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SC Handbook: लैंगिक रूढ़िवादता रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का अहम प्रयास

उच्चतम न्यायालय द्वारा 'हैंडबुक ऑन कॉम्बैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स' नामक नियमों की एक फेहरिस्त जारी की गई है। अब अदालतों में महिलाओं को लेकर पहले से इस्तेमाल होते आ रहे बहुत सारे शब्दों की जगह नये शब्दों का चयन किया गया।

उच्चतम न्यायालय द्वारा 'हैंडबुक ऑन कॉम्बैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स' नामक नियमों की एक फेहरिस्त जारी की गई है। अब अदालतों में महिलाओं को लेकर पहले से इस्तेमाल होते आ रहे बहुत सारे शब्दों की जगह नये शब्दों का चयन किया गया है। जैसे अब कोर्ट में हाउसवाइफ की जगह होममेकर और जनाना की जगह जेन्डर न्यूट्रल शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा।

यह जाने कब से चली आ रही लिंग आधारित शब्दावली को बदलने से जुड़ी एक सार्थक मुहिम है। ऐसी मुहिम जो स्पष्ट रूप से यह संदेश भी देती है कि शब्दों के साथ-साथ समाज की सोच भी बदले। एक तयशुदा सम्बोधन से जुड़े शब्द केवल उच्चारित भर नहीं होते बल्कि मन-मस्तिष्क में उनके पीछे मौजूद सोच की पृष्ठभूमि भी होती है। अब कानूनी शब्दावली में परिवर्तन करने से आज नहीं तो कल समग्र समाज भी इन नए शब्दों का प्रयोग करेगा जिससे उसकी सोच में अंतर आयेगा।

SC Handbook: important effort by the Supreme Court to stop gender stereotyping

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकृत यह 'हैंडबुक' अदालतों में सुनवाई के दौरान लैंगिक भेदभाव को कम करने से जुड़ा एक बड़ा फैसला तो है ही समग्र परिवेश के लिए शब्दों का असर समझने का संदेश भी लिए है। मौजूदा पीढ़ी के परिप्रेक्ष्य में इनके अर्थ समझने और स्वीकारने का काम समाज के हिस्से है तो भावी पीढ़ियों में इसे पोषित करने का दायित्व घर-परिवार की ज़िम्मेदारी।

दरअसल, 'हैंडबुक ऑन कॉम्बैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स' में उन शब्दों को बदल दिया गया है, जो महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी सोच को इंगित करते हैं। कानूनी चर्चा में उपयोग होने वाले लिंग संबंधी अनुचित शब्दों की इस कानूनी शब्दावली की योजना पर कई वर्षों से काम हो रहा था। इसी वर्ष महिला दिवस समारोह में पहली बार इसकी घोषणा की गई थी। 8 मार्च 2023 को महिला दिवस पर सुप्रीम कोर्ट में हुए एक आयोजन में भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि 'कानूनी मामलों में महिलाओं के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल रुकेगा, जल्द ही उसकी डिक्शनरी भी आएगी। इससे जजों और वकीलों को यह समझने में आसानी होगी कि कौन से शब्द रूढ़िवादी हैं और उनसे कैसे बचा जा सकता है?'

हाल ही में सीजेआई चन्द्रचूड़ ने यह भी कहा है कि इन शब्दों को अदालत में दलीलें और आदेश देने के साथ ही उसकी कॉपी करने के काम में लिया जा सकता है। साथ ही यह पुस्तिका वकीलों के लिए ही नहीं जजों के लिए भी है। इतना ही नहीं इस पुस्तिका में स्त्रियों के व्यवहार को लेकर बने पूर्वाग्रहों पर सवाल उठाया गया है। महिलाओं के गुणों के बारे में बनी हुई कुछ रूढ़िगत धारणाओं को भी सूचीबद्ध कर इन्हें गलत बताया है। इनमें महिलाओं का अत्यधिक भावुक होना, निर्णय न ले पाना और अतार्किक होना रूढ़िवादी सोच है।

सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार 'किसी इंसान का लिंग उसकी तर्कसंगत विचार क्षमता को प्रभावित नहीं करता। अविवाहित महिलाएँ अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय नहीं ले सकतीं, यह भी रूढ़िवादी सोच है। सच तो यह है कि विवाह किसी व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित नहीं करता।

