Bihar Riots: दंगों को लेकर इतना बेपरवाह क्यों है बिहार?
सासाराम में 30 मार्च की देर शाम साम्प्रदायिक दंगा प्रारंभ हुआ। अब तक यह थमा नहीं है। बिहार के सासाराम और नालंदा से जो उपद्रव और हिंसा की खबरे आ रहीं है, उसका आज चौथा दिन है।

Bihar Riots: रामनवमी की यात्रा के बाद भड़की हिंसा की घटनाओं से बिहार का सासाराम और नालंदा ही नहीं, बल्कि पूरा बिहार डरा-सहमा हुआ है। सब तरफ डर है कि यह आग भड़क कर आस-पास के जिलों से होते हुए पूरे बिहार को अपनी जद में ना ले ले। जैसे 31 मार्च को मुजफ्फरपुर से खबर आई कि वहां दो सम्प्रदायों के बीच में हिंसा भड़क गई।
खबर मुजफ्फरपुर के सकरा थानान्तर्गत रामपुर बखरी से थी। कहासुनी से बात मारपीट तक आई और फिर एक पक्ष ने दूसरे पक्ष के मुर्गी फर्म में आग लगा दी। यदि पुलिस मुस्तैद नहीं हुई तो स्थिति भयावह हो सकती है। हालांकि बिहार पुलिस तीन दिनों से बार बार स्थिति नियंत्रण में होने का दावा कर रही है और लगातार गिरफ्तारी भी कर रही है। सासाराम और नालंदा से सौ से अधिक लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है।
कैसे भड़की दंगों की आग?
नालंदा के बिहार शरीफ में रामनवमी पूजा के बाद 31 मार्च को बजरंग दल द्वारा श्रीराम के नाम पर एक विशाल यात्रा का आयोजन किया गया था। इस यात्रा में हजारों की संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। यात्रा शांतिपूर्वक शहर के बीच से गुजर रही था। श्रीराम के नाम पर कुछ कालनेमियों को यह बात पसंद नहीं आई होगी। उन्होंने इस यात्रा पर पत्थरबाजी कर दी। इसी पत्थरबाजी के बाद हिंसा भड़क गयी। नालंदा के बिहार शरीफ में हिंसