Jyoti Maurya: बाहरी चमक दमक से बिखरता साझे भविष्य का सपना
Jyoti Maurya: उत्तर प्रदेश की ज्योति मौर्य का मामला इन दिनों सुर्ख़ियों में हैं। यह इसलिए सुर्ख़ियों में है क्योंकि यह कहीं न कहीं हाई प्रोफाइल है और वह मूलत: जिस मध्य वर्ग से आती हैं, वहां पर लड़कियां विवाह के बाद भी नौकरी के अवसरों के लिए अध्ययन जारी रखना ही पसंद करने लगी हैं। आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ साथ यह सामाजिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ा है। जो जीवनसाथी उसे पढ़ाता है, उसके दिल में भी यही आस होती है कि जब वह पढ़ लिख कर अफसर बन जाएगी तो उनके परिवार का सामाजिक और आर्थिक कद बढ़ जाएगा।
प्रश्न यह उठता है कि यदि कोई महिला या पुरुष विवाह के उपरान्त अपने जीवनसाथी से उच्च पद प्राप्त कर ले तो वह अपने उसी जीवनसाथी को हेय या निम्न कैसे समझने लगता है, जिसने अपनी जीवनभर की पूंजी या कहें अपनी कमाई एवं अपना समय, अपना साथ सब कुछ उसकी उन्नति में ही निवेश कर दिया हो?

ज्योति मौर्य का प्रकरण अभी चल ही रहा है कि झारखण्ड से भी ऐसा ही एक मामला सामने आया है जिसमें एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी की आगे पढ़ने की इच्छा का सम्मान करते हुए, उसे नर्सिंग की पढाई कराई। साहिबगंज जिला के बोरियो प्रखंड के बांझी बाजार में रहने वाले कन्हाई पंडित का विवाह वर्ष 2009 में वहीं की कल्पना कुमारी से हुआ था। उसके बाद कल्पना ने आगे पढ़ने की इच्छा व्यक्त की। कन्हाई पंडित का कहना है कि हालांकि उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, फिर भी उन्होंने कर्ज लेकर पत्नी को नर्सिंग की पढ़ाई करवाई। मगर जब वह नर्स बन गयी तो उसका रवैया बदल गया और अब वह अपने बेटे और गहने, पैसे लेकर गायब है, ऐसा पति का आरोप है।
ऐसे एक नहीं कई मामले सामने आते रहते हैं। अब ऐसा प्रतीत होता है कि यह बहुत सामान्य बात है कि जैसे ही महिला पढ़ लिखकर कुछ बन जाती है तो वह सबसे पहले उस पति को ही त्यागती है, जिसने उसके लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। ऐसा ही एक बहुत रोचक मामला कुछ वर्ष पहले नोएडा से आया था, जिसमें कथित रूप से विवाह बचपन में हो गया था लेकिन विदाई नहीं हुई थी। पत्नी का मन पढ़ाई करने का था। कक्षा नौ के बाद पति का मन पढ़ने का नहीं हुआ, मगर पत्नी का मन पढ़ाई जारी रखने का था। इस मामले में पति का कहना था कि उसने अपने पैसे से पत्नी को ग्रेजुएशन कराया मगर उसके बाद विदाई से लड़की ने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि अनपढ़ पति के साथ नहीं रहेगी। इससे नाराज होकर वह उस महिला का खून करने जा रहा था, मगर पुलिस की सतर्कता से यह घटना टल गयी थी।
मध्यप्रदेश के विदिशा में एक पति ने अपनी पढ़ाई रोककर पत्नी की पढ़ाई पूरी कराई थी और उसके बाद पढ़ाई पूरी होते ही वह किसी और के साथ चली गयी थी। पत्नी ने काउंसलर से यह कहा था कि उसका पति कुछ काम नहीं करता है, इसलिए वह पति को छोड़कर चली आई। यही तर्क ज्योति मौर्य वाले मामले में भी लोग दे रहे हैं कि शायद पति के हाथों से सोने के अंडे देने वाली मुर्गी निकल गयी, इसलिए इतना शोर है। यदि वह सही होता तो आपसी बात को कानूनी तरीके से प्रबंधित करता। यह बात सत्य है कि यह दो लोगों का परस्पर मामला है और ऐसे में इस मामले को आपसी बातचीत से ही हल किया जाना चाहिए था, मगर जब पति एवं पत्नी के बीच तीसरे व्यक्ति का प्रवेश हो जाता है, वह मामला निजी नहीं रह पाता और समाज में चर्चा का विषय हो जाता है।
