Seat Sharing UP: कांग्रेस 17 में से सिर्फ छह सीटों पर मुकाबला करने की स्थिति में
उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी के हस्तक्षेप से बचे इंडी एलायंस ने इन अफवाहों को खत्म कर दिया है कि वह परिवार और पार्टी में अलग थलग पड़ गई हैं, या उत्तर प्रदेश के प्रभारी पद से हटा कर उन्हें किनारे कर दिया गया है।
प्रियंका गांधी ने समाजवादी पार्टी के साथ लगभग टूट रहा गठबंधन बचा कर पार्टी में अपनी अहमियत साबित कर दी है। राहुल गांधी यह काम इतनी आसानी से नहीं कर सकते थे, जितनी आसानी से प्रियंका ने कर दिया। वैसे प्रियंका ने भी कुछ नहीं किया, अखिलेश यादव ने तीन दिन पहले ही 17 सीटों की पेशकश कर दी थी। प्रियंका एक भी सीट नहीं बढा सकी, अलबत्ता मध्य प्रदेश की खजुराहो सीट समाजवादी पार्टी को देनी पड़ी।

प्रियंका के फोन का इतना असर जरुर हुआ कि अखिलेश यादव वाराणसी सीट से अपना उम्मीदवार हटाने को सहमत हो गए। वाराणसी हारी हुई सीट है, वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के उम्मीदवार हैं। वैसे भी दो दिन पहले अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान राहुल गांधी वाराणसी की सीट खराब कर आए जब उन्होंने कहा कि वाराणसी में रात को बाजा बज रहा था, और युवक शराब पी कर नाच रहे थे। यूपी वालों के लिए कुछ इसी तरह की टिप्पणी उन्होंने वायनाड में भी की थी, जब उन्होंने कहा था कि दक्षिण के मुकाबले उत्तर प्रदेश के लोग राजनीतिक तौर पर परिपक्व नहीं है।
राहुल गांधी खुद इस तरह की टिप्पणियाँ करके अपनी राजनीतिक अपरिपक्वता का परिचय देते रहे हैं। जबकि प्रियंका गांधी ने शायद ही कभी इस तरह की क्षेत्रवाद और जातिवाद की टिप्पणी की। अलबत्ता प्रियंका गांधी ने बिना कुछ किए ही उत्तर प्रदेश का गठबंधन बचाने का श्रेय ले लिया, जबकि कांग्रेस ने उन्हें इंडी एलायंस की चारों मीटिंगों से दूर रखा था।
कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से रायबरेली और अमेठी समेत 33 सीटों की मांग की थी, रायबरेली और अमेठी को छोड़कर बाकी 31 सीटों पर कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार भी तय कर लिए थे। लेकिन समाजवादी पार्टी ने पहले 11, फिर 15 और आखिर में 17 सीटें देने की पेशकश की, जिसे कांग्रेस को मजबूरी में स्वीकार करना पड़ा। इन 17 में से चार सीटें इलाहाबाद, झांसी, बुलन्दशहर और गाजियाबाद ऐसी सीटें हैं, जो कांग्रेस की 33 सीटों की सूची में नहीं थी।
इसका मतलब हुआ कि कांग्रेस की ओर से माँगी गई 33 सीटों में से उसे सिर्फ 13 सीटें मिली हैं। इलाहाबाद, झांसी, बुलन्दशहर और गाजियाबाद चारों ही भाजपा की मजबूत सीटें हैं। इलाहाबाद में भाजपा की रीता बहुगुणा 56 प्रतिशत वोट लेकर, झांसी में भाजपा के अनुराग शर्मा 59 प्रतिशत वोट लेकर, बुलन्दशहर में भाजपा के भोला सिंह 61 प्रतिशत वोट लेकर और गाजियाबाद में जनरल वी.के. सिंह 62 प्रतिशत वोट लेकर जीते थे।
कांग्रेस की ओर से माँगी गई बलिया, लखनऊ, लखीमपुर खीरी, फरुखाबाद, मुरादाबाद, गोंडा, कैराना. कन्नौज, उन्नाव, बदायू, डुमरियागंज, रामपुर, बिजनौर, बहराईच, फतेहपुर, श्रावस्ती, कुशीनगर, फिरोजाबाद, बागपत और आजम गढ़ सीटें नहीं मिलीं। कांग्रेस को गठबंधन में जो सीटें मिली हैं, उनमें से सहारनपुर और अमरोहा सीटें पिछली बार बहुजन समाज पार्टी जीती थी।
