Same Sex Marriage: सरकार, समाज और सुप्रीम कोर्ट के बीच फंसा समलैंगिक विवाह
समलैंगिक विवाह को मान्यता देने को लेकर सरकार और 'कम्युनिटी' के बीच वर्षों से ठनी है। अब यह जंग करीब-करीब निर्णायक मोड़ पर आ पहुंची है। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने कल से इस मामले की सुनवाई शुरू कर दी है।

Same Sex Marriage: आप उनकी मजाक उड़ा सकते हैं। उनकी भर्त्सना कर सकते हैं। उनकी शिकायत कर सकते हैं, लेकिन उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते। एलजीबीटीक्यू+ समुदाय में अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता और मुखरता लगातार बढ़ रही है, साथ ही समाज में कम्युनिटी की स्वीकार्यता भी बढ़ रही है। यह स्वीकार्यता एक बहुत लंबे संघर्ष, धैर्य और अथक प्रयासों की देन है।
एलजीबीटीक्यू+ कम्युनिटी में ऐसे व्यक्ति आते हैं जिनके यौन रुझान (सेक्सुअल ओरेएंटेशन) और लैंगिक पहचान (जेंडर आइडेंटिटी) सामान्य स्त्रियों या पुरुषों की पारंपरिक अवधारणा अथवा प्राकृतिक नियमों के दायरे में न आती हों।
बढ़ती गई श्रेणियॉं
कुछ साल पहले तक समाज ऐसे रुझानों के सिर्फ तीन प्रकारों से परिचित था। पुरुषों के साथ संबंध स्थापित करने में रुचि रखने वाले 'गे' पुरुष, स्त्रियों के साथ संबंध बनाने वाली लेस्बियन स्त्रियां और लैंगिक रूप से 'न स्त्री न पुरुष' की श्रेणी में आने वाले 'ट्रांसजेंडर'। लेकिन यह वह दौर था, जब इन्हें मानसिक विकृति या शारीरिक विकार से ग्रस्त लोगों के रूप में देखा जाता था। धीरे-धीरे इस विषय पर खुल कर चर्चा होनी शुरू हुई तो पता चला कि यह 'वैकल्पिक' संसार इतना छोटा नहीं है कि इसे सिर्फ तीन श्रेणियों से पहचाना जा सके।
इनमें बाई सेक्सुअल (स्त्री पुरुष दोनों से यौन संबंध) जुड़े तो यह एलजीबीटी समुदाय बना। फिर इनमें क्वीअर शब्द का 'क्यू' जुड़ा। इसमें ऐसे व्यक्ति शामिल किए गए, जो लेस्बियन, गे या ट्रांसजेंडर नहीं थे, लेकिन उनके यौन रुझान सामान्य से हटकर थे। फिर क्वीअर ( विचित्र या अजीबोगरीब) शब्द थोड़ा आपत्तिजनक लगने लगा तो इसे 'क्वेश्चनेबल आइडेंटिटी' में बदल दिया गया। इसके बाद इसमें इंटर सेक्स (उभय लिंगी) और असेक्सुअल (किसी के साथ भी यौन संबंध बनाने में रुचि न रखने वाले) के लिए 'आई' और 'ए' जोड़ा गया।
फिर महसूस किया गया कि अभी और भी कई यौन रुझान हैं, जो अस्तित्व में हैं और जिन्हें पहचान की जरूरत है। तो इन सबको कम्युनिटी में शामिल करने के लिए प्लस(+) का निशान लगा दिया गया। इस प्लस में पैन सेक्सुअल, सिसजेंडर, सेपियो सेक्सुअल 'डेमी सेक्सुअल जैसी कई समाज की श्रेणियां शामिल हैं। इससे एलजीबीटी क्यू समुदाय का काफी विस्तार हो गया, और उसके दबदबे का भी।
समाज में एलजीबीटीक्यू कम्युनिटी से जुड़े लोगों को हमेशा या तो उपहास की दृष्टि से देखा गया है या घृणा की। अपने रुझानों के लिए उन्हें अक्सर भावनात्मक और शारीरिक उत्पीड़न झेलना पड़ता है। भारत में इस स्थिति में एक बड़ा बदलाव आना शुरू हुआ 6 सितंबर 2018 से जब सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को रद्द कर समलिंगी संबंधों का अपराधीकरण समाप्त कर दिया। इसके बाद कम्युनिटी के सदस्य खुलकर सामने आने लगे और अपने लिए सम्मान व अधिकारों की माँग करने लगे। कानूनी रूप से विवाह का अधिकार दिए जाने की मांग इन्हीं में से एक है।
जहाँ तक वैश्विक स्तर पर समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता देने का प्रश्न है, तो इसकी शुरूआत 22 साल पहले ही हो चुकी थी। वर्ष 2001 में नीदर लैंड ऐसा करने वाला पहला देश बना। फिर इसमें दूसरे देश शामिल होते गए और अब दुनिया के 33 देशों में ऐसे संबंधों को कानूनी दर्जा प्राप्त है। इजराइल और फ्रांस जैसे देश तो इस दिशा में और भी आगे बढ़ चुके हैं। फ्रांस में दो साल पहले ही लेस्बियन पार्टनरों को आईवीएफ समर्थित संतानोत्पत्ति की कानूनी इजाजत दी जा चुकी है। वहीं पिछले साल जनवरी में इजराइल में भी समलिंगी जोड़ों और ट्रांसजेंडरों को सरोगेसी के जरिए संतान सुख पाने का अधिकार प्रदान किया गया है।
स्वीकार्यता है, मान्यता नहीं
