Conversion in Punjab: गुरुग्रंथ के राम की बजाय बाईबल के गॉड के प्रति सिखों के रुझान का कारण क्या है?

Conversion in Punjab: इस बार नानक जयंती पर सिखों का धर्मांतरण चर्चा में है। यह चर्चा बीते कुछ समय से लगातार बढती जा रही है। लेकिन सिखों के साथ ऐसा क्या हुआ है कि अचानक से ईसाई धर्म के प्रति उनका रुझान बढ गया? अपने राम की बजाय बाईबल, गॉड और क्रॉस में उनकी इतनी अगाध श्रद्धा क्योंकर हो गयी?

Rise in conversion of Sikhs in Punjab

सिखों के प्रथम गुरु नानक देव सनातन परंपरा में निर्गुण निराकार की आराधना वाले एक क्रांतिकारी संत थे। वो पंडा पुरोहितवाद के विरोधी थे। इसके लक्षण उनके शुरुआती दिनों में ही मिलते हैं।

गुरु नानक ने अपना विवाह वैदिक पद्धति से नहीं किया था। वो इसे पुरोहितवाद मानते थे इसलिए उन्होंने ऐसे वैदिक विवाह का विरोध किया। 1487 में उनका विवाह सुलखनी देवी के साथ हुआ लेकिन कहा जाता है कि उन्होंने सात फेरे लेने की बजाय चार फेरे ही लिये थे।

कुछ सिख जानकार यह भी कहते हैं कि उन्होंने अग्नि के सात फेरे लेने की बजाय एक कागज पर नाम (संभवत: राम) लिखकर उसके चार फेरे लिये थे। गुरु नानक देव के इस व्यवहार की चर्चा करते हुए कोई भी सिख यह तर्क देता हुआ मिल जाता है कि कैसे सिख धर्म में पंडा पुरोहितवाद का निषेध किया गया है। इसकी शुरुआत उनके पहले गुरु नानक देव ने ही कर दी थी।

इसके बाद के जीवन में भी गुरु नानक कर्मकांड का निषेध ही करते रहे। सिखों में ऐसी कई कहानियां प्रचलित हैं कि कैसे प्रयाग संगम से लेकर हरिद्वार तक में गुरु नानक ने पंडितों का पाखंड उजागर किया। इन कहानियों को सिख इस तरह से प्रस्तुत करते हैं मानों इसी विरोध की वजह से गुरु नानक ने जो मार्ग बताया वह अलग धर्म बन गया जिसे आज सिख धर्म कहा जाता है।

इस सिख धर्म को वैदिक धर्म से अलग दिखाने के लिए बीते सौ सालों में प्रचुर मात्रा में साहित्य लिखा गया है। इसकी शुरुआत मैक्स आर्थर मैक्लिफ के गुरुग्रंथ के अंग्रेजी अनुवाद से होती है।

मैक्लिफ भारतीय प्रशासनिक सेवा का ब्रिटिश अधिकारी था। 1864 में उसकी नियुक्ति वर्तमान पंजाब में हुई थी। पहली बार यहां उसने नानक पंथ को जाना और उसी ने सबसे पहले नानक पंथी सिखों को हिंदुओं से अलग धर्म के रूप में मान्यता देने की पहल शुरु की थी।

यह एक लंबी कहानी है कि कैसे उसने ब्रिटिश प्रशासन के स्तर पर सिखों को अलग धर्म के रूप में मान्यता दिलाने के लिए प्रयास किया जिसमें वह सफल भी हुआ। यह आर्थर मैक्लिफ ही था जिसने कान्ह सिंह नाभा को सिख धर्म का इतिहास नये सिरे से लिखने में मदद की।

आर्थर मैक्लिफ की मदद से कान्ह सिंह नाभा ने एक किताब लिखी जिसका नाम था "हम हिन्दू नहीं।" इसके अलावा उन्होंने एक और किताब लिखी जिसका नाम था "महान कोश"। आज कान्ह सिंह नाभा को सिखों के सबसे प्रामाणिक इतिहासकार का दर्जा प्राप्त है। वर्तमान सिख धर्म पर कान्ह सिंह नाभा के लेखन का प्रभाव बहुत व्यापक है।

