Shiv Sena: एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे में कौन बनेगा जाणता राजा?

Shiv Sena: मोदी को कितनी सीटें मिलेगी, इससे ज्यादा इस बात पर चर्चा हो रही है कि महाराष्ट्र की जनता एकनाथ शिंदे बनाम उद्धव ठाकरे में से किसे असली शिवसेना का सर्टिफिकेट देने वाली है?

एकनाथ शिंदे के साथ बहुसंख्यक विधायक और सांसद भले ही चले गए हों, बाला साहेब ठाकरे की पार्टी का नाम और सिंबल भले ही एकनाथ शिंदे को मिल गया हो, एकनाथ शिंदे भले ही उद्धव को कुर्सी से उतार कर खुद महाराष्ट्र के राजा बन गए हों, लेकिन शिव सेना के समर्थकों के दिलों में कौन राज करता है इस पर महाराष्ट्र में संशय बना हुआ है।

Shiv Sena

पार्टी का विभाजन, वफादारी में बदलाव और तमाम कानूनी झटकों के बाद भी उद्धव ठाकरे मराठी मानुष की सहानुभूति को अपने पक्ष में बनाये रखने में काफी हद तक सफल रहे हैं। उद्धव ठाकरे एकनाथ शिदे को गद्दार और मोदी शाह के रहमोकरम पर पलने वाला मुख्यमंत्री बता रहे हैं और कह रहे हैं कि बाघ की खाल ओढकर कोई शेर नहीे बन जाता।

शिंदे के हाथों मूल शिवसेना गंवा चुके उद्धव ठाकरे पूरे महाराष्ट्र का दौरा करने का प्लान बना रहे हैं और उनकी कोशिश महाराष्ट्र की सभी 48 लोकसभा सीटों पर पहुंचने की है। ऐसा इसलिए क्योंकि उद्धव ठाकरे जानते हैं कि 2024 का लोकसभा चुनाव उनके लिए जीने और मरने का चुनाव है।

उद्धव ठाकरे मराठी टाइगर की वह दहाड़ भरने की कोशिश कर रहे हैं जो उनके पिता बालासाहेब ठाकरे की पहचान थी। महाराष्ट्र में और खासकर मुम्बई में एक ऐसा वर्ग है जो चाहता है कि सच्चा शिवसैनिक सिर्फ महाराष्ट्र के हितों की बात करे और दिल्ली का दरबारी बनने के बजाय दिल्ली नेतृत्व की आंखों में आंखे डालकर बात करें। उद्धव महाराष्ट्र में यही संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने भाजपा के सामने घुटने नहीं टेके तो भाजपा ने महाराष्ट्रवासियों से बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना को मातोश्री से छीन लिया।

उद्धव ठाकरे लगातार उनके साथ हुए छल और धोखे की बात कर रहे हैं और इसे ऐसा बताने की कोशिश कर रहे हैं जैसे यह धोखा पूरे महाराष्ट्र के साथ हुआ है। उद्धव ठाकरे विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी उद्धव के लिए यह चुनाव इतना आसान नहीं होनेवाला है।

उद्धव ठाकरे शिव सेना का नाम और सिंबल जाने से कमजोर तो हुए ही हैं, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को मोदी और शाह के पूरे सहयोग के कारण भी उद्धव ठाकरे को अतिरिक्त कमजोरी का एहसास हो रहा है। एकनाथ शिंदे चुनाव आयोग से मिले पार्टी के नाम और सिंबल के दम पर खुद को असली शिवसेना बताने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। एकनाथ शिंदे ने ग्रामीण मराठाओं को कुनबी के रूप में कोटा देकर उनके बीच अपनी पकड़ मजबूत की है।

उद्धव ठाकरे के साथ-साथ उनके वफादार शिवसैनिक पूरे महाराष्ट्र में शिंदे के खिलाफ गद्दारी का एजेंडा चलाकर मराठियों से भावुक अपील कर रहे हैं। मराठी भावुक होते हैं और बाला साहेब ठाकरे के प्रति उनमें हद दर्जे की दीवानगी है। इसलिए उद्धव ठाकरे यह बताने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं कि धोखा उद्धव ठाकरे के साथ नहीं, बाला साहेब ठाकरे के साथ हुआ है।

उद्धव ठाकरे और उनके समर्थकों को लगता है कि मराठी मानुष बालासाहेब के बेटे को धोखा देने वालों को माफ नहीं करेंगे। महाराष्ट्र का यह कटु सत्य है कि मराठी लोग मुम्बई में बहुसंख्यक नहीं, लेकिन सबसे बड़े अल्पसंख्यक बन गए हैं। मराठी मानुष में एक असुरक्षा की भावना उत्पन्न हुई है, जो मुम्बई और उसके आसपास के इलाकों में महसूस की जा सकती है। हिन्दुत्व समर्थक मराठियों का एक वर्ग ऐसा भी है जिसको लगता है कि उनकी बात करने वाली शिवसेना को निजी खुन्नस के चलते मोदी और शाह ने चालाकी से शिंदे को सौप दिया।

