अमित शाह के दौरे से हल होगी सीमांचल की बदलती जनसांख्यिकी की समस्या?
बिहार का सीमांचल इलाका लगातार असंतुलित होती डेमोग्राफी, इस्लामिक कट्टरता में हो रहे फैलाव के कारण एक बार फिर चर्चा में है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 23 और 24 सितंबर को बांग्लादेश और नेपाल से लगे बिहार के सीमांचल क्षेत्र के दौरे पर थे। यहां उन्होंने 23 सितंबर को पूर्णिया में एक बड़ी रैली की, जिसमें उन्होंने कहा-'मैं सीमावर्ती जिलों के लोगों को कहने आया हूं, जब नीतीश जी लालू जी की गोद में बैठ गए हैं और यहां जो डर का माहौल है, उसमें किसी को डरने की आवश्यकता नहीं है। ये सीमावर्ती जिले भी हिंदुस्तान के हिस्से हैं। नरेंद्र मोदी सरकार है यहां पर।' अगले दिन उन्होंने किशनगंज में बांग्लादेश-भारत सीमा क्षेत्र की सुरक्षा स्थितियों की समीक्षा करने के बाद कहा- ' सीमा क्षेत्रों में हो रहे जनसांख्यिकी का बदलाव बहुत चिंताजनक है।'

अमित शाह भाजपा के सबसे सफल चुनावी रणनीतिकार माने जाते हैं। इसलिए अधिकतर राजनीतिक विश्लेषक उनकी सीमांचल यात्रा को भाजपा की आगामी चुनावी राजनीति का हिस्सा मान रहे हैं। इस दौरे से मोटे तौर पर भाजपा ने यह संकेत दे दिया है कि आगे बिहार में वह हिंदू ध्रुवीकरण की राजनीति को प्रखर करेगी। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के विभिन्न सामाजिक ट्रेंड और गतिविधियों से जो शंकाएं आम हिंदुओं के मन में आकार ले रही हैं, उसे भाजपा जोर-शोर से उठाएगी। हालांकि इसकी काट में राजद और जद-यू ने भाजपा पर सांप्रदायिकता फैलाने का रटा-रटाया आरोप लगाना भी शुरू कर दिया है।
भाजपा और भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों की राजनीति का विश्लेषण करें तो इसमें नया कुछ नहीं है। भाजपा तीन दशकों से हिंदू हित के मुद्दों को उठाकर चुनावी राजनीति करती रही है। वहीं दूसरी ओर तमाम भाजपा विरोधी पार्टियां इसकी काट में सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति को जवाबी हथियार के रूप में उपयोग करती आई हैं। तीन दशकों की इस राजनीति का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि समस्या अपनी जगह पर यथावत है। न तो भाजपा ने जमीनी स्तर पर हिंदुओं के सामने गहराते संकट के समाधान के लिए कुछ खास किया, न ही गैर-भाजपा दलों ने ग्राउंड जीरो पर सेकुलरिज्म की कोई संस्कृति विकसित की। ऐसी परिस्थिति में सीमांचल की जो संप्रदाय आधारित समस्याएं हैं, जो सवाल और चुनौतियां हैं, उनका तथ्यात्मक अन्वेषण आवश्यक है।
सीमांचल की बदलती धार्मिक जनसांख्यिकी
पूर्वोत्तर बिहार के चार जिले- कटिहार, किशनगंज, अररिया और पूर्णिया को हाल के वर्षों में मीडिया ने सीमांचल नाम से प्रसिद्ध कर दिया है। वैसे परंपरागत रूप से यह मिथिला का पूर्वी क्षेत्र है। बांग्लादेशी मुसलमानों की अवैध घुसपैठ, उच्च जन्म दर, गरीबी, अशिक्षा, अपराध आदि सीमांचल की पुरानी समस्याएं रही हैं। ये मुद्दे राजनीतिक डोमेन में उठते रहे हैं। लेकिन घुसपैठ और धार्मिक जनसांख्यिकी में 1970 के दशक में जो असंतुलन आरंभ हुआ वह लगातार जारी है। यही कारण है जिस किशनगंज में चालीस वर्ष पहले मुस्लिम-हिंदू जनसंख्या का अनुपात 55-45 था वह 2011 में 68-32 हो गया। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि यह अनुपात अब 75-25 तक पहुंच गया है।
जनसंख्या असंतुलन का यही ट्रेंड अररिया, कटिहार और पूर्णिया जिलों में भी देखा जा रहा है, जहां हिंदुओं का जनसंख्या प्रतिशत लगातार कम हो रहा है, जबकि मुस्लिम धर्मावलंबियों का निरंतर बढ़ रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार, हिंदू-मुस्लिम का अनुपात (प्रतिशत में) कटिहार, अररिया और पूर्णिया में क्रमश: 55-45, 57-43, 61-39 हो गयी है। अनुमान है कि वर्तमान में इन तीनों जिलों में हिंदुओं का प्रतिशत 3 से 4 प्रतिशत तक कम हो चुके होंगे।