लेकिन आर्थर मैक्लिफ ने गुरु ग्रंथ का जो अंग्रेजी में अनुवाद किया उसमें सिखों को अलग धर्म के रूप में पहचान दिलाने के लिए चालाकी से बहुत महीन बदलाव कर दिया था। उसने गुरुग्रंथ में जहां जहां भी राम, कृष्ण, हरि, हर, गोविन्द, गोपाल इत्यादि नामों का उल्लेख आता है, वहां उसने गॉड कर दिया। कालांतर में यह चलन ही बन गया कि गुरुग्रंथ में जहां जहां राम या कृष्ण नाम का उल्लेख आता है उसे मूल गुरुमुखी में तो जस का तस रखा गया लेकिन दूसरी भाषाओं के अनुवाद में गॉड, परमेश्वर, परमात्मा आदि कर दिया गया।

आर्थर मैक्लिफ के बाद जो सिख लेखन हुआ उसने न सिर्फ गुरुग्रंथ के राम को गॉड से बदल दिया गया बल्कि एक ॐकार को भी अलग तरह से प्रस्तुत किया गया। सिख इतिहास लिखनेवाले लोगों ने इसे अकालपुरुख की संज्ञा दी और कहा कि ॐ में 'एक' और 'कार' लगाकर गुरु नानक ने इसकी रचना की।

आर्थर मैक्लिफ ने हिन्दुओं के स्वभाव को अजगर जैसा कहा था जो सब कुछ निगलकर अपने में समाहित कर लेता है। अंग्रेजों से प्रभावित सिखों द्वारा ये सारे प्रयास उस तथाकथित अजगर से बचने के लिए किये गये, ताकि सिखों को अलग धर्म के रूप में पहचान बन सके।

ऐसा करते समय सिखों के दसवें और आखिरी गुरु गोविन्द सिंह के इतिहास लेखन को भी मुख्यधारा से अलग कर दिया गया। गुरु गोविन्द सिंह द्वारा रचित विचित्र नाटक में मूल रूप से सिख गुरुओं का इतिहास संजोया गया है। इसमें गुरु गोविन्द सिंह गुरु नानक और स्वयं को राम का वंशज बताते हैं।

विचित्र नाटक के दूसरे, तीसरे और चौथे अध्याय में इस बात को वो विस्तृत रुप से बताते हैं कि वो सूर्यवंश से संबंध रखते हैं जिसमें राजा राम का जन्म हुआ। इन्हीं राजा राम के दो पुत्रों लव और कुश ने लाहौर और कसूर नामक शहर बसाया जो अब पाकिस्तान में है।

गुरु गोविन्द सिंह गुरु नानक देव को वेदी वंश का बताते हुए अपने आप को सोढी वंश का बताते हैं। विचित्र नाटक में गुरु गोविन्द सिंह कहते हैं कि "तिन बेदीयन के कुल बिखे प्रगटे नानक राइ। सभ सिक्खन को सुख दए जंह तंह भए सहाई।।5.4।।" अर्थात गुरु नानक का जन्म वेदी कुल में हुआ था।

वेदी कुल के बारे में विचित्र नाटक में गुरु गोविन्द सिंह यह भी लिखते हैं कि यह वेदी राम के पुत्र कुश के वंशज हैं। इसी तरह अपने सोढी वंश के बारे में वो लिखते हैं सोढी वंश राम के ज्येष्ठ पुत्र लव से संबंधित है।

इसका पूरा विवरण भी वो विचित्र नाटक में लिखते हैं कि कैसे लव के वंश से सोढी वंश और कुश के वंश से वेदी वंश का उदय हुआ। वो लिखते हैं कि लव के वंशज काल राय और कुश के वंशज कालकेतु के बीच एक बार भयंकर युद्ध हुआ था। कालराय बाद में सनौढ़ जाकर बस गए और वहां की राजकुमारी से विवाह किया, जिससे जो पुत्र हुआ उसका नाम सोढ़ीराय रखा गया। इन्हीं सोढ़ी राय से सोढ़ी वंश की उत्पत्ति मानी जाती है, जिस वंश में गुरु गोविंद सिंह का जन्म हुआ।