फिर भी उद्धव ठाकरे इस बात को समझते हैं कि सिर्फ मराठी भावनाओं के दम पर लोकसभा, विधानसभा या मुम्बई महानगरपालिका का चुनाव नहीं जीता जा सकता। चुनाव जीतने के लिए कुछ अतिरिक्त सामाजिक समीकरण तैयार करने होंगे, जिससे सिर्फ मराठियों और हिन्दुत्ववादियों की पार्टी से ऊपर भी वोट बटोरे जा सके। इसी कारण उद्धव ठाकरे और उनके सिपहसालार मराठी मुस्लिम एकजुटता पर भी काम कर रहे हैं।

मोदी और भाजपा पर उद्धव ठाकरे के लगातार आक्रामक प्रहार ने भी मुस्लिम वोटर्स को आकर्षित किया है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि उद्धव ठाकरे के मराठी वोटर्स को कुछ हद तक एकनाथ शिंदे ने भाजपा के सहयोग से अपने पक्ष में किया है। ऐसे में उद्धव ठाकरे कम हो रहे अपने मतदाताओं की भरपाई मराठी मुस्लिम सोशल इंजीनियरिंग के दम पर करना चाहते हैं।

लेकिन उद्धव ठाकरे की एक बडी समस्या उनके सहयोगी दल कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस से अपेक्षित सहयोग न मिल पाना है। टिकट बंटवारे पर बेहद लंबी वार्ता और उसका कोई सार्थक नतीजा न निकलने ने भी उद्धव को समझा दिया है कि उनकी लड़ाई उनको खुद लड़नी है। यही कारण रहा कि उद्धव ठाकरे ने अपने 22 उम्मीदवारों की सूची बिना सहयोगी को साथ लिए घोषित कर दी।

उद्धव ठाकरे के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि शिवसैनिकों और शरद पवार सहित कांग्रेस के बीच दशकों से चली आ रही राजनैतिक प्रतिद्धद्धिता से साझा चुनावी अभियान में दिक्कत आ रही है। शरद पवार और कांग्रेस के साथ खड़े होकर मराठी हिन्दुत्ववादी वोट ट्रांसफर करवाना आसान नहींं होगा।

शिवसेना की टूट का सबसे बड़ा कारण भी एकनाथ शिंदे ने यह बताया था कि उद्धव ने कांग्रेस से हाथ मिलाकर हिन्दुत्व से समझौता कर लिया है। फिर अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और मोदी के तीसरे कार्यकाल की अपील ठाकरे की सहानुभूति पर भारी पड़ सकती है।

ऐसे में अपने जीवन की सबसे कठिन चुनावी चुनौती से सामना कर रहे उद्धव ठाकरे को नाजुक संतुलन साधना होगा। ठाकरे को नए मतदाता समूह को तैयार करते समय अपने मूल मराठी आधार को भी याद दिलाना होगा कि शिवसैनिक राम मंदिर आंदोलन से हमेशा जुड़े रहे हैं। अयोध्या में बने राम मंदिर की नींव में शिवसैनिको का बलिदान और बालासाहेब ठाकरे का योगदान भी है। बालासाहेब ही असली हिंदू हदय सम्राट थे।

लेकिन इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा मुस्लिम वोटरों तक पहुंचने की उद्धव की नीति है। मराठी मुस्लिम कॉम्बीनेशन को साधना उद्धव ठाकरे के लिए इतना आसान नहीं होगा। इसलिए इस बार महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के लिए करो या मरो की लड़ाई है। उद्धव के सामने सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि पहले लोकसभा चुनाव है और उसके चार महीने बाद विधानसभा चुनाव। लोकसभा चुनाव में उम्मीदों पर खरा न उतरने या सम्मानजनक सीटें न मिलने पर उद्धव ठाकरे के लिए कार्यकर्ताओं में विधानसभा चुनाव तक उत्साह और एकजुट बनाए रखना मुश्किल होगा।

मोदी को मिले वोट को एकनाथ शिंदे पूरे महाराष्ट्र में अपना वोट बैंक बताकर ढिंढोरा पीटेंगे और खुद को असली बालासाहेब का वारिस बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगे। विधानसभा चुनावों में मैरिट में आने की तैयारी कर रहे उद्धव ठाकरे को लोकसभा चुनाव की परीक्षा में पास तो होना ही होगा क्योंकि लोकसभा चुनाव की परीक्षा में फेल होने पर उद्धव के पास विधानसभा चुनाव में पास होने की भी संभावना नहीं बचेगी।

बहरहाल 2024 का लोकसभा चुनाव शिवसेना के भविष्य के लिए निर्णायक होने जा रहा है। शिंदे और ठाकरे में मराठी मानुृष किसे बालासाहेब का उत्तराधिकारी मानते हैं और किसे अपना राजा चुनते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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