प्रकृति के लिए क्यों बलिदान हो जाते हैं साधु संत ?
बहुत सारे लोग इस बात को भूल गए होंगे कि 2011 में स्वामी निगमानंद ने गंगा को बचाने के लिए अपनी जान दे दी थी। वे अवैध खनन और पत्थर माफिया के खिलाफ अनशन कर रहे थे। इधर खबर आ रही है कि जिन कारणों से स्वामी निगमानंद ने अपनी जान दे दी थी उन्हीं कारणों से भरतपुर में संत विजय दास ने आत्मदाह कर लिया।

अगर कोई कायदे से शोध करे तो पर्यावरण को बचाने में हमारे साधु-संतों के बलिदान की सूची लंबी हो सकती है। कोई यह कह सकता है कि बहुत सारे पुलिस और प्रशासनिक अफसर भी खनन माफिया के शिकार हुए हैं। बहुत सारे एक्टिविस्ट, पत्रकार भी। लेकिन पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों या एक्टिविस्टों के विरोध करने या जान गंवाने और साधु-संतों के बलिदान में एक बुनियादी फर्क है।
यहां हम अलग अलग लोगों के जीवन का मूल्य अलग अलग निर्धारित नहीं कर रहे हैं। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि एक वर्ग अपनी नौकरी या आजीविका के कारण ऐसा करता है जो सिस्टम का पार्ट होने के नाते उसका दायित्व है। अखबार या मीडिया भी सिस्टम का एक पार्ट (चौथा खंभा) है और वहां की रिपोर्टिंग भी नौकरी के दायरे में ही आती है। अखबार या कोई अन्य पेशा एक सामाजिक-आर्थिक अंत:क्रिया का उत्पाद है। वैसा ही आधुनिक एक्टिविज्म में भी है, सूक्ष्म और व्यापक स्तर पर स्थानीय और वैश्विक राजनीति का विस्तार ही होता है।
लेकिन साधु-संतों का पर्यावरण को बचाने के लिए जान देना अलग मामला है और यह धर्म से जुड़ा हुआ है। वह धर्म जो किसी व्यक्ति, किताब या एक ईश्वर को सम्मान देने से नहीं जुड़ा है। वह रिलीजन या मजहब का अनुवाद नहीं है। वह व्यापक अर्थों में कर्तव्यों की एक श्रृंखला है जो देश और काल के हिसाब से अनुकूलित होता है, जो प्रवाह में है, जो अपने सिद्धांतों में तो स्थिर है लेकिन निरंतर परिवर्तनशील है। वह धर्म मूलत: प्रकृति पूजकों का धर्म है, जिसमें पृथ्वी, नदी, पहाड़, वन, पशु, वायु सब कुछ देवतुल्य है।
ऐसा ही धर्म यूरोप और अरब में ईसा और इस्लाम पूर्व जनजातियों का भी था जिन्हें यूरोप में पैगन कहकर तिरस्कृत और उत्पीड़ित किया गया। ऐसा ही धर्म दुनिया भर की जनजातियों का भी है जिन्हें औपनिवेशिक काल में प्रताड़ित, उन्मूलित और धर्मांतरित किया गया और किया जा रहा है। ये वे धर्म हैं जो कण-कण में ईश्वर को देखते हैं । वे एक सर्वसत्ता को भी मानते हैं और उसके हजारों स्वरूपों को भी। वे अपने स्वभाव में बहुलतावादी, सहिष्णु और लोकतांत्रिक हैं।
शायद इसलिए उन्होंने विश्वव्यापी साम्राज्य नहीं बनाए या अपने मत को दुनिया पर थोपने की आकांक्षा नहीं की। यही वो चेतना है जो किसी निगमानंद को गंगा को अपवित्र और असुरक्षित होते देखकर विचलित कर देती है। यही वो चेतना है जो किसी संत विजय दास को आत्मदाह पर मजबूर कर देती है। इन बलिदानों में किसी कॉरपोरेट फंडिग या प्रतिस्पर्धा का सूत्र नहीं मिलता। ये बलिदान मनुष्य के अंतस से उपजे हुए हैं जिनकी जड़ें उनके धर्म में हैं।