यह सच है कि इस अस्वाभाविक डेमोग्राफिक असंतुलन के बावजूद सीमांचल में हिंदू-मुस्लिम लोगों के बीच कोई गंभीर सांप्रदायिक वैमनस्य की स्थिति कभी नहीं रही। भारी आबादी के बावजूद ये क्षेत्र दस-बीस वर्ष पूर्व तक कट्टरता और अन्य चीजों से बचे हुए थे। छिटपुट मामलों को अगर छोड़ दें तो हाल के समय में भी इन इलाकों में कोई प्रत्यक्ष सांप्रदायिक हिंसा के मामले नहीं देखे गए हैं। मगर यह कड़वा सच है कि भारत के किसी भी क्षेत्र में एक धर्म विशेष के लोगों की बहुलता मात्र हिंदुओं के लिए पलायन का पर्याय बनता रहा है। मगर इस लिहाज से भी सीमांचल को कुछ अपवाद माना जा सकता है (हालांकि किशनगंज आदि क्षेत्र में अप्रत्यक्ष दबाव के कारण छिटपुट पलायन आरंभ हो चुका है)। तो क्या यह माना जाय कि भाजपा या अन्य हिंदूवादी कार्यकर्ताओं द्वारा उल्लेखित आशंकाएं निर्मूल हैं? यह एक अत्यंत गंभीर सवाल है, जिसका ईमानदार जवाब खोजना आवश्यक है।
सांस्कृतिक रूप से बदलता सीमांचल
इसके लिए हमें उन परिवर्तनों पर गौर करना होगा जो सीमांचल के समाज में बिल्कुल खामोशी के साथ लगातार हो रहा है। सांस्कृतिक रूप से यह इलाका खान-पान, रीति-रिवाज, बोली, चाल-चलन-संबोधन से लेकर पहनावे तक में मिथिला का अभिन्न हिस्सा रहा है। लेकिन बीते वर्षों में अररिया-पूर्णिया के कुछ पश्चिमी इलाके को छोड़ पूरे इलाके से मिथिला की संस्कृति लुप्त हो गई है। धोती-कुर्ता, लूंगी-गमछा आदि का स्थान मजहबी पहनावे ने ले लिया है। मैथिली-प्रेरित स्थानीय बोली सुरजापुरी लुप्त हो रही है और इसका स्थान उर्दू ले रही है। हर एक-आध किलोमीटर पर मस्जिद-मदरसा खुल गए हैं और लगातार इसकी संख्या में वृद्धि हो रही है।
परिस्थिति यह हो गयी है कि किशनगंज के सुदूर गांवों में घूमते यह यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि आप बिहार के मिथिला में ही हैं या किसी अन्य इस्लामिक देश में पहुंच गये हैं। दूसरी चिंताजनक बात यह देखी जा रही है कि जिन राजनीतिक निकायों में हिंदुओं की आबादी 60 प्रतिशत से कम है, वहां कोई हिंदू पार्षद, मुखिया तक निर्वाचित नहीं होते, विधायक, प्रखंड प्रमुख बनना तो दूर की बात है।
जैसे जैसे जनसांख्यिकी बदलाव हो रहा है वैसे वैसे कट्टरपंथी तत्व यहां अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं। कुछ समय पहले ही एनआईए ने कटिहार, अररिया में छापे मारे जिसमें पीएफआई के आतंकी मॉड्यूल के सबूत सामने आए, गिरफ्तारियां हुईं। बीते समय में विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों की अलग-अलग कार्रवाई में यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि सीमांचल को आतंकवादी तत्वों द्वारा स्लीपर सेल के रूप बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है।
हाल के वर्षों में इलाके में यहां पीएफआई के नेटवर्क में जबर्दस्त वृद्धि हुई है। बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों का देश विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल किए जाने की भी खबर आती रही है। ऐसे में आम हिंदुओं की आशंका को निर्मूल नहीं माना जा सकता। सीमांचल में सतह पर जो सौहार्द दिख रहा है, वह कब तक रहेगा, कहना असंभव है। खासकर तब जब सीमांचल के दक्षिण में झारखंड का संताल परगना और पूर्व में पश्चिम बंगाल का दिनाजपुर, सिल्लीगुड़ी इलाका भी समान समस्याओं से दो-चार है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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