Sharad Pawar: बेनकाब हो गए शरद पवार
Sharad Pawar: राजनीति इतनी सीधी भी नहीं होती, जितनी नेताओं के मुहं से सुनी बातों से लगती है| राजनीति क्या होती है, उसके कैसे कैसे रूप होते हैं, यह शरद पवार ने साबित किया है| शरद पवार वैसे भी घाघ राजनीतिज्ञ माने जाते रहे हैं, लेकिन कोई सोच भी नहीं सकता कि अभी भी वह डबल गेम खेल सकते हैं| महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में यह खुलासा करके राज्य की राजनीति में हड़कंप मचा दिया है कि 2019 में शरद पवार की सहमति के बाद ही उन्होंने मुख्यमंत्री पद की और अजीत पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी|
देवेन्द्र फडणवीस ने इंटरव्यू में कहा कि शरद पवार के साथ उनकी कई दौर की बातचीत हुई थी। शरद पवार ने खुद भाजपा-एनसीपी की सरकार बनाने पर सहमति दी थी, लेकिन शपथ ग्रहण से दो दिन पहले वह मुकर गए थे। उन्होंने अजीत पवार से कह दिया था कि वह शपथ न लें, लेकिन बात इतनी आगे बढ़ चुकी थी कि अजीत पवार को लगा कि शरद पवार मान जाएंगे| लेकिन शरद पवार ने 80 घंटों में ही अजीत पवार को इस्तीफा देने को मजबूर किया और सरकार गिर गई|

हड़बड़ाहट में इन दोनों को सवेरे जल्दी शपथ दिलाने के लिए राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की भी बहुत आलोचना हुई थी| 80 घंटे में अजीत पवार के इस्तीफे के बाद देवेन्द्र फडणवीस की भी बहुत किरकिरी हुई थी| अजीत पवार पर आरोप लग रहा था कि भतीजे ने अपने चाचा शरद पवार को धोखा दिया| लेकिन अब इस खुलासे के बाद साफ़ हो गया कि भगत सिंह कोश्यारी ने कोई गलती नहीं की थी| अजीत पवार ने अपनी मर्जी से कुछ नहीं किया था| जबकि देवेन्द्र फडणवीस के इस खुलासे के बाद साबित हुआ कि धोखा भतीजे ने नहीं बल्कि चाचा ने दिया था| हालांकि फडणवीस यह नहीं मानते कि शरद पवार ने उन्हें धोखा दिया। वह कहते हैं कि शरद पवार तो सिर्फ डबल गेम खेल रहे थे, इधर हमारे साथ मिलकर सरकार बनाने की बात कर रहे थे और उधर उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने की योजना बना रहे थे| फडणवीस कहते हैं कि धोखा तो उन्हें उद्धव ठाकरे ने दिया था, जिन्होंने गठबंधन में चुनाव लड़ा और मुख्यमंत्री बनने के लिए दशकों पुराना गठबंधन तोड़ दिया|
एनसीपी के नेता देवेन्द्र फडणवीस के खुलासे का न खंडन कर रहे थे, न पुष्टि कर रहे थे। इसका मतलब यह है कि एनसीपी के कई नेताओं को पता था कि शरद पवार उस समय डबल गेम खेल रहे थे| आखिर शरद पवार ने चुप्पी तोड़कर इस बात की पुष्टि कर दी कि हां उन्होंने भाजपा के साथ बात की थी| बीसीसीआई के अध्यक्ष रहे शरद पवार ने राजनीति के इस शातिराना खेल को क्रिकेट की भाषा में कुछ यूं कहा कि देवेंद्र फडणवीस ने अपनी विकेट दिखाई और मैंने उनकी विकेट उड़ा दी| भाषा कुछ भी हो, उन्होंने पुष्टि की है कि देवेन्द्र फडणवीस ने जो कुछ कहा है, वह सच है| क्रिकेट का उदाहरण देकर आप बात को हल्के से नहीं ले सकते, राजनीति में कुछ तो शुचिता रखनी चाहिए|