इसी तरह वेदी वंश के बारे में विचित्र नाटक में वो लिखते हैं कि युद्ध में हार के बाद कालकेतु के वंशज काशी चले गये और वहां वेदों का अध्ययन किया। इसी अध्ययन के कारण उन्हें वेदी नाम मिला। लौटकर जब वो मद्रदेश (पंजाब) आये तो उन्होंने सोढी वंश के लोगों को भी वेदों की शिक्षा दी।

गुरु गोविन्द सिंह भले ही अपनी और गुरु नानक देव की जड़ें सूर्यवंश में जाकर तलाशते हों लेकिन आज के सिख ऐतिहासिक तथ्यों के मामले में उनसे ज्यादा आर्थर मैक्लिफ और कान्ह सिंह नाभा की बातों पर विश्वास करते हैं। उसका कारण यह है कि उन्हें राम, कृष्ण, हरि, गोविन्द, गोपाल या विश्वंभर से अपनी पहचान नहीं करनी है।

गुरु गोविन्द सिंह भले ही गुरु नानक को वैदिक शास्त्रों के जानने वाले वंश का मानते हों, लेकिन वर्तमान सिख वेदों और उपनिषदों से अपने आप को नहीं जोड़ना चाहता। उसको एक ऐसी अलग पहचान चाहिए, जिसका वैदिक धर्म से दूर दूर का कोई नाता न हो ताकि अलग धर्म के रूप में अपने अस्तित्व को बता सके।

लेकिन इस अलगाव का दुष्परिणाम यह हुआ है अब सिख धर्म के अस्तित्व पर ही ग्रहण लगा रहा है। सिख धर्म को हिन्दू धर्म जैसा उदार पंथ बनाने की बजाय एक कट्टर अब्राहमिक पंथ जैसा बनाने का प्रयास उसके अपने लिए घातक साबित हो रहा है।

आर्थर मैक्लिफ सिखों को गुरु ग्रंथ के राम से दूर करके बाइबल के जिस गॉड तक ले गया था, आज वही गॉड सिखों के अस्तित्व के लिए चुनौती बन गया है। इसका सबसे बुरा नतीजा सिखों के धर्मांतरण के रूप में सामने आ रहा है। सिख धर्म में राम को हटाकर जिस गॉड को मैक्लिफ ने स्थापित किया था, सौ साल बाद वही गॉड सिखों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।

वैसे तो कहने के लिए सिख ये कहते हैं कि मैक्स आर्थर मैक्लिफ ने सिख धर्म स्वीकार कर लिया था और अपने नाम में सिंह भी लगा लिया था। लेकिन असल में उसने सिख धर्म स्वीकार नहीं किया था बल्कि सिखों के भविष्य में ईसाई होने का रास्ता बनाया था।

उसके बनाये रास्ते पर आज लाखों की संख्या में सिख चर्च के गॉड की शरण में चले गये हैं। इसका कोई सटीक अध्ययन तो नहीं है कि कितने सिख ईसाई हो चुके हैं लेकिन पंजाब में "कागज पर सिख और दिल से ईसाई" होने वाले लोगों की संख्या बढ रही है। इनकी संख्या पंजाब की कुल सिख जनसंख्या के 5 से 15 प्रतिशत के बीच कुछ भी हो सकती है। क्योंकि दिल से ईसाई होने वाले सिख कागज पर सिख बने हुए हैं, इसलिए इसका ठीक ठीक अनुमान लगाना मुश्किल है कि पंजाब में किस गति से सिख ईसाई बन रहे हैं।

पंजाब में कितने सिख ईसाई बन गये हैं, ये महत्वपूर्ण सवाल नहीं है। महत्वपूर्ण सवाल ये है कि अपनी मान्यताओं के प्रति कट्टर सिख ईसाई बन क्यों रहे हैं? ऊपरी तौर पर इसके चाहे जो कारण गिनाये जाएं, लेकिन बुनियादी कारण मैक्लिफ द्वारा गुरुग्रंथ का अंग्रेजी अनुवाद ही है जिसने राम को गॉड से रिप्लेस कर दिया था। जब पीढी दर पीढी सिखों को यही समझाया गया कि राम नहीं बल्कि गॉड हमारे हैं, तो फिर अगर वो उसी क्रिश्चियन गॉड के करीब जा रहे हैं तो गलत क्या कर रहे हैं?

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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