी प्राकृतिक रूप से है ही नहीं, न ही होनी चाहिए। वो असंतुलन पैदा करेगा। यदि दो तत्व, दो पदार्थ या दो प्राणी एक समान होते तो उनके दो अलग स्वरूप की प्रासंगिकता ही क्यों होती? हज़ारों वर्षों की सनातन संस्कृति में नारी की चैतन्यता और उसके योगदान के उदाहरणों को देखें तो पाएंगे कि वो कितने सशक्त और अप्रतिम हैं। स्त्री की प्रज्ञा, उनका चिंतन, सृजन, अनुशासन का पक्ष और जीवन के प्रति दृष्टिकोण के भाव उनके प्रति स्वतः सम्मान पैदा करते हैं।
सुभद्राकुमारी चौहान के स्त्री विमर्श का यह दृष्टिकोण आज भी प्रासंगिक और अनुकरणीय है। आधुनिक नारियों के लिए सशक्तीकरण को समग्रता में समझने की दृष्टि से उनकी रचनाओं का अनुशीलन महत्वपूर्ण है। आज के साहित्यिक विमर्श में सुभद्राकुमारी चौहान जैसी रचनाकारों की आवश्यकता है जो स्त्री सशक्तिकरण के समग्र अर्थ को प्रदर्शित कर सकें।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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