Strong India: क्या समय की मांग है भारत का विस्तारवादी होना?
Strong India: हमारे यहां सामान्य से लेकर खास लोग तक सब यह बात बहुत गर्व से बताते हैं कि भारत कभी विस्तारवादी नहीं रहा है। उसने दूसरे देशों की जमीन पर कभी कब्जा करने का प्रयास नहीं किया। लेकिन सवाल यह है कि क्या भविष्य की बदलती दुनिया में भी इसी नीति से भारत का हित सधेगा?
पड़ोस देश चीन हों या पाकिस्तान, वो निरंतर भारत के किसी न किसी भूभाग पर दावा करते रहते हैं। इसमें चीन तो जाना ही जाता है अपनी विस्तारवादी नीति के कारण। दक्षिण मंगोलिया हो, मंचूरिया, या तुर्कमेनिस्तान या फिर तिब्बत। इन सभी देशों और भूभाग को निगलकर उसने चीन का हिस्सा बना लिया है। आज चीन के पास तीन चौथाई जमीन ऐसी है जिसे पर उसने कब्जा किया है। अब वह भारत के अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

इसके लिए कभी अरुणाचल के लोगों को स्टेपल वीजा या फिर वीजा रहित प्रवेश की बात करता है तो कभी अपने सैनिकों को अरुणाचल प्रदेश की सीमा तक भेज देता है। इस बार उसने अपने मैप में अरुणाचल प्रदेश के कुछ स्थानों का नाम बदल दिया है जिस पर भारत ही नहीं अमेरिका ने भी कड़ी आपत्ति जताई है।
एक बार को हम मान सकते हैं कि किसी स्थान पर दावा कर देने भर से वह जगह उसकी नहीं हो जाती जिसने दावा किया है। लेकिन यहां हम भूल जाते हैं कि एक झूठ सौ बार बोला जाए तो वह सच नजर आने लगता है। सामान्य जीवन के निजी रिश्ते हों या विश्व राजनय की दुनिया। यहां वही विजेता समझा जाता है जो सबसे पहले दावा करता है। ऐसा करके कम से कम वह उसे विवादित तो बना ही देता है जो राजनय की दुनिया में दावा करने वाले की पहली जीत होती है।
भारत के राजाओं ने दूसरे राज्यों पर आक्रमण नहीं किया, यह समझना और कहना ही सबसे बड़ा झूठ है। अगर ऐसा होता तो फिर भारत में कभी महाभारत न होता। राजा एक दूसरे के राज्य की सीमाओं का अतिक्रमण करते थे। चक्रवर्ती सम्राट या राजसूय यज्ञ जैसी पद्धतियां प्रचलित ही इसलिए हुईं कि एक राजा ने बाकी राजाओं पर अपना अधिपत्य कायम कर लिया था। अब क्योंकि जिस समय यह सब हो रहा था उस समय वीजा पासपोर्ट वाले नेशन स्टेट नहीं हुआ करते थे, इसलिए प्रजा के लिए राजाओं की इन लड़ाइयों और जीत हार का कोई मतलब नहीं हुआ करता था। राजा कोई भी बने प्रजा के जीवन में बहुत व्यवधान नहीं आता था।
लेकिन यूरोपीय क्रांति के बाद राष्ट्र राज्य की अवधारणा आ जाने के बाद संसार में शासन का पूरा चरित्र ही बदल गया। अब जो शासक या राजा थे उन्होने एक सीमारेखा खींच दी और यह सुनिश्चित किया कि सीमा पार से कोई उनके 'राष्ट्र' में प्रवेश न कर सके। इसलिए बीते दो तीन सौ सालों में संसार में राष्ट्र होने का पूरा चरित्र ही बदल गया। अब जनता या प्रजा एक देश से दूसरे देश निर्बाध रूप से नहीं जा सकती। इसके लिए उसे वीजा पासपोर्ट की जरूरत होती है।
इस बदले हुए विश्व में कोई भी देश अपनी सीमाओं की सुरक्षा करते हुए शक्तिशाली नहीं हो सकता। इसका अर्थ यह नहीं कि हम हमेशा दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण करते रहें जैसा सद्दाम हुसैन ने किया था जब उसने कुवैत को इराक में मिलाने का प्रयास किया था। जिन स्थानों से हमारा ऐतिहासिक संबंध रहा है, जो सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से अतीत में हमारा हिस्सा रहे हैं, अगर उनको पुन: पाने का रणनीतिक, कूटनीतिक या फिर राजनयिक प्रयास करना पड़े तो इसमें बुराई क्या है?
