Stray Cattle: यूपी में मुसीबत क्यों बन गये हैं छुट्टे सांड़?
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को इस बात का श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने 'ठोक दो' नीति को अपनाते हुए प्रदेश की बेकाबू कानून व्यवस्था को ठीक कर दिया है। लेकिन यूपी के बेकाबू जानलेवा सांड़ कहीं से काबू में नहीं आ रहे हैं। योगी सरकार की कोई नीति उन पर कारगर नहीं हो रही है।

इस बात का ठीक ठीक आंकड़ा तो नहीं है कि यूपी में योगी सरकार आने के बाद आवारा सांड़ों ने कितने लोगों की जान ली है। लेकिन कोई ऐसा सप्ताह नहीं बीतता जिस दिन प्रदेश के किसी न किसी जिले से सांड द्वारा किसी न किसी की जान लेने की खबर नहीं आती। साड़ों द्वारा ये "हत्याएं" दूर दराज के गांवों और कस्बों में ही अधिक की जाती हैं इसलिए ये मात्र स्थानीय खबर बनकर रह जाती हैं।
बरेली में एक बुजुर्ग कृष्णानंद पांडेय को अभी दो दिन पहले एक आवारा सांड़ ने पेट में सींग घुसाकर मार दिया। कृष्णानंद टहलते हुए सड़क पर जा रहे थे इतने में सामने से आते सांड़ ने उन पर हमला कर दिया। ये घटना सीसीटीवी कैमरे में रिकार्ड हो गयी थी इसलिए इंटरनेट पर भी वॉयरल हो गयी। लेकिन ऐसी सैकड़ों या फिर हजारों घटनाएं हो चुकी हैं जिनका सीसीटीवी कैमरों में कोई रिकार्ड नहीं है।
खेत की रखवाली करते समय, बाजार में जाते हुए या फिर किसी गली मोहल्ले में प्रदेश का कोई व्यक्ति कहीं भी सांड़ से सुरक्षित नहीं है। ग्रामीण इलाकों में सांड़ के हमले का खतरा अधिक रहता है क्योंकि वहां व्यक्ति अधिकतर समय खुले में ही रहता है। आज यूपी के हालात ऐसे हैं कि हर गांव में दस पांच आवारा सांड़ घूम रहे हैं। इनमें से सब हमलावर हो जाते हैं ऐसा भी नहीं है। लेकिन सांड़ के स्वभाव को भला कौन समझ सकता है? चला जाए तो अपने रास्ते चला जाए वरना सामने वाले की शामत लेकर आ जाए।
यूपी में 2017 में जब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने गौ तस्करी और अवैध कत्लखानों पर सख्ती से रोक लगायी। लेकिन सच्चाई यह है कि न तो अवैध तस्करी रुकी, और न ही अवैध कत्लखाने रूके। हां, गौभक्तों की शिकायत पर कार्रवाई जरूर होने लगी जिसके कारण जो काम दिन के उजाले में होता था, वह रात के अंधेरे में प्रभावशाली लोगों की मदद से होने लगा।
योगी सरकार की सख्त सांड़ नीति का दुष्परिणाम यह हुआ है कि अब पशु तस्करों और पशुओं का अवैध कत्ल करनेवालों को बेचने और काटने के लिए मुफ्त में सांड़ मिल रहे हैं। लोगों के लिए बैल की कोई उपयोगिता बची नहीं है। इसलिए जैसे ही गाय को बछड़ा पैदा होता है, साल डेढ साल बाद उसे खुला छोड़ दिया जाता है। अगले एक दो साल तक वह किसानों की खेती चरता है, सेहत बनाता है और फिर किसी दिन किसी गौ तस्कर के ट्रक में लादकर गायब कर दिया जाता है।
