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Youth Suicide: आत्महत्या को उद्यत क्यों हो रहे हैं नौजवान?

वर्षों के शोध के आधार पर मनोवैज्ञानिक यह मानते हैं कि आत्महत्या गहरे विषाद का नहीं बल्कि मानसिक दुर्बलता का परिणाम होती है। व्यक्ति भावनात्मक आवेग का संतुलन नहीं कर पाता है और आत्महत्या करने पर उतारू हो जाता है।

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Youth Suicide: टीवी अभिनेत्री तुनिषा शर्मा ने मृत्यु से कुछ देर पहले सोशल मीडिया पर हल्के-फुल्के पोस्ट और सकारात्मक दैनिक घटनाओं से संबंधित पोस्ट शेयर किया था। थोड़ी ही देर बाद शूटिंग सेट पर ही फंदे से लटकता उसका शव मिला। कोई यूं ही अचानक आत्महत्या कर सकता है, यह मानना सहज नहीं था इस कारण कुछ लोगों ने तुनिषा की आत्महत्या पर सवाल भी उठाए।

मात्र बीस वर्षीय लड़की, जो वर्तमान समय में भौतिक सफलता के उच्च स्तर पर कही जा सकती है, दिखने में ग्लैमरस लाइफ स्टाइल, अच्छा पैसा, शोहरत सब कुछ होने के बाद भी आखिर कोई अचानक ऐसे जीवन का अंत क्यों करना चाहेगा?

किन्तु यथार्थ में ऐसा नहीं होता है। इस प्रकार की यह कोई पहली या इकलौती दुःखद घटना नहीं है। आज के युवाओं में अचानक आए भावनात्मक उद्वेलन को संभालने की क्षमता की कमी देखी जा रही है। इसके पीछे कारण क्या हैं? क्या यह मानसिक स्वास्थ्य का विषय है?

भावनाएं सभी मनुष्यों में होती हैं। दुनिया में कोई भी सामान्य मनुष्य, भावनात्मक संवेगों के बिना नहीं होता। भावनात्मक ऊर्जा, दुनिया की सबसे सशक्त ऊर्जा है। भावनाओं के प्रवाह के कारण ही इंसान कितने दुष्कर कार्य करने के लिए प्रेरित होता है। वे सकारात्मक हों या नकारात्मक। इस सशक्त ऊर्जा प्रवाह को सन्तुलित रखता है हमारा 'इमोशनल इंटेलिजंस', जो किसी भी कठिन भावनात्मक दौर के प्रभाव को कम करने के लिए विवेकपूर्ण तर्क और युक्ति देता है। भावनात्मक बुद्धिमत्ता की कमी होने पर भावनाओं के संवेग आसानी से व्यक्ति के मन पर हावी हो जाएंगे, और व्यक्ति अविवेकपूर्ण व्यवहार कर आत्मघात भी कर सकता है।

आमतौर पर लोग इंटेलिजंस कोशंट यानी कि IQ के बारे में जानते हैं। पर इमोशनल कोशंट का इंसानों के जीवन में व्यावहारिक संतुलन बनाने के लिए अधिक महत्वपूर्ण होता है। जीवन में आईक्यू का महत्व यदि 20% है तो इमोशनल कोशंट यानी EQ का महत्व 80% तक होता है। इमोशनल कोशंट से तात्पर्य दूसरों की भावनाओं को समझना और महसूस करना होता है। हम में से अधिकांश लोग दिन में कई बार इसे अनुभव करते हैं। यह एक सहज प्रक्रिया है, किंतु इसका प्रभाव हर व्यक्ति पर अलग तरह से होता है। उसका कारण है उनका भावनात्मक बुद्धि का स्तर।

अब सवाल यह है कि यह इमोशनल इंटेलिजेंस (EQ) है क्या? हम सभी के जीवन में कई प्रकार के दौर आते हैं। विभिन्न अच्छी-बुरी खबर और घटनाक्रम सभी के हिस्से में आते हैं। हमारे मन - मस्तिष्क पर इनके बुरे प्रभाव को कम करने के लिए भावनात्मक बुद्धि महत्वपूर्ण होती है। इसे ही इमोशनल इंटेलिजेंस (EQ) कहा जाता है।

जहां IQ हमारे जानने समझने और जानकारी को सही जगह प्रयोग करने की एक समझ होती है, वहीं इमोशनल कोशंट (EQ) इंसान की खुद की और दूसरों की भावनाओ को समझने और मैनेज करने की एक कला है। जिनका EQ ज्यादा होता है वह लोग बदलते परिस्थिति, परिवेश के साथ आसानी से तालमेल बना पाते हैं।

भारतीय योग दर्शन में इसे और अधिक विस्तार से बताया गया है। समझने और महसूस करने के लिए, हमारे यहां मनुष्य के सभी पहलुओं को पांच कोष में बांटा गया है। योग दर्शन के अनुसार शरीर की ये पांच परतें हैं - अन्नमय कोष, मनोमय कोष, प्राणमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष।