वर्तमान समय के विस्तारवाद में सैन्य कार्रवाई सबसे अंतिम विकल्प होता है जैसा कि इस समय ब्लादिमीर पुतिन यूक्रेन में कर रहे हैं। या फिर एक लंबे समय से इजराइल फिलिस्तीन में करता आ रहा है। रूस हो या इजरायल ये सैन्य कार्रवाई को इसलिए सही ठहरा पाते हैं क्योंकि उन्होंने पहले लंबे समय से किसी भूभाग पर दावा किया हुआ था। ये लोग सद्दाम हुसैन वाली गलती नहीं करते कि रातों रात टैंक और तोप लेकर किसी दूसरे देश की सीमा में घुस जाएं और कहने लगे कि यह हमारा हिस्सा है।
बदले हुए विश्व के विस्तारवाद में पहला दावा रणनीतिक और कूटनीतिक ही होता है। इसके बाद जरूरी होने पर ही आगे सैन्य कार्रवाई की जाती है। लेकिन भारत की नीति कुछ ऐसी बन गयी है कि हम अपने ही ऐसे भूभाग पर दावा नहीं करते जो अतीत में सामाजिक या भौगोलिक रूप से वृहद भारत का हिस्सा रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि हम गोवा और सिक्किम भी बड़ी मुश्किल से अपने साथ मिला पाते हैं। जम्मू कश्मीर में आधा हिस्सा छोड़ ही दिया और उस आधे जम्मू कश्मीर को बचाने में लग गये जो ऐतिहासिक रूप से कभी किसी और का था ही नहीं।
पीओके, अक्साई चीन का अतीत हो या अब सामने आया कच्चाविथू द्वीप का मामला। भारत के शासकों ने सीमाओं तक सीमित हो जाने पर ही भरोसा किया है। भारत के शासक वर्ग को इस बात का मन मानस बनाना होगा कि जो राष्ट्र सीमा विस्तार नहीं करते उनकी सीमाएं लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह पातीं। एक राष्ट्र के रूप में किसी देश का विस्तारवादी होना उसके अपने लिए कोई अपराध नहीं है। अमेरिका, रूस से लेकर चीन तक सब अपने अपने तरीके से विस्तारवादी नीति पर चलते हैं इसलिए विश्व की महाशक्तियां बने हुए हैं। इस विस्तारवाद में जरूरी नहीं कि किसी की सीमाओं का अतिक्रमण ही किया जाए। इस विस्तारवाद में सांस्कृतिक, रणनीतिक स्वरूप भी शामिल है जिसके जरिए आप अपने लिए विश्व में एक समर्थक वर्ग तैयार करते हैं।
अतीत में भारत की प्रजा या राजा विस्तारवादी नहीं रहे हैं ऐसा भी नहीं है। अगर ऐसा होता तो भारतीय संस्कृति के निशान सूदूर देशों में न मिलते जो आज मिलते हैं। इंडोनेशिया या थाईलैण्ड में भारतीय संस्कृति की झलक इसलिए मिलती है क्योंकि चोल वंश के राजाओं ने एक समय यहां शासन किया था। कश्मीर के ललितादित्य मुक्तपीड ने वर्तमान अफगानिस्तान से लेकर ताजिकिस्तान, उजबेकिस्तान तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। आज जिस तिब्बत को चीन ने अपने देश में मिला लिया है उसे ललितादित्य मुक्तपीड और यशोवर्मन ने चीन की तुंग डाइनेस्टी की मदद से सातवीं सदी में जीतकर अपने साम्राज्य का हिस्सा बना लिया था।
कश्मीर के राजा ललितादित्य ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वो जानते थे कि अरब के अब्बासी शासकों और तिब्बती राजा को अगर रोकना है तो स्वयं मजबूत होना होगा। इस बात के लिए उन्होंने चीन की तुंग डाइनेस्टी को भी राजी कर लिया था जिसके कारण कन्नौज के राजा यशोवर्मन ने जब तिब्बत पर हमला किया तो चीन के राजा ने भी अपनी सैन्य सहायता पहुंचाई थी। सम्राट अशोक का इतिहास तो हम सब जानते ही हैं जिनका शासन वर्तमान अफगानिस्तान तक फैला हुआ था।
कवि हृदय अटल बिहारी वाजपेयी ने भले ही अपनी कविता के जरिए यह बताने का प्रयास किया हो कि भारत कभी विस्तारवादी नहीं रहा है, लेकिन यह सच नहीं है। भारत के राजाओं ने जब जहां जरूरी लगा, विस्तार के लिए प्रयास किया है। हां, ऐसा करते हुए भारतीय राजाओं ने कभी किसी को उस तरह से बदलने का प्रयास नहीं किया जैसा इस्लाम या ईसाई शासकों ने दुनियाभर में किया।
लेकिन बदले समय में एक जीवन दर्शन के रूप में आज अगर भारतीय ज्ञान और संस्कृति का प्रसार संसारभर में हो रहा है तो यह भी एक प्रकार का विस्तारवाद ही है। इससे संसार की दूसरी सभ्यताएं हमसे परिचित होती हैं। लेकिन इस सांस्कृतिक विस्तारवाद से अलग अब भौगोलिक और सीमाई विस्तार का प्रयास भी हो तो कोई बुराई नहीं है। दूसरे के भूभाग को अपने साथ मिलाएं या न मिलाएं, अपनी सीमाओं को सुरक्षित रखने का इस विस्तारवाद से बेहतर कोई दूसरा उपाय भी नहीं है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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