इस विषय में एक और तर्क यह भी दिया जा रहा है कि जैसे ही पुरुष सफल होता है, वह अपनी पहली पत्नी को छोड़ देता है। राजनीति से लेकर समाज तक कई प्रतिष्ठित लोगों के साथ ऐसे कारनामें जुड़े हुए हैं। लेखन जगत में दलित लेखक तुलसीराम की कहानी भी ऐसी ही बताई जाती है। उनको आगे बढ़ने में उनकी पत्नी राधादेवी और ससुराल वालों ने सहायता की, मगर जैसे ही वह पढ़ लिखकर प्रोफ़ेसर बन गए वैसे ही उन्होंने अपनी अनपढ़ पत्नी राधादेवी को छोड़कर अपने से उच्च जाति की महिला से विवाह कर लिया। तुलसीराम जेएनयू में प्रोफ़ेसर थे और दलित साहित्य की एक बहुत बड़ी आवाज थे। उनकी आत्मकथा में उनके तमाम संघर्षों का उल्लेख है, मगर उनकी उस पत्नी का उल्लेख नहीं, जिसने तुलसीराम को प्रोफ़ेसर तुलसीराम बनाने के लिए जीवन का हर सुख न्योछावर कर दिया।
सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यह है कि दलित साहित्य में तुलसीराम पर शोध करने वाले कुछ युवाओं ने ही राधादेवी की कहानी को सामने लाने का कार्य किया था, क्योंकि तुलसीराम ने तो उन्हें एकदम दफन ही कर दिया था। यहाँ तक कि अपनी दूसरी पत्नी और बेटी को भी नहीं बताया था। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि पति पत्नी के बीच बड़ा बन जाने पर किसी एक को छोड़ देने का सवाल क्यों पैदा होता है?
असल में समस्या तब आती है जब साझा भविष्य का सपना देखने वाले व्यक्तियों में से एक अपनी शिक्षा की बाहरी चमक दमक का शिकार होकर अपना भविष्य अलग कर लेता है। यह भविष्य किसी और बात से अलग नहीं करता, बल्कि केवल इसी बात को लेकर अलग कर लेता है कि उसका अनपढ़ या पिछड़ा जीवनसाथी उस चमक दमक का हिस्सा बनने के योग्य नहीं है, जिसमें वह अब रहने जा रहा है।
या फिर यह कहें कि सफल जीवनसाथी का जो सामाजिक एवं आर्थिक स्तर है वह इतना बढ़ जाता है कि उसमें उसका वह जीवनसाथी मिसफिट हो जाता है, जिसने उसे यहाँ तक लाने में अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया है। फिर बात चाहे तुलसीराम की हो, रामविलास पासवान की हो या फिर हाल ही में चर्चित ज्योति मौर्य की, यह बात निकल कर आती है कि समस्या आर्थिक एवं सामाजिक स्तर की है। हाँ, यदि ऐसे मामले बढ़ते हैं, जिनमें पत्नी अपनी पढ़ाई या फिर पति का सहारा लेकर पाई हुई नौकरी के बाद पति को ही त्यागने के लिए उतारू हो जाती है, तो बहुत से ऐसे युवा, जो यह चाहते हैं कि उनकी पत्नी भी पढ़लिख कर उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चले, वह अपनी पत्नी पर निवेश करने से बचेंगे।
जो निवेश व्यक्ति अपने जीवनसाथी पर करता है, वह मात्र धन का ही नहीं होता है, वह आस, उम्मीदों, और साझा सपने एवं साझा भविष्य का निवेश होता है, वह भावनाओं से भरा हुआ, त्याग से परिपूर्ण निवेश होता है, जिसमें वह अपना सर्वस्व यह सोचकर त्याग करता है कि एक दिन उसका जीवनसाथी इस संघर्ष को आकर साझा करेगा, फिर यह दुःख के दिन साथ के चलते सुख में बदल जाएंगे। मगर जब ऐसा नहीं होता तो आलोक मौर्य या कन्हाई पंडित जैसा मुखर क्रंदन या फिर राधादेवी जैसा मौन रुदन सामने आता है जो ऐसे प्रकरण का एक ऐसा काला पक्ष होता है जिसे कोई भी चमक दमक मिटा नहीं कर सकती।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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