Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

राफेल का सीक्रेट आउट बनाम मीडिया रिपोर्ट

नई दिल्ली। बहुचर्चित राफेल का मुद्दा फिर गरमाता जा रहा है। इस बार राफेल डील से संबंधित चोरी हुई फाइल के आधार पर कथित रूप से बनी मीडिया रिपोर्ट चर्चा में है। आपको बता दें कि भारत ने अपनी वायुसेना के आधुनिकीकरण प्रोग्राम के तहत फ़्रांस की दसो कंपनी से 8.7 अरब डॉलर में 36 राफेल लड़ाकू विमानों का सौदा किया था। भारत के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि 'द हिन्दू' अख़बार के ख़िलाफ़ गोपनीयता के क़ानून के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है। केंद्र सरकार का कहना है कि फ़्रांस से 36 लड़ाकू विमानों की ख़रीद से जुड़े दस्तावेज़ रक्षा मंत्रालय से चोरी हो गए हैं और इसी के आधार पर 'द हिन्दू' ने अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की है।

secret out of rafale and media report

वेणुगोपाल ने कोर्ट में कहा कि 'द हिन्दू' ने जिन दस्तावेज़ों को प्रकाशित किया है उस आधार पर राफेल सौदे की जांच नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये सरकार की गोपनीय फ़ाइलें हैं। 'द हिन्दू पब्लिशिंग ग्रुप' के चेयरमैन एन राम के नाम से राफेल सौदे पर कई रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। एन राम का कहना है कि उन्होंने जनहित में ये रिपोर्टें प्रकाशित की हैं। उनका कहना है कि इसमें कुछ भी परेशानी की बात नहीं है। जो प्रासंगिक था उसे हमने प्रकाशित किया है और मैं इसके साथ पूरी तरह से खड़ा हूं। स्वाभाविक है, इस तरह के बनते-बिगड़ते हालात से मीडिया और सरकार के बीच ठन सकती है। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने अटॉर्नी जनरल की टिप्प्णी की निंदा की है। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की तरफ़ से जारी किए गए बयान में कहा गया है कि सरकार गोपनीयता के क़ानून का हवाला देकर पत्रकार को स्रोत बताने पर मजबूर नहीं कर सकती है।टकराव के हालातों के बीच 'द हिन्दू पब्लिशिंग ग्रुप' के चेयरमैन एन राम कहते हैं कि हमने रक्षा मंत्रालय से दस्तावेज़ चुराए नहीं हैं। हमें ये दस्तावेज़ गोपनीय सूत्रों से मिले हैं।

कोई ऐसी ताक़त नहीं है जो मुझे यह कहने पर मजबूर कर सके कि दस्तावेज किसने दिए हैं। हमने जिन दस्तावेज़ों के आधार पर रिपोर्ट प्रकाशित की है वो जनहित में हमारी खोजी पत्रकारिता का हिस्सा है। राफेल सौदे की अहम सूचनाओं को दबाकर रखा गया जबकि संसद से लेकर सड़क तक इसे जारी करने की मांग होती रही। एन राम का कहना है कि उन्होंने जो भी प्रकाशित किया है, उसका अधिकार 'संविधान के अनुच्छेद 19 (1) से मिला है। ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना के अधिकार का हिस्सा है। राष्ट्र सुरक्षा और उसके हितों से समझौते का कोई सवाल ही खड़ा नहीं होता है। लोकतांत्रिक भारत को 1923 के औपनिवेशिक गोपनीयता के क़ानून से अलग होने की ज़रूरत है। क्योंकि गोपनीयता का क़ानून औपनिवेशिक क़ानून है और यह ग़ैर-लोकतांत्रिक है। स्वतंत्र भारत में शायद ही किसी प्रकाशन के ख़िलाफ़ इस क़ानून का इस्तेमाल किया गया हो।

एन राम कहते हैं कि अगर किसी तरह की जासूसी हो रही हो तो वो अलग बात है। हमने जो छापा है वो जनहित में है। अटॉर्नी जनरल के तर्क को माना जाए तो इससे खोजी पत्रकारिता पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। राम का कहना है कि ये केवल हिन्दू अखबार का मामला नहीं है। अन्य स्वतंत्र प्रकाशकों के लिए भी ख़तरनाक है। 1980 के दशक में हमने बोफ़ोर्स की जांच में अहम भूमिका अदा की थी। इस सरकार में मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर डर बढ़ा है। भारतीय मीडिया को इसे लेकर बहुत कुछ करने की ज़रूरत है।सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने जब एक नोट पढ़ना शुरू किया तो अटार्नी जनरल वेणुगोपाल ने आपत्ति जताई थी। भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि राफेल सौदे से जुड़ी जांच की पुनर्विचार याचिका ख़ारिज नहीं करनी चाहिए क्योंकि 'अहम तथ्यों' को सरकार दबा नहीं सकती है।