यह जानने सुनने में थोड़ा असहज लग सकता है लेकिन सच्चाई यही है कि जब तस्कर रात के अंधेरे में इन छुट्टा सांडों को उठाकर ले जाते हैं तो आसपास के किसान राहत की सांस लेते हैं। आखिरकार कुछ समय के लिए उन्हें अपनी खेती और जान दोनों बचे रहने की राहत मिल जाती है। लेकिन कुछ समय बीतते ही सांडों की दूसरी खेप तैयार हो जाती है।
इस तरह बीते पांच सात सालों से यूपी के अधिकांश जिलों में यही क्रम चल रहा है। लोग बछड़े छोड़ रहे हैं, बछड़े खेती को नुकसान पहुंचाकर सांड़ बन रहे हैं और एक बार उनके शरीर में पर्याप्त गोश्त और चमड़ा तैयार हो जाता है तो किसी न किसी गौतस्कर के हत्थे चढ़ रहे हैं।
लेकिन इस दुश्चक्र में किसानों की खेती और इंसानों की जान को खतरा कम नहीं हो रहा है। वह सांड़ भी दुख भोग रहा है जिसे बचाने के नाम पर योगी आदित्यनाथ ने सख्त नीति अपनाई हुई है। वह खेती तो खा रहा है लेकिन मौसम की मार से वो भी नहीं बच पाता है। जिस सांड़ को लोग नंदी स्वरूप मानकर कभी पूजते थे, आज लाठी लेकर उसे मारने के लिए दौड़ते हैं। आमतौर पर समझा जाता है कि जानवर रात में चारा नहीं खाते। लेकिन परिस्थितियां बदलीं तो छुट्टा सांड़ और गाय ने यह प्राकृतिक चक्र भी उलट दिया है। अब ये आवारा पशु रात के अंधेरे में खेतों में धावा बोलते हैं और खेती चर जाते हैं।
योगी सरकार की इस सख्त सांड़ नीति का फायदा वो लोग भी खूब उठा रहे हैं जिनके पास अतिरिक्त जानवर हैं। वो दिन में अपना जानवर छोड़ देते हैं जो दिन भर आवारा बनकर घूमता है और शाम को वापस अपने खूंटे पर लौट आता है। ऐसा नहीं है कि योगी सरकार के पास इस बात की शिकायतें नहीं पहुंची हैं। लेकिन इन शिकायतों के निपटारे के लिए जो उपाय किये गये हैं वो सब नाकाफी हैं। सरकारी कर्मचारी छुट्टा जानवरों को पकड़ने और उन्हें सरकार द्वारा बनवायी गयी गौशालाओं में पहुंचाने का काम करेगा, ऐसी उम्मीद करना भी दिन में तारे देखने जैसा है।
सरकारी बाबू आंकड़ों का जादूगर होता है। उसे प्रभाव या परिणाम की बजाय आंकड़ों की चिंता होती है, इसलिए आंकड़े वो हमेशा ठीक रखता है। यूपी सरकार के सरकारी आंकड़ों को ही देखें तो 498 स्थायी और लगभग 6,800 अस्थायी गौशालाओं में 21 मार्च 2023 तक 11 लाख 57 हजार 204 गायों को संरक्षित किया गया है। इसके लिए सरकार की ओर से 1681.61 करोड़ रूपये खर्च किये गये। अगर आंकड़ों में ही आवारा पशुओं के नियंत्रण और संरक्षण का मसला रहे तो वह पूरी तरह से साध लिया गया है। सरकारी आंकड़ों पर ही भरोसा करें तो यूपी में सांड़ कोई समस्या है ही नहीं।
लेकिन सरकारी आंकड़ों से उलट जमीन पर अस्थाई गौशाला बनाना या शेल्टर निर्मित करना बाबुओं और ठेकेदारों का मिला जुला खेल है। इसके बाद वहां अगर कोई अपना पशु छुड़वाने के बजाय पहुंचाने भी जाए तो जगह नहीं है, कहकर वापस कर दिया जाता है। आवारा पशुओं को तो वो छूते तक नहीं है। जो पशु वहां है भी तो न उन्हें चारा मिलता है और न पानी। उनके लिए अपना वेतन, टीए, डीए, इंक्रीमेंट, छुट्टियां और आंकड़े ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। वो उसे ठीक रखते हैं, बाकी आवारा पशु आवारा ही रह जाते हैं।
