Inflation: घट रही मंहगाई, भारी नहीं पड़ेगा ईएमआई

अबकी मौद्रिक समीक्षा मीटिंग के बाद रिजर्व बैंक ने रेपो रेट नहीं बढ़ायी है जिससे लोन की किश्तें नहीं बढ़ी हैं। इसका कारण है महंगाई दर का 6 फीसदी से कम होना। RBI ने महंगाई अनुमान को 5.2 फीसदी से घटाकर 5.1 फीसदी कर दिया है।

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Inflation: अब तक जब भी रिजर्व बैंक द्वारा मौद्रिक समीक्षा की मीटिंग होती है जानकार आम आदमी टकटकी लगाए बैठा रहता है कि कहीं इसके बाद EMI ना बढ़ जाये। इस बार भी ऐसे ही कयास लगाए जा रहे थे। लेकिन रिजर्व बैंक ने रेपो रेट नहीं बढ़ायी है जिससे सब ने राहत की सांस ली है। बढ़ती महंगाई से चिंतित भारतीय रिजर्व बैंक ने अब तक रेपो रेट को 2.5 फीसदी की बढ़ोत्तरी कर 4 फीसदी से 6.5 फीसदी तक कर दिया है। इस बार रेपो रेट में बदलाव न होने से अब लोन भी महंगे नहीं होंगे और लोगों की किश्तें भी नहीं बढ़ेंगी।

दरअसल महंगाई से लड़ने के लिए रेपो रेट एक शक्तिशाली टूल है। जब भी महंगाई बढ़ती है RBI रेपो रेट बढ़ा देता है ताकि इकोनॉमी में मनी फ्लो कम हो, बैंकों को RBI से मिलने वाला कर्ज महंगा हो इससे इकोनॉमी में मनी फ्लो कम हो जाता है। मनी फ्लो कम होता है तो डिमांड में कमी आती है और महंगाई घट जाती है। और जब भी इकोनॉमी बुरे दौर में होती है तो मनी फ्लो बढ़ाने के लिए RBI रेपो रेट कम कर देता है, बैंकों को RBI से मिलने वाला कर्ज सस्ता हो जाता है और ग्राहकों को भी सस्ती दर पर लोन मिलने लगता है।

आंकड़ों की बात करें तो अप्रैल में खुदरा महंगाई दर घटकर 4.70 फीसदी हो गई है जबकि मार्च में यह 5.66 फीसदी थी। लगातार तीसरे महीने यह कम हुई है। खुदरा महंगाई का पिछले अक्टूबर 2021 से ये सबसे निचला स्तर भी है। थोक महंगाई दर अप्रैल में घटकर यह -0.92 फीसदी पर आ गई थी जबकि मार्च में यह 1.34 फीसदी और फरवरी में थोक महंगाई दर 3.85 फीसदी थी। ये लगातार 11वां महीना था जब यह कम हुई है । हालांकि RBI गवर्नर ने चेताया कि महंगाई पर नजर बनाए रखने की जरूरत है क्यूंकि यह अभी भी 4% के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है।

रिजर्व बैंक का मानना है कि महंगाई से लड़ने के लिए रेपो रेट नियंत्रण और वृद्धि जरुरी है। लेकिन महंगाई नियंत्रण के दौरान EMI बढ़ने से भी कई बार शहरी मध्यवर्ग बहुत परेशान हो जाता है कि वह महंगाई से लड़े या बढ़ती हुई EMI से। रिजर्व बैंक कहता है कि महंगाई कम करना बहुत जरुरी है इसलिए रेपो रेट बढ़ा रहे हैं, तो शहरी वर्ग कह रहा है कि किश्त बहुत बढ़ रही है, महंगाई से तो राहत मिल नहीं रही है। इस लुकाछिपी के खेल का दर्द शहरी वर्ग को ज्यादा है बनिस्पत ग्रामीण या कस्बाई क्षेत्र के। शहरी वर्ग लगभग सब कुछ बाहर से खरीद कर ही लाता है। वह खेती नहीं करता है या वह कस्बे में नहीं है कि डायरेक्ट किसान से कुछ खरीद ले। इसलिए जिस महंगाई को कम करने के लिए किश्त की मार बढ़ाई जाती है वह बूमरैंग कर उसी के पास आ जाती है।

अगर ऊपर बताई गई बातें और ब्याज दर बढ़ना एक समस्या बन रहा है तो यह सवाल आता है कि रिजर्व बैंक ऐसा क्यों कर रहा था ? दरअसल ब्याज दरें और मुद्रास्फीति एक ही दिशा में बढ़ते हैं। यदि मुद्रास्फीति बढ़ती है तो पीछे पीछे इससे मुकाबला करने के लिए ब्याजदर बढ़ती है। यदि मुद्रास्फीति घटती है तो ब्याज दर घटना शुरू कर देती है। यह एक चक्र है जो चलता रहता है। रेपो रेट का इस्तेमाल मुद्रास्फीति का प्रबंधन करने के लिए दुनिया भर के केंद्रीय बैंक प्राथमिक उपकरण के रूप में करते हैं।

सामान्य तौर पर, उच्च ब्याज दर बढ़ती मुद्रास्फीति के लिए एक नीतिगत प्रतिक्रिया होती है। इसके विपरीत, जब मुद्रास्फीति गिर रही होती है और आर्थिक विकास धीमा हो रहा होता है, तो केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए ब्याज दरों को कम कर देते हैं। इससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा का प्रवाह बढ़ जाता है, ऋण का ब्याज सस्ता हो जाता है और लोग ऋण लेना शुरू कर देते हैं। जमा पर ब्याज कम हो जाता है तो लोग बैंक में जमा करने की जगह अन्य जगह निवेश करने लगते हैं। इससे बाजार में मुद्रा की मात्रा और चलन बढ़ जाता है। इसी कारण जब मुद्रास्फीति बढ़ती है तो बाजार से मुद्रा को बाहर कर वापस बैंक में लाने के लिए केंद्रीय बैंक ब्याज दर बढ़ा देते हैं और यदि मुद्रास्फीति घटती है तो उसका पीछा करते हुए ब्याज दर घटा देते हैं।

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      ऋण की लागत में वृद्धि कर रिजर्व बैंक उपभोक्ता और व्यावसायिक खर्च को हतोत्साहित करता है। विशेष रूप से लोग आवास, गाड़ी और पूंजीगत उपकरण जैसी सामान्य वित्तपोषित बड़ी-टिकट वाली वस्तुओं को खरीदने से परहेज करने लगते हैं। बैंकों के जमा पर ब्याज बढ़ जाता है तो लोग जमा करने लगते हैं। कम लोन लेने और ज्यादा जमा करने से बाजार में मुद्रा की मात्रा घट जाती है जिससे मुद्रा स्फीति गिर जाती है और महंगाई कम होती है। यही कारण है कि रिजर्व बैंक व्यावहारिक फॉर्मूले की जगह इसी गणितीय फॉर्मूले से देश की महंगाई को नियंत्रित करता है, जिससे एक तरफ तो आंकड़ों में कुछ राहत की उम्मीद रहती है लेकिन शहरी मध्यवर्ग कई बार इससे परेशान हो जाता है।

      चूंकि इस बार महंगाई डाउन ट्रेंड में हैं इसलिए रेपो रेट बढ़ने की बात नहीं हुई है और EMI भी सस्ती हो गई है। जनता के हित में इस लुकाछिपी के खेल में यही बेहतर है कि महंगाई ना बढ़े। नहीं तो चित पट के खेल में चोट जनता को ही लगती है।

      (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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