Mewat: तुझको रक्खे राम तुझको अल्लाह रक्खे...!
धर्मेंद्र और माला सिन्हा की फिल्म 'आंखें' याद है आपको? इस फिल्म का गाना है, तुझको रक्खे राम तुझको अल्लाह रक्खे... गाना माला सिन्हा और महमूद पर फिल्माया गया था। इस गाने में महमूद गाते हुए एक अनूठा वाद्य बजाते दिखाई देते हैं, यह वाद्य भपंग है। फिल्म के लिए इसे मेवात के जहूर खां ने बजाया था। जहूर खां इससे पहले भी कई फिल्मों में भपंग बजा चुके थे। भपंग को मेवात से मुंबई की यात्रा जहूर खां ने ही करवाई। उसके बाद उन्होंने भपंग का परिचय पूरी दुनिया से करवाया।
मेवाती जहूर खां जब अपना परिचय देते, तो लोग हैरानी से सुनते, जहूर खां जोगी थे, पर मुस्लिम थे। वे मुस्लिम थे, पर शिवजी में आस्था रखते थे। शिवरात्रि पर भपंग बजाते और रातभर शिवजी का ब्यावला गाते। ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं थे, मेवात का समूचा जोगी मुस्लिम समुदाय आज भी शिवजी में विशेष आस्था रखता है। यूं यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि समूचा मेवात हिंदू पौराणिक गाथाओं को असीम श्रद्धा से सुनता रहा है। मेवाती महाभारत यानी 'पंडुन का कड़ा' यहां की लोक संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। इस पंडुन के कड़े को मेवाती शायर सादुल्ला खान ने लिखा था। उन्होंने तीन कड़े लिखे थे, बाद के दो कड़े उनके शिष्य व भतीजे नबी खां ने लिखे थे।

कहते हैं कि लिखा तो उन्होंने और भी बहुत कुछ था, लेकिन बंटवारे में जब उनका परिवार पाकिस्तान गया, तो बहुत सारा उनका लिखा कुएं में डाल दिया गया। सादुल्ला खान ने महाभारत के प्रसंगों को मेवाती दोहों में लिखा है, जिन्हें मेव मुसलमान पारिवारिक समारोह में भी सुनते हैं। मेवाती राम और कृष्ण की कथा भी सुनते रहे हैं। गंगा जमुनी तहजीब मेवात की रगों में है, यहां हिंदू पौराणिक गाथाओं को लिखने वाले, उन्हें गाने वाले और सुनने वालों में मुसलमानों की संख्या ज्यादा है।
हिंसा नूंह में, बेचैनी अलवर-भरतपुर में भी
हिंसा का केंद्र हरियाणा का नूंह जिला है, नूंह मेवात का एक अहम हिस्सा है। मेवात का इलाका राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के बीच बंटा हुआ है, पर इस कल्चर जोन को राज्यों की सीमाएं अलग नहीं कर सकतीं। जिस तरह यहां के कलाकारों और कलाओं को बांटा नहीं जा सकता, उसी तरह यहां की बेचैनियां भी बंट नहीं पातीं। यही वजह है कि राजस्थान सरकार ने नूंह हिंसा के तत्काल बाद से ही मेव बहुत इलाकों पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी। हरियाणा से सटे मेव बहुल दस उपखंड क्षेत्रों में धारा 144 लगा दी गई।
भरतपुर में नाजुक स्थिति देखते हुए वहां कुछ इलाकों में इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी गईं। वहीं पूरे मेव बहुल इलाके में सोशल मीडिया पर भी नजर रखी जाने लगी। कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं अलवर में। दोनों राज्यों का मानना है कि इस हिंसा में बाहरी तत्वों का हाथ है, क्योंकि छुटपुट घटनाओं को नजरअंदाज कर दें, तो इससे पहले सांप्रदायिक तनाव की कोई बड़ी घटना मेवात में नहीं हुई। मेवात अपनी गंगा जमुनी तहजीब के लिए ही जाना जाता रहा है, इस इलाके का पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व भी है।
'खानजादा' लिखने वाले भगवानदास मोरवाल का मत
मेवात की संस्कृति पर दो अहम उपन्यास, 'खानजादा' और 'काला पहाड़' लिखने वाले वरिष्ठ साहित्यकार भगवानदास मोरवाल कहते हैं, मेवात कल्चर जोन जिस तरह आज भी एक बना हुआ है, ठीक उसी तरह मेवाती लोग भी हैं। यहां का मेव समुदाय मुस्लिम होने से पहले मेवाती ही है। उनके लोक व्यवहार में साझी संस्कृति का असर दिखाई देता है। अरावली की दुर्गम पहाड़ियों में बसने वाला यह समुदाय खुद को यदुवंशी और सूर्यवंशी भी मानता है और इसी आधार पर मेव पौराणिक गाथाएं भी कहते और सुनते रहे हैं। जिस नूंह इलाके में हिंसा हुई है, उसी नूंह के पास ही स्थित है आकेड़ा, जहां सादुल्ला जन्मे थे, जिन्होंने महाभारत को मेवाती दोहों में लिखा। जोगियों व मिरासियों ने इसे गाया और मेव मुसलमानों ने इन लोक गाथाओं का स्वागत किया और दोहे को जुबानी याद भी किया।