दूसरी ओर किसानों पर इसका बहुत अधिक दुष्प्रभाव हुआ है। उनका पूरा खेती का पैटर्न बदल गया है। बारिश के दिनों में जो मोटे अनाज और दलहन की खेती होती थी वह बुरी तरह से प्रभावित हुई है क्योंकि उसे पशु बहुत तेजी से चर जाते हैं। दो फसल चक्र वाला उत्तर प्रदेश धीरे धीरे एक फसल चक्र का प्रदेश बनता जा रहा है। अब बारिश में सिर्फ धान और सर्दियों में लोग गेंहू, सरसों और आलू की खेती करना ही पसंद करते हैं। ये ऐसी फसलें हैं जिन्हें जानवर नहीं खाते हैं। इसके अलावा ज्वार, बाजरा, मक्का, उड़द, चना, मटर की खेती प्रदेश में बुरी तरह से प्रभावित हुई है क्योंकि जानवर इन्हें तेजी से चर जाते हैं।
गौवंश की भारत में पूजा इसलिए होती थी क्योंकि वो हमारी खेती का आधार थे। गाय और उसका बछड़ा इसलिए पूज्य थे क्योंकि उनके बिना हम खेती नहीं कर सकते थे। हमारा अन्न से लेकर दूध तक का पोषण गौवंश से ही पूरा होता था। लेकिन तकनीकी विकास ने गाय को तो नहीं लेकिन बैल को पूरी तरह से बेदखल कर दिया है। अब खेतों में बैल वाले हल नहीं बल्कि ट्रैक्टर चलते हैं।
यूपी में औसत जोत बहुत छोटी है फिर भी लोग अब हल बैल नहीं रखना चाहते। आधुनिकता के नाम पर खेती का तेजी से मशीनीकरण हुआ है और शिक्षा के विस्तार ने खेती में मानवीय श्रम का अकाल पैदा कर दिया है। ऐसी परिस्थिति में कोई भी पढ़ा लिखा व्यक्ति खेत में कदम नहीं रखना चाहता, हल बैल चलाना तो बड़ी दूर की बात है।
इन परिस्थितियों में गौवंश बचाने का वह तरीका कहीं से कारगर नहीं है जिसे इस समय योगी सरकार यूपी में लागू करके बैठी है। यह मनुष्य और गौवंश दोनों के लिए सिर्फ संकट ही पैदा कर रहा है। इंसान हमेशा उस जीव को पालता है जिससे उसका कोई काम निकलता हो। जब तक उसे हल की जरूरत थी उसने बैल को पाला और बिना किसी सरकारी योजना के उसका संरक्षण किया। लेकिन आज जब उसके हल बैल की जरूरत ही खत्म कर दी गयी है तो वह भला गौवंश का संरक्षण क्यों करेगा? उसके लिए तो वह एक बोझ ही है जिससे मुक्ति पाने का उपाय खोजता रहता है।
गौशालाओं से गौवंश का संरक्षण नहीं हो सकता। उनके संरक्षण के लिए जरूरी है कि किसान को उसकी उपयोगिता दिखाई दे। नीतिगत स्तर पर ट्रैक्टर की उपयोगिता को सीमित करने की जरूरत है ताकि खेतों में बैल की उपयोगिता बढ़े। इसके साथ ही केमिकल फर्टिलाइजर युक्त खाद की बजाय गौवंश के गोबर की खाद को निर्मित और प्रचारित करने की आवश्यकता है ताकि गौवंश का महत्व किसान के जीवन में बना रहे।
अब बायो गैस का उपयोग वाहन चलाने और आसपास के इलाकों में बिजली आपूर्ति के लिए होने लगा है। कई प्रदेशों में कंप्रेस्ड बायो गैस (सीबीजी) के प्लांट लगाए गए हैं, जहां किसानों और पशुपालकों से गोबर खरीद कर उर्वरक, गैस और बिजली का उत्पादन किया जा रहा है। यदि सरकार इस दिशा में सही नीति बनाये जिससे किसान के जीवन में गौवंश का महत्व लौट सके तो जो गौवंश आज मुसीबत बन गया है वह फिर से वरदान साबित हो सकता है।
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