शरद पवार की बेटी, एनसीपी की कार्यकारी अध्यक्ष और सांसद सुप्रिया सुले झेंप मिटाने के लिए कह रही हैं कि वह इस बात के लिए खुश हैं कि देश और प्रदेश की राजनीति उनके पिता और भाई के चारों ओर घूम रही है| हालांकि उनकी इस बात में कोई दम नहीं है कि देश की राजनीति शरद पवार और अजीत पवार के इर्दगिर्द घूम रही है| शरद पवार को तो अपनी ही पार्टी में अपना नेतृत्व बनाए रखने के लिए अध्यक्ष पद से इस्तीफे का नाटक करना पड़ा|
विपक्षी एकता में भी शरद पवार की भूमिका नगण्य हो गई है। 23 जून को पटना में हुई विपक्षी दलों की मीटिंग में उनकी कोई भूमिका नहीं थी| राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के चुनाव तक शरद पवार विपक्षी एकता की धुरी थे, लेकिन अब वह पिक्चर से बाहर हो रहे हैं| अजीत पवार चुप हैं, क्योंकि इस घटनाक्रम से उन पर लगे वे आरोप धुल गए हैं कि उन्होंने अपने चाचा के खिलाफ बगावत की थी| लेकिन इस नए घटनाक्रम से पहले पार्टी की एक बैठक में उन्होंने यह कह कर शरद पवार पर कटाक्ष किया है कि बिहार में नीतीश कुमार छोटी सी पार्टी के नेता होने के बावजूद मुख्यमंत्री हैं। इसी तरह झारखंड में क्षेत्रीय पार्टी के नेता हेमंत सोरेन, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी, तेलंगाना में केसीआर, तमिलनाडु में स्टालिन और उड़ीसा में नवीन पटनायक मुख्यमंत्री हैं, जबकि एनसीपी महाराष्ट्र में वह मुकाम हासिल नहीं कर सकी| क्या इसका कारण शरद पवार की डबल गेम की राजनीति है कि महाराष्ट्र की जनता ने उन्हें इतना समर्थन नहीं दिया कि एनसीपी का अपने बूते पर मुख्यमंत्री बन सकता|
शरद पवार ने पहली बार डबल गेम नहीं खेला है, वह डबल गेम के पुराने खिलाड़ी हैं। 2002 में उन्होंने यूपीए में रहते हुए उपराष्ट्रपति पद के यूपीए के उम्मीदवार सुशील कुमार शिंदे को हराने का काम किया था| उन्होंने एनडीए के उम्मीदवार भैरोसिंह शेखावत के लिए लॉबिंग करके एनसीपी ही नहीं कांग्रेस के वोट भी भैरोसिंह शेखावत को दिलाए थे| लेकिन पांच साल बाद भैरो सिंह शेखावत को वायदा करने के बावजूद उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें धोखा दे दिया था| हालांकि उन्होंने देवेन्द्र फडणवीस के साथ जो कुछ किया, उसे वह खुद धोखा नहीं मानते, लेकिन जो काम उद्धव ठाकरे ने भाजपा के साथ किया है, वह काम भी शरद पवार 1978 में कांग्रेस के साथ कर चुके हैं|
एकनाथ शिंदे ने जो काम उद्धव ठाकरे के साथ किया, वह काम उन्होंने 38 साल की उम्र में मुख्यमंत्री वसंत दादा पाटिल के साथ किया था| जब उन्होंने 40 विधायकों के साथ कांग्रेस से बगावत करके वसंत दादा पाटिल की सरकार गिरा दी थी और गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री बन गए थे| 40 विधायकों की बगावत से अल्पमत में आए वसंतदादा को भी वैसे ही इस्तीफा देना पड़ा था, जैसे एकनाथ शिंदे के साथ 40 विधायकों की बगावत के बाद उद्धव ठाकरे को इस्तीफा देना पड़ा|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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