भारत में बेशक अभी समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता न हो, लेकिन इसके लिए समर्थन लगातार बढ़ रहा है। ग्लोबल मार्केटिंग रिसर्च ग्रुप इप्सोस के एक सर्वेक्षण में 44 प्रतिशत भारतीयों ने ऐसे विवाहों को मान्यता देने का समर्थन किया है, जबकि इसके विरोध में सिर्फ 18 प्रतिशत ही थे।
सरकार इस मांग का समर्थन नहीं करती। उसका तर्क है कि इस तरह के संबंधों को मान्यता दी गई तो इससे भारतीय समाज और परिवार व्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचेगा। वहीं, सुप्रीम कोर्ट इस मामले को लेकर थोड़ा उदार और सहानुभूतिपूर्ण नजर आ रहा है।
'विवाह' को मान्यता दिए जाने की मांग को लेकर यह जटिल स्थिति इसलिए नहीं बनी है कि किसी को 'दो स्त्रियों' या 'दो पुरुषों' के संबंधों से आपत्ति है। भारत में इस तरह के कई विवाह' पहले भी हो चुके हैं। और ऐसे युगल' शांति के साथ 'सहजीवन' का आनंद ले रहे हैं। जटिलता की वजह यह है कि इसमें 'बच्चे' व 'उत्तराधिकार' जैसे मुद्दे भी शामिल हैं।
हमारे यहां समलैंगिक विवाहों को मान्यता दिए जाने के विरोध में जो प्रमुख तर्क दिए जाते हैं, उनमें एक तर्क यह है कि इससे सामाजिक संरचना को नुकसान पहुंचेगा। समर्थकों का कहना है कि वर्तमान में दुनिया भर में करीब तीन दर्जन देशों में समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता है। इनमें से कहीं भी कोई समाज नष्ट नहीं हुआ है।
दूसरा तर्क है कि 'विवाह' नामक संस्था की रचना एक स्त्री व एक पुरुष' के संबंधों को कानूनी व सामाजिक स्वीकृति / वैधता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई है ताकि एक पारिवारिक व्यवस्था को बनाए रखा जा सके। इस बारे में मोन्टाना विश्वविद्यालय की प्रोफेसर एवं 'लव्स राहट : सेम सेक्स मैरिजेज इन मॉडर्न इंडिया' की लेखिका रुथ वनिता एक बड़ा दिलचस्प तर्क देती हैं। हाल ही में अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने 'हिंदू विवाह अधिनियम' और स्पेशल 'मैरिज एक्ट' की जेंडर न्यूट्रल भाषा की बात कही है। उनका कहना है कि इसमें कहीं भी स्त्री या पुरुष शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसके स्थान पर 'वर-वधू' या 'ब्राइड-ग्रूम' जैसे शब्द दिए गए हैं।
कैसे होगा लिंग निर्धारण?
18 अप्रैल को मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने अपनी टिप्पणी में इसका एक अलग ही पक्ष सामने ला दिया है। उनका कहना है कि जैविक रूप से पुरुष या महिला की कोई सम्पूर्ण अवधारणा नहीं है। लिंग का प्रश्न किसी के जननांगों द्वारा निर्धारित नहीं किया जा सकता। श्री चंद्रचूड़ का यह कथन बहुत सारे दार्शनिक, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक विमर्शो का कारण बन सकता है। लेकिन यह कम्युनिटी के प्रति उनके सहानुभूतिपूर्ण नजरिए का संकेत देता है। इससे पहले पिछले साल अगस्त में भी वह बीटल के प्रसिद्ध गीत 'ऑल यू नीड इज लव: लव इज ऑल यू नीड' का उल्लेख करते हुए कह चुके हैं कि वे इससे सहमत नहीं हैं। उनका कहना था कि 'कम्युनिटी ' के साथ हो रहे भेदभाव को खत्म करने और समानता को हासिल करने के लिए समलैंगिक संबंधों का सिर्फ अनपराधीकरण ही काफी नहीं है।
कहने का आशय यह नहीं है कि उनकी अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ का फैसला उनके इस दृष्टिकोण से प्रभावित हो सकता है, लेकिन यह देखना वाकई में रुचिकर होगा कि इस पीठ का निर्णय, 2018 में समलैंगिक संबंधों का अनपराधीकरण करने वाली पीठ के फैसले से अलग होगा या उसका विस्तार। गौरतलब है कि इस पीठ के एक प्रमुख सदस्य जस्टिस चंद्रचूड़ भी थे, जो वर्तमान पीठ की अध्यक्षता कर रहे हैं।
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बहरहाल सुप्रीम कोर्ट में जिरह जारी है। दोनों पक्षों के तरकश से तर्कों के तीर निकल रहे हैं। लेकिन न्यायपालिका न तो धृतराष्ट्र है और न ही भीष्म पितामह। वह भी बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। फिर भी चाहे-अनचाहे वह इस मामले का तीसरा पक्ष बन ही गई है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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