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CJI Chandrachud Comment: आधुनिक स्त्री विमर्श पर सवाल उठाती है जस्टिस चंद्रचूड़ की टिप्पणी

सेम सेक्स मैरिज के मसले पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने मात्र देह से स्त्री पुरुष के निर्धारण की प्राकृतिक व्यवस्था पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। उनके इस सवाल से सबसे बड़ा नुकसान आधुनिक स्त्री विमर्श को होनेवाला है।

same gender marriage CJI comment raises questions on modern womens discourse

CJI Chandrachud Comment: समलैंगिक विवाह के मामले पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि कौन महिला है और कौन पुरुष, यह जननांग निर्धारित नहीं करते हैं, बल्कि यह एक जटिल विषय है। इस बात को लेकर जनता के मध्य बहस छिड़ी है और लोग तरह तरह के मजाक बना रहे हैं। यह कथन उपहास का विषय बना हुआ है तो कहीं इस पर गंभीर विमर्श भी हो रहा है।

परन्तु एक बात यह भी सत्य है कि यह विषय आज का विषय नहीं है। यह विमर्श पश्चिम में कई वर्षों से चल रहा है और ट्रांसवीमेन का विमर्श अर्थात 'जन्म से स्त्री नहीं' का मामला बीते कुछ वर्षों से सिर उठा रहा है। और अब तो ओलम्पिक एसोसिएशन ने भी ऐसी खिलाड़ियों को लेकर कई नियम बना दिए जो जन्म से महिला नहीं हैं, परन्तु जो कुछ हारमोन ट्रीटमेंट के बाद महिला होने का दावा कर सकते थे। ऐसे पुरुष, महिलाओं की प्रतिस्पर्धाओं में भाग ले सकते थे।

हालांकि कई विवादों के बाद अभी हाल फिलहाल के लिए निर्णय पर रोक है। परन्तु भारत में यह विमर्श अभी चर्चा का मुद्दा नहीं है, जिस पर अब चर्चा होनी चाहिए और चर्चा इस दृष्टिकोण के साथ होनी चाहिए कि यह विमर्श आखिर है क्या और यह लोग कौन हैं जो लैंगिक और यौनिक पहचान के प्रति इस प्रकार का भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं?

जब इंसान जन्म लेता है तो वह या तो महिला या पुरुष जननांग के साथ ही जन्म लेता है और इसी के आधार पर उसके लिंग का निर्धारण होता है। कथित स्त्रीविमर्श भी इसी लैंगिक एवं यौनिक पहचान को लेकर ही अपना रूप तथा आकार ग्रहण करता है। इसी के आधार पर कथित अत्याचारों की वह कहानियां गढ़ी जाती हैं, जिनमें समाज को कोसा जाता है। समाज को और पुरुष को खलनायक घोषित किया जाता है।

तमाम स्त्री विमर्श को स्त्री के जननांग तक सीमित करके एक पीड़ा का विमर्श गढ़ दिया गया है। योनि को पहचान बनाई गयी और फिर उस पहचान के इर्दगिर्द कहानी और कविता रची गईं। यहां तक कि शिवलिंग को भी सीमित कर दिया गया और पार्वती की योनि जैसी कविताएँ रची गईं। दादियों, नानियों की योनि तक को नहीं छोड़ा गया। अर्थात पुरुषों को अत्याचारी घोषित करके जननांग आधारित पूरा विमर्श रच दिया गया।

उसी योनि के आधार पर स्त्री की अस्मिता रची गयी और यह कहा गया कि महिला को उसके जननांग के आधार पर अपमानित किया जाता है। जबकि भारत में तो कामाख्या देवी का मंदिर ही इस पूरे जननांग सम्बन्धित विमर्श की काट करता है। जो समाज इतना उन्नत था कि उसने इस अंग की महत्ता को जानते हुए पूजा तक की, उस समाज पर यह आरोप लगाया गया कि पुरुषों ने उसे जननांग के आधार पर पीड़ित किया और उसके साथ भेदभाव किया। स्त्री अस्मिता के विमर्श का सत्यानाश करने के बाद और समाज में पुरुषों को खलनायक बनाने के बाद अब यह विमर्श कहीं न कहीं अपने ही जाल में फंसता जा रहा है।

कथित अस्मिता के पैरोकार अभी तक शोषण का मापदंड स्त्री जननांग को बनाते आए हैं। उनके अनुसार "देह ही देश है" अर्थात, जितने भी युद्ध लड़े गए थे, उनमें स्त्री की देह ही पैमाना थी, अर्थात युद्ध में जीती गयी स्त्रियों को विजेता पुरुषों ने अपने जीत का मैदान बना दिया। हालांकि देह ही देश का उदाहरण बाहरी आक्रांताओं का इतिहास रहा है लेकिन इस स्त्री देह विमर्श में निराधार तरीके से भारतीय राजाओं को भी लपेट लिया गया।

अब जब लगभग अस्सी वर्ष इस विमर्श को चलते हो गए हैं, और तमाम कथित रिपोर्ट्स आदि के माध्यम से यह प्रोपोगैंडा हमारे अकादमिक एवं साहित्यिक जगत में पर्याप्त स्थान भी पा चुका है, तो ऐसे में चंद्रचूड़ का यह कहना कि जननांगों के चलते किसी भी व्यक्ति के लिंग का निर्धारण नहीं हो सकता, इस पूरे विमर्श को समाप्त कर देगा।

स्त्रियों के गुण भी इस कथित स्त्री विमर्श ने मात्र जननांगों के आधार पर निर्धारित कर दिए थे एवं तमाम क्रांति भी इसी के इर्दगिर्द थी। अब जब जननांग का ही भेद मिटाते हुए न केवल माननीय सीजेआई यह कह रहे हैं कि महिला एवं पुरुष का भेद जननांगों से पता नहीं चलता तो फिर ऐसे में उस तमाम विमर्श का क्या होगा जो इस आधार पर रचे गए एवं जिनका प्रयोग समाज को तोड़ने के लिए किया गया, पुरुषों को खलनायक बताने के लिए किया गया?

इसी जननांग आधारित स्त्री विमर्श के आधार पर जीवन भर स्वयं को पीड़ित बताने वाली महिलाएं, अब किस आधार पर अपने आपको पीड़ित घोषित करेंगी? अब तो उनके द्वारा पीड़ित एक वर्ग पैदा हो रहा है, जहां उसकी यौनिक पहचान के आधार पर भेदभाव किया जा रहा है। और ऐसा करने वाली हो सकता है कि वही महिलाएं हों, जो स्वयं को पीड़ित बताती थीं।

ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आने वाला समय परिवार तोड़ने वाले फेमिनिज्म के लिए बहुत ही दुविधापूर्ण होने वाला है क्योंकि उनके विमर्श के और समाज को दोषी ठहरने के तमाम तर्क ढह जाएंगे और रह जाएगा तो एक नया कथित अल्पसंख्यक एवं दमित वर्ग जिसे समाज इसलिए नहीं स्वीकार रहा है क्योंकि लैंगिक एवं यौनिक पहचान में कुछ समस्या है।

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    चंद्रचूड़ जी का यह कथन मात्र आरम्भ है, और देखा जाए तो एक हिसाब से यह ठीक ही है क्योंकि हर विकृत विमर्श स्वयं से उपजे कई विकृत विमर्शों के माध्यम से ही अपनी मृत्यु को प्राप्त होता है। हो सकता है कि यह अभी कहना शीघ्रता हो, परन्तु जैसे जैसे देह के प्रति भ्रम बढ़ता जाएगा, कथित स्त्री अस्मिता विमर्श ढहता जाएगा।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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