आचार्य रजनीश ने अपने प्रवचनों में एक पुस्तक "कंक्वेस्ट ऑफ नेचर" का जिक्र किया है जो पिछली सदी में यूरोप में छपी थी। इस नाम से हालांकि कई किताबें हैं। रजनीश ने कहा कि पूरब के देशों में इस नाम की किताब की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। लोग लेखक को गाली देते या भला-बुरा कहते। लेकिन पश्चिम में ऐसा संभव है क्योंकि प्रकृति को देखने का उनका नजरिया भिन्न है।
आधुनिक एक्टिविज्म, एनजीओ या सरकारी व्यवस्था पर निर्भर रहकर प्रकृति की सुरक्षा लगभग असंभव है। ऐसा इसलिए कि एनजीओ या ज्यादातर एक्टिविज्म की फंडिग कॉरपोरेट करता है जो प्रकृति को एक संसाधन से ज्यादा नहीं देखता। हिरण की रखवाली खूंखार शेरों के हाथ सौंपना मन बहलाव से अधिक कुछ नहीं है।
ऐसे में धार्मिक परंपराएं हमारे पर्यावरण के लिए बड़ा आश्वासन हैं। हमें याद है कि उड़ीसा के नियामगिरि की पहाड़ियों को एक कॉरपोरेट के हाथों से जाने से इसलिए बचाया जा सका था क्योंकि गांव के जनजातियों के लिए वो पहाड़ियां देवता समान थीं। हमने देखा है कि सरकारी संरक्षण, मीडिया विस्फोट और एक्टिविज्म के फलते-फूलते दौर में देश से सैकड़ों नदियां, झीलें और हजारों तालाब गायब हो गए। सैकड़ों पहाड़ियां गायब हो गईं। ऐसा इसलिए हुआ कि इस सिस्टम, मीडिया या एक्टिविज्म में कोई धार्मिक भावना नहीं थी। उनके लिए वे पहाड़, नदियां या तालाब आराध्य नहीं थे, बल्कि संसाधन भर थे।
हाल ही में कई अखबारों ने पटना और दरभंगा शहर से करीब 500 तालाबों के गायब होने की खबर प्रकाशित की है। यह उस दौर में हो रहा है जब वे तालाब सरकारी हो गये थे और उनकी रखवाली के लिए लोकतंत्र कथित तौर पर जड़े जमा रहा था। ये तालाब उस समय बचे हुए थे जब वे निजी थे या जमींदारों या ग्राम समाज के अधीन थे और जब देश में लोकतंत्र नहीं था। लेकिन लोकतंत्र और आधुनिक विकास के कॉकटेल ने पहला प्रहार पर्यावरण पर ही किया, जिसके नतीजे में पर्यावरण संरक्षित होने की बजाय तेजी से नष्ट होने लगा।
चूंकि आधुनिक पूंजीवाद और साम्यवाद का जन्म यूरोप में हुआ है, तो उनके देखने की दृष्टि लगभग एक समान है। वे दोनों यूरो-सेंट्रिक हैं। उनसे पर्यावरण की रक्षा की कल्पना करना बेमानी है। व्यापार, उद्योग और राजनीति में जब तक वह धार्मिक भावना नहीं होगी, जो प्रकृति को संसाधन न मानकर माता मानती हो, तब तक पर्यावरण की सुरक्षा ख्याली पुलाव है। वह आश्वासन यूरोप की आधुनिकता और विकास में नहीं है लेकिन वह आश्वासन भारतीय परंपराओं में है, दुनिया भर के बहुलतावादी जनजातीय जीवन और मतों में है और पूर्वी जीवनशैलीयों में है।
हमें स्वामी निगमानंद और बाबा विजय दास के बलिदानों और उनके धार्मिक मूल्यों को इसी दृष्टिकोण से देखना चाहिए। ये धार्मिक मूल्य विश्व कल्याण के लिए दुर्लभ हैं और मानव सभ्यता को इन्हीं से कुछ आशा बंधती हैं
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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