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'आप' आये तो चुनाव में बहार आई

Arvind Kejriwal: बीजेपी के लिए बुझा बुझा सा चल रहा चुनाव अचानक से दमकने लगा। जेल से बाहर आते ही अरविन्द केजरीवाल ने जो पॉलिटिकल गोले दागे तो जवाब देने खुद अमित शाह मैदान में उतर गये।

मोदी के रिटायरमेन्ट पर केजरीवाल के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि "मोदी जी 75 पार जाकर भी देश का नेतृत्व करते रहेंगे।"

Arvind Kejriwal

टूजी स्पेक्ट्रम और कोयला घोटाले का दौर याद करें तो इतिहास में यह तो पहले ही दर्ज हो चुका है कि नेताओं को जेल भेजने में 'ज्यादा रुचि' रखने वाले सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार किसी नेता को प्रचार करने के लिए जमानत दे दी। इसके साथ ही भारत के संवैधानिक लोकतंत्र में अघोषित रूप से नेताओं के लिए एक और मौलिक अधिकार जुड़ गया: चुनाव प्रचार करने का अधिकार। बहरहाल इतिहास तो यह भी बना ही है कि शराब घोटाले में ईडी द्वारा 'मास्टरमाइंड' बताये गये केजरीवाल बतौर मुख्यमंत्री ही जेल के अंदर गये और बतौर मुख्यमंत्री ही बाहर निकले। उनके मुख्यमंत्री वाले पद का बाल भी बांका नहीं हुआ।

कहां तो पूरी आम आदमी पार्टी के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा था और कहां केजरीवाल बाहर आते ही चुनाव प्रचार में जुट गये। प्रेस कांफ्रेस से लेकर रोड शो तक उनका चुनावी अभियान शुरु हो गया। अपनी शैली के इकलौते पॉलिटिशियन केजरीवाल ने न केवल मोदी के रिटायरेन्ट का सवाल खड़ा किया बल्कि योगी की विदाई की तारीख भी बता दी।

जैसे एक देश दूसरे देश के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देता वैसे ही भारत की पोलिटिकल पार्टियों की एक अघोषित आचार संहिता है कि वो दूसरे दलों के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देते। लेकिन केजरीवाल के लिए इस तरह की अघोषित आचार संहिताओं का कोई मोल नहीं। यही तो उनकी अनूठी राजनीतिक शैली है जो सिर्फ उनके पास है।

बहरहाल, केजरीवाल के जेल से बाहर आने से जितनी खुशी आम आदमी पार्टी के भीतर नहीं है उससे अधिक खुशी भाजपा खेमे में दिखाई दे रही है। राहुल गांधी सहित पूरे विपक्ष की मौजूदगी में जो चुनावी रंगत नहीं जम पा रही थी, वह जेल से बाहर आते ही केजरीवाल ने जमा दी। केजरीवाल ने सीधे वहां हमला किया जहां दूसरे विपक्षी दल या तो सोच नहीं पा रहे थे या फिर सोच रहे थे तो बोल नहीं पा रहे थे।

इस बार उनके निशाने पर न मोदी हैं और न योगी। उनके निशाने पर हैं अमित शाह, जो गृहमंत्री भी हैं। केजरीवाल के मुताबिक मोदी तो सालभर बाद रिटायर हो जाएंगे क्योंकि वो 75 साल के हो जाएंगे। इसलिए यह चुनाव वो अपने लिए नहीं बल्कि अमित शाह के लिए लड़ रहे हैं क्योंकि मोदी के बाद वही प्रधानमंत्री बनेंगे। साथ में यह भी बोल दिया कि इलेक्शन बीतते ही योगी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटा दिया जाएगा।

किसी पार्टी के भीतर कौन लीड करेगा और कौन क्या बनेगा यह उस पार्टी के नेताओं का अपना संघर्ष होता है। लेकिन केजरीवाल के इन आरोपों का जवाब देने खुद अमित शाह मैदान में उतर आये और घोषणा की कि मोदी तीसरा कार्यकाल पूरा करेंगे और उसके बाद भी पार्टी को अपना नेतृत्व देते रहेंगे। अमित शाह ने जवाब भले दे दिया हो लेकिन ऐन चुनाव के बीच सवाल तो खड़ा हो ही गया कि मोदी ने जो नियम पार्टी के दूसरे नेताओं पर लागू किया था, क्या उसे अपने ऊपर भी लागू करेंगे?