राफेल पर पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और केएम जोसेफ़ की बेंच के सामने वेणुगोपाल ने कहा था कि रक्षा मंत्रालय से नौकरशाहों ने ऐसे दस्तावेज चुरा लिए हैं जिसकी जांच अभी लंबित है। एजी से जस्टिस रंजन गोगोई ने पूछा कि सरकार ने इस मामले में क्या कार्रवाई की है तो वेणुगोपाल ने कहा था कि हमलोग इसकी जांच कर रहे हैं कि फ़ाइल चोरी कैसे हुई। वेणुगोपाल ने कहा था कि रक्षा सौदों का संबंध राष्ट्र की सुरक्षा से होता है और ये काफ़ी संवेदनशील हैं। एजी ने कहा था कि अगर सब कुछ मीडिया, कोर्ट और पब्लिक डिबेट में आएगा तो दूसरे देश सौदा करने से बचेंगे। प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वो अदालत में वही दस्तावेज रख रहे हैं जो सार्वजनिक रूप से पहले से ही मौजूद हैं। खैर, यह तो तय है कि सीक्रेट आउट होने पर ही घोटाला आउट होता है।

घोटाला आउट होने पर फाइल को सीक्रेट बताने का फार्मूला पहली बार आउट हुआ है। प्रधानमंत्री को हर बात में ख़ुद को चौकीदार नहीं कहना चाहिए. ख़ुद को चौकीदार और प्रधानसेवक कहते-कहते भूल गए हैं कि वे भारत के प्रधानमंत्री हैं, इसलिए जागते रहो, जागते रहो बोलकर कुछ भी बोल जाते हैं। भारत की चौकीदारी सिस्टम में बुनियादी कंफ्यूज़न है। चौकीदार को पता है कि उससे चौकीदारी नहीं हो सकती। अब लोगों ने उसे चौकीदार रखने की ग़लती की होती है, तो वह उसे उनकी ग़लती की याद दिलाता रहता है।. हर रात जागते रहो, जागते रहो चिल्लाता रहता है। आपने पंचतंत्र की कहानियों से लेकर फिल्मों में देखा होगा, इस टाइप के चौकीदार के दूसरी गली में जाते ही चोरी हो जाती है। रक्षा मंत्रालय से सीक्रेट फाइल चोरी हो गई है। चोरी चौकीदार के पहुंचने से पहले हुई या बाद में, मनोविनोद का प्रश्न है।वैसे अटार्नी जनरल ने सीक्रेट फाइल चोरी होने की बात कर कई बातें कर दीं। द हिंदू में छपी सारी रिपोर्ट को सही बता दिया। सरकार की तरफ से जो सीक्रेट था, उस सीक्रेट को आउट कर दिया। अब सरकार नहीं कह सकती कि द हिंदू में जो छपा है वह सही जानकारी नहीं है। उसकी फाइल का हिस्सा नहीं है। इसी बात पर सुप्रीम कोर्ट को जांच का आदेश दे देना चाहिए।

सवाल यह है कि रक्षा मंत्रालय से सीक्रेट फाइल कैसे चोरी हो गई। ओरिजनल कॉपी चोरी हुई या फोटो कॉपी। जहां सीक्रेट फाइल रखी जाती है उस कमरे में खिड़की और दरवाज़े हैं या नहीं। सीक्रेट फाइल ले जाने-ले आने की प्रक्रिया क्या है। वहां कोई सीसीटीवी कैमरा है या नहीं। दूसरा जब द हिंदू अखबार में छपी ख़बरें सही हैं तो यह आरोप सही साबित होता है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सारी जानकारी नहीं दी। नहीं तो सुप्रीम कोर्ट अब बताए कि ये वही सीक्रेट फाइल है जो बंद लिफाफे में हमें मिली थी! जनवरी महीने से एन. राम द हिंदू अख़बार में राफेल सौदे पर रिपोर्ट लिख रहे हैं। वो कहते हैं कि कैसे रक्षा मंत्रालय को अंधेरे में रखकर प्रधानमंत्री कार्यालय राफेल मामले में खुद ही डील करने लगा था। कैसे रक्षा मंत्रालय के बड़े अधिकारी इस पर एतराज़ जता रहे थे। कैसे राफेल का दाम यूपीए की तुलना में 41 प्रतिशत ज़्यादा है। कैसे बैंक गारंटी नहीं देने से राफेल विमान की कीमत बढ़ जाती है। एन राम कहते हैं कि कि वह अपने सोर्स को लेकर गंभीर हैं। उसके बारे में जानने का कोई प्रयास भी न करें। खैर, अब इस पर सियासत भी शुरू हो चुकी है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राफेल के मुद्दे पर पहले से ज्यादा हमलावर हैं। हालांकि सत्तापक्ष की ओर से दलीलें दी जा रही हैं, पर वह स्पष्ट नहीं है। बहरहाल, सरकार को चाहिए कि वह खुद इस मामले में आगे बढ़कर देश की जनता और विपक्ष की जिज्ञासा को शांत करे।

यह भी पढ़ें- शरद पवार ने राफेल मामले पर पीएम मोदी को घेरा, बोले- सरकार ने दस्तावेजों की चोरी की बात संसद से क्यों छिपाई

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+