अमरोहा से जीते बसपा के सांसद दानिश अली कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं, इसलिए इस बार वह कांग्रेस के उम्मीदवार होंगे। सहारनपुर में कांग्रेस की ओर से इमरान मसूद को कांग्रेस का टिकट मिलना तय है, 2019 में भी वह कांग्रेस के उम्मीदवार थे और तीसरे नंबर पर आए थे। इस बीच सपा और बसपा से होते हुए वह वापस कांग्रेस में लौट चुके हैं।
सीतापुर और बाराबंकी भाजपा की दो ऐसी सीटें है, जिन्हें भाजपा की दृष्टि से थोड़ा कमजोर समझा जा सकता है। सीतापुर में भाजपा 48 प्रतिशत वोट पाकर और बाराबंकी 46 प्रतिशत वोट पाकर जीती थी। बसपा की दो सीटों और भाजपा की इन दो सीटों, कांग्रेस की रायबरेली सीट के अलावा समझौते में कांग्रेस को मिली बाकी सभी 12 सीटें भाजपा 50 प्रतिशत से ज्यादा वोटों से जीती थी, जिनमें अमेठी भी शामिल है, जहां स्मृति ईरानी को भी 50 प्रतिशत वोट मिले थे।
तो कुल मिलाकर कांग्रेस सिर्फ छह सीटों रायबरेली (जहां प्रियंका वाड्रा उम्मीदवार होंगी), अमेठी (जहां राहुल गांधी उम्मीदवार हो सकते हैं), बसपा की सहारनपुर व अमरोहा और भाजपा की सीतापुर और बाराबंकी में भाजपा को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में हो सकती है।
सहारनपुर में मोदी की बोटी बोटी काट देने की धमकी देने वाले इमरान मसूद को पिछली बार सिर्फ 16 प्रतिशत वोट मिले थे, बसपा के विजयी उम्मीदवार हाजी फजरुल रहमान को 41.89 प्रतिशत और भाजपा के राघव लखनपाल को 40.06 प्रतिशत वोट मिले थे। इसलिए बसपा का उम्मीदवार इस बार सहारनपुर को भाजपा के लिए आसान बना देगा।
इसी तरह अमरोहा में कांग्रेस के उम्मीदवार को पिछली बार सिर्फ 12 हजार वोट मिले थे। कुंवर दानिश अली भाजपा के उम्मीदवार कंवर सिंह तंवर से सिर्फ 63 हजार वोटों के अंतर से जीते थे, 2014 में वह इसी सीट से समाजवादी पार्टी को भारी अंतर से हरा कर जीते थे। इसलिए अमरोहा सीट पर भी कांग्रेस के उम्मीदवार दानिश अली की जीत आसान नहीं होगी।
अब भाजपा की जीती हुई सीतापुर और बाराबंकी को देखें तो सीतापुर में कांग्रेस की केसर जहां को एक लाख वोट भी नहीं मिला था, बसपा के नकुल दूबे को सपा के समर्थन के बावजूद सिर्फ 4 लाख 13 हजार वोट मिले थे। जबकि भाजपा के राकेश वर्मा एक लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीते थे। अगर पिछली बार मिले बसपा, सपा और कांग्रेस के वोट जोड़ दें, तो भी भाजपा भारी पड़ी थी।
बाराबंकी लोकसभा सीट कांग्रेस 25 साल के अंतराल के बाद 2009 में एक बार जीती थी, जब पीएल पूनिया कांग्रेस के उम्मीदवार थे। इस सीट को भाजपा और समाजवादी पार्टी ही जीतती रही है। एक बार 2004 में बसपा जीती थी, पिछली दो बार से वहां भाजपा जीत रही है।
बाराबंकी से कांग्रेस पीएल पूनिया की बेटी तनुज पूनिया को उम्मीदवार बना रही है। वह पिछली बार भी कांग्रेस की उम्मीदवार थी, और उसे सिर्फ डेढ़ लाख वोट मिले थे। समाजवादी पार्टी के राम सागर रावत को सवा चार लाख और भाजपा के उपेन्द्र सिंह रावत को 5 लाख 35 हजार वोट मिले थे। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के वोट मिला दें, तो भाजपा से 50 हजार वोट ज्यादा बन जाएंगे, लेकिन इसमें से बसपा के वोट घटा दें, तो मुकाबला बहुत कड़ा बन सकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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