मोदी शाह की जोड़ी को वैसे तो केजरीवाल से कोई राजनीतिक खतरा नहीं है लेकिन बीते विधानसभा चुनाव में केजरीवाल ने जिस तरह से गुजरात में 12.90 प्रतिशत वोट हासिल कर लिए थे, वह उनके अपने घर में ही खतरे की आहट थी। दिल्ली, पंजाब के बाद गुजरात ही वह राज्य है जहां केजरीवाल की पार्टी बहुत तेजी से जमीन बना रही है। गुजरात इलेक्शन में मिली सफलता ने ही आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलवा दिया।

ऐसे में इस बार गुजरात कांग्रेस के साथ गठबंधन करके लोकसभा चुनाव में उतरी आम आदमी पार्टी सीट भले न जीतती लेकिन बीजेपी की बढ़त तो जरूर रोक देती। संभव है कि आप की बढ़ती ताकत का फायदा कांग्रेस को मिल जाता। फिर केजरीवाल के प्रचार की शैली और मैनेजमेन्ट ऐसा होता है जो कई दफा मोदी शाह पर भी भारी पड़ता है। लेकिन फिलहाल मोदी शाह के लिए राहत की बात इतनी है कि गुजरात में मतदान हो चुका है और केजरीवाल की रिहाई का गुजरात के मतदान पर कोई असर नहीं होगा।

जहां तक दिल्ली और पंजाब की बात है तो पंजाब में भाजपा को वैसे भी कोई खास उम्मीद नहीं है। दिल्ली में जरूर वो सातों सीटें जीतती आयी है लेकिन एक दो सीट का घाटा हुआ भी तो इससे उसकी सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। इसके ऐवज में केजरीवाल के चुनावी मैदान में होने की प्रतिक्रिया में बीजेपी का जो कैडर चार्ज होगा, वह बीजेपी के लिए ज्यादा 'फायदेमंद सौदा' होगा।

सामान्यतया किसी भी पार्टी का कैडर प्रतिक्रियावादी ही होता है क्योंकि एक मजबूत या चालबाज राजनीतिक दुश्मन ही विरोधी पार्टी को जोश से भरता है। बीजेपी भी इसकी अपवाद नहीं है। वह भले ही दस साल से सरकार में हो लेकिन उसके पास अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिए कुछ खास है नहीं। इसलिए उसने पुरातन दुश्मन कांग्रेस पर हमला करना शुरु कर दिया ताकि उसका कैडर कांग्रेस विरोध में ही सही मैदान मारने के लिए जी जान लगा दे। लेकिन चौथे चरण का चुनाव हो गया, बात बहुत बनी नहीं। अब केजरीवाल के जेल से बाहर आते ही लगता है वह कमी एक झटके में पूरी हो गयी।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 2014 के मोदी जिस कांग्रेस विरोधी लहर पर सवार होकर दिल्ली पहुंचे थे, यह लहर किसी और से नहीं बल्कि केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से पैदा हुई थी। उस वक्त केजरीवाल के पास कोई पोलिटिकल ढांचा नहीं था फिर भी बनारस से मोदी के सामने मैदान में उतरकर दो लाख वोट बटोर लिये थे।

राजनीति में मोदी जितनी कलाओं के जानकार हैं, केजरीवाल उससे अधिक बहुमुखी प्रतिभा के धनी है। वो अपने राजनीतिक दुश्मन को छकाना बहुत अच्छे से जानते हैं और इस वक्त आम चुनाव में इसी बात की कमी महसूस की जा रही थी। केजरीवाल के चुनावी मैदान में आने से और कुछ हो न हो भाजपा कैडर के पास एक संदेश पहुंच गया है कि "जागो! मैदान में केजरीवाल आ गया है।"

बहरहाल, केजरीवाल की अंतरिम जमानत पर जेल से रिहाई ने चुनावी रंग को चौकस करने का ही काम किया है। चुनाव अयोग की तमा़म अपील और राजनीतिक दलों की तमाम को़शिशों के बाद जो चुनावी रंग नहीं जम पा रहा था, केजरीवाल के मैदान में आते ही माहौल में गर्माहट आ गयी है। निश्चित रूप से इसके लिए हमें माननीय सुप्रीम कोर्ट को धन्यवाद देना चाहिए।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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