पुस्तिका के तहत सर्वोच्च अदालत से महिलाओं के लिए इस्तेमाल में लाए जाने वाले बहुत से आपत्तिजनक शब्दों पर पाबंदी लगाई है। इस संबंध में शीर्ष न्यायालय द्वारा जारी 30 पन्नों की इस पुस्तिका में शामिल नई शब्दावली लैंगिक रूढ़िवादिता को रोकने की दिशा में अहम प्रयास ही कहा जाएगा। ज्ञात हो कि अब अदालतों में छेड़छाड़, प्रॉस्टिट्यूट, मिस्ट्रेस, देह व्यापार, वेश्या, हाउसवाइफ, ईव टीजिंग जैसे कई शब्दों की जगह नए सुझाए गए वैकल्पिक शब्दों का इस्तेमाल होगा। यह पुस्तिका कलकत्ता उच्च न्यायालय की जज मौसमी भट्टाचार्य की अध्यक्षता वाली एक समिति द्वारा तैयार की गई है। इस समिति में रिटायर्ड जस्टिस प्रभा श्रीदेवन, जस्टिस गीता मित्तल और प्रोफेसर झूमा सेन शामिल थीं।

पुस्तिका में शामिल वैकल्पिक शब्दों में लिंग आधारित पुरातनपंथी सोच को बढ़ावा देने वाली भाषा की पहचान करने और उपयुक्त विकल्प सुझाने का काम किया गया है। सुझाए गए नए शब्दों में अफेयर को शादी के इतर रिश्ता, प्रॉस्टिट्यूट/हुकर (पतुरिया) को सेक्स वर्कर, अनवेड मदर (बिनब्याही मां) को मां, चाइल्ड प्राॅस्टिट्यूट को तस्करी करके लाया बच्चा, बास्टर्ड को ऐसा बच्चा जिसके माता-पिता ने शादी न की हो, ईव टीजिंग को स्ट्रीट सेक्शुअल हैरासमेंट, प्रोवोकेटिव क्लोदिंग (भड़काऊ कपड़े) की जगह सिर्फ क्लोदिंग/ड्रेस और जनाना की जगह जेंडर न्यूट्रल शब्दों का प्रयोग किया जाएगा।

इसी तरह अब अदालतों में हाउसवाइफ को होममेकर, कॉन्क्युबाइन/कीप (रखैल) को ऐसी महिला जिसका शादी के इतर किसी पुरुष से शारीरिक संबंध हो, वफादार पत्नी, अच्छी पत्नी या आज्ञाकारी पत्नी को सिर्फ वाइफ (पत्नी), भारतीय महिला/पश्चिमी महिला को सिर्फ महिला ही कहा जाएगा।

असल में नए शब्दों को सुझाती यह पुस्तिका महिलाओं को लेकर चली आ रही लैंगिक रूढ़िवादिता से जुड़े सामान्य पर बहुत हद तक गलत रीजन‌िंग पैटर्न को सामने रखती है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा कहा भी गया है कि 'हैंडबुक महत्वपूर्ण मुद्दों, खासकर यौन हिंसा से संबंधित मुद्दों पर प्रचलित कानूनी सिद्धांत को भी समाहित करती है। हैंडबुक का लॉन्च एक न्यायसंगत समाज की दिशा में महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।'

दरअसल, जीवन का कोई पहलू हो, भाषा बहुत गहराई से प्रभावित करती है। यह असर सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी। सम्बोधन से जुड़े शब्द सम्बलदायी भी हो सकते हैं और मनोबल तोड़ने वाले भी। विशेषकर महिलाओं के विषय में तो यह शब्दों का इस्तेमाल मान-अपमान तक तय करता है। ऐसे में इस पुस्तिका में कानूनी शब्दावली अगर व्यवहार की भाषा बन सके, यह एक बड़ा बदलाव होगा। यही वजह है कि शब्दों की यह सूची पूर्वाग्रही सोच के बजाय स्त्रियों को लेकर सकारात्मक मनोभावों को बल देने वाली है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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