पहले कोष को अन्नमय अर्थात भौतिक शरीर कहा जाता है तो दूसरी परत को मनोमय कोष या 'मानसिक शरीर' कहा जाता है। अब, आधुनिक पश्चिमी चिकित्सा विज्ञान भी कहता है कि हम मनोदेह (साइकोसोम) यानी मन और शरीर का एक मेल हैं। डॉक्टर भी बताते हैं - मनोदैहिक रोग जिसे साइकोसोमैटिक बीमारियां कहते हैं, उसमें मन की एक विशिष्ट स्थिति के कारण शरीर भी रोगी हो जाते हैं। जिस तरह हमारा भौतिक शरीर होता है, वैसा ही एक मानसिक शरीर भी होता है। शरीर की हर कोशिका की अपनी बुद्धिमत्ता होती है। मन के स्तर पर जो भी होता है, वह स्वाभाविक रूप से शरीर के स्तर पर भी होता है और जो भी शरीर के स्तर पर होता है, वह बदले में मन के स्तर पर होता है।

भावनात्मक विकास जन्म के साथ ही होने वाली क्रमिक घटना है, जिसमें कई चीज़ें सम्मिलित होती हैं। बच्चे का अपने माता पिता और परिवार के बीच लगाव और स्नेह संबंध इसका आधार बनता है। बच्चा अपने परिवेश में, माता-पिता और करीबियों से सुरक्षा, विश्वास, स्नेह, देखभाल और सुरक्षा को समझता है। यदि बचपन में, किशोरावस्था में इसकी कमी हो तो किसी भी भावनात्मक तनाव को झेलने में कठिनाई हो सकती है। अपरिपक्व नौजवान जो अवसाद के शिकार होते हैं, जिनमें इमोशनल इंटेलिजंस की कमी होती है, वे अक्सर भावनात्मक विकास के आधारिक कारकों से वंचित पाए जाते हैं।

बचपन और किशोरावस्था में उनमें भावनात्मक असुरक्षा की भावना होती है। शोध बताते हैं कि कई बार बच्चों के साथ अपराध करने वाले अधिकांश लोग वे ही होते हैं जिनका भावनात्मक विकास बाधित रहा है। ऐसे लोग दूसरों का ही नहीं अपना भी नुकसान करते हैं। भावनात्मक आवेग के चलते आत्मघाती कदम उठाने वाले, क्षणिक आवेश में आत्महत्या करने वाले लोग भी वे होते हैं जिनका इमोशनल इंटेलिजंस (EQ) का स्तर कम होता है।

हालांकि आत्महत्याओं की रोकथाम हो सके, इसके लिए देश - दुनिया में तमाम कार्य योजनाएं बनाई जाती हैं। विभिन्न हेल्पलाइन भी सहायता के लिए हैं। किंतु यह सबसे पहले परिवार की ज़िम्मेदारी है कि अपने घर के सदस्य के साथ भावनात्मक लगाव, विश्वास, स्नेह और सुरक्षा की भावना को विकसित करें। एक-दूसरे की भावना को समझना और उसका प्रबंधन करना सीखने के लिए परिवार और करीबी मित्रों के साथ से बेहतर कुछ नहीं हो सकता।

वर्षों के शोध के आधार पर मनोवैज्ञानिक यह मानते हैं कि आत्महत्या गहरे विषाद के कारण नहीं बल्कि मानसिक दुर्बलता का परिणाम होती है। इसके कारण व्यक्ति भावनात्मक आवेग को सहन नहीं कर पाता है और आत्महत्या करने पर उतारू हो जाता है। मस्तिष्क के प्रिफ्रंटल कॉर्टिक्स में भावनाओं का उद्गम होता है। यहीं पर सेरोटोनिन नामक न्यूरो ट्रांसमीटर भी होता है। जिसे एक तरह का हैप्पी हॉर्मोन भी कहा जा सकता है। सेरोटोनिन जितना कम होगा व्यक्ति की भावनात्मक असुरक्षा उतनी अधिक होगी और उसकी आत्महत्या के लिए प्रेरित होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।

हम जितना भी सामाजिक सरोकार रखते हैं, आत्म केंद्रित न होकर दूसरों के कल्याण के लिए सोचते और कार्य करते हैं, सेरोटोनिन उतना ही अधिक सक्रिय होता है। यही भावनात्मक दृढ़ता और आत्म संतुष्टि की भावना को बढ़ाता है।

आधुनिक युग की भोग लिप्सा प्रवृत्ति और भौतिक तरक्की की अन्धाधुन्ध दौड़ ने हमारे हैप्पी हॉर्मोन में बेतहाशा कमी की है। हमारी संस्कृति आत्म-संयम, उदारता वाली रही है। जीवन में आध्यात्मिक मूल्यों का ह्रास होने के कारण लोगों के लिए यह समझना कठिन हो रहा है कि जीवन कितना अमूल्य है।

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    जीवन में भावनात्मक आवेग आना कोई अनोखी बात नहीं है, कभी न कभी, किसी भी कारण से सभी के जीवन में ऐसा अनुभव होता है। किन्तु उस क्षणिक आवेग में बह जाना यह और जीवन समाप्त कर लेना दुर्भाग्यपूर्ण है।

    यह भी पढ़ें: Kota Coaching: कोचिंग फैक्ट्री में पिस रहे नौजवानों में आत्महत्या की प्रवृति क्यों?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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