मेवात के इतिहास के बारे में बात करते हुए मोरवाल कहते हैं, मेवात की धरती पर हसन खां मेवाती जैसे शासक हुए हैं, जिन्होंने मुगलों के खिलाफ राजपूतों के संग मिलकर लड़ाई लड़ी, शहीद भी हुए। 1857 की क्रांति में भी मेवातियों ने अपनी शहादत दी थी। 8 नवंबर, 1857 को मेवात के घासेड़ा (गुड़गांव) में अंग्रेज आतताइयों ने सैकड़ों मेवातियों को मौत के घाट उतार दिया था। आजादी के साथ ही हुए विभाजन के समय जब यहां के मेव मुसलमान पाकिस्तान जाने को हुए तो महात्मा गांधी इसी गांव आए और उन्होंने मेव मुसलमानों को जाने से रोक लिया। उन्होंने कहा कि आप हिंदुस्तान की रीढ़ हो। गांधी के आश्वासन पर मेवों ने जाने का विचार त्याग दिया। अपनी मेवाती बोली और अपनी लोक संस्कृति की छांव में मेव यहीं बसे रहे। मेवातियों के लिए आज भी उनकी बोली और लोक संस्कृति ही सबसे ऊपर है, यही उन्हें धर्म से परे एक-दूसरे से जोड़ती भी है।
जोगी-मिरासी समुदायों ने सहेजी साझी संस्कृति
शादी-ब्याह से जुड़ी मेव समुदाय की कई परंपराएं आज भी हिंदुओं की तरह ही हैं। वे गोत्र टालकर शादी करते हैं, शादी के गीत भी हिंदुओं जैसे ही हैं। पारंपरिक मेव स्त्रियां बुर्के की जगह घूंघट ही निकालती हैं। वहीं हिंदू आबादी भी खुद को इन समुदायों से अलग रखकर नहीं देख पाती। मेवात के लोक कलाकारों ने इस साझी विरासत को खूब सहेजा है। जोगी, मिरासी, भांड और नट समुदाय जहां हिंदू पौराणिक गाथाओं को गाते रहे हैं। वहीं यहां पीरों की स्तुति भी की जाती है।
मेवात के जोगी मुसलमान और दलित समुदायों की आस्था जाहर पीर में है, जाहर पीर यानी गोगाजी। लोक देवता गोगाजी पर हिंदू-मुस्लिम समुदाय समान रूप से आस्था रखता है। जोगी समुदाय गोगामेड़ी पर भाद्रपद मास में भरने वाले मेले में भी जाते हैं। सभी समुदाय इस तरह आपस में घुले-मिले हैं कि इन्हें पृथक करके नहीं देखा जा सकता। मेवात में अलवर जिले के धोली दूब गांव में मुस्लिम आबादी के ठीक बीच संत लाल दास जी का मंदिर दिखाई देता है और जब आप उनके बारे में जानेंगे तो पता चलेगा कि उनका जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ था, लेकिन उनकी आस्था हिंदू धर्म में थी। समूचे मेवात में हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए उन्होंने प्रयास किए। ऐसे कई उदाहरण पूरे मेवात में देखने को मिलेंगे।
उपेक्षित कल्चर जोन है मेवात
मेवात अल्लाह और राम में एक साथ यकीन रखने वाला इलाका है, इसीलिए इन दोनों का लोक व्यवहार एक समान है। चंद्रावल गूजरी, लंका चढ़ाई, भरथरी और अलीबक्शी ख्याल जैसी लोक कलाएं मेवात को एक सूत्र में पिरोती हैं, लेकिन तकनीकी युग में लोक गाथाएं और गायन पीछे छूट रहे हैं। ऐसा भी माना जा रहा है कि मेवाती तकनीक में कुछ ज्यादा ही एक्स्पर्ट हो रहे हैं, साइबर क्राइम की घटनाएं यहां से खूब हो रही हैं। धार्मिक कट्टरता भी बढ़ी है।
पर हमें यह समझना होगा कि मेवात अभी भी पिछड़ा हुआ इलाका है, अलग-अलग राज्यों में बंटने की वजह से इसकी सांस्कृतिक पहचान भी फीकी पड़ गई है, इस उपेक्षित पड़ी सांस्कृतिक भूमि को समझने के लिए नजरिया यहीं से उधार लेना होगा, तभी जान सकेंगे कि हरियाणा में हुई हिंसा की चिंता राजस्थान को क्यों हुई। तब शायद ये भी समझ आए कि सौहार्द के बीज लोक कला और कलाकारों के पास ही हैं। पर सवाल यह है कि इन्हें प्रोत्साहन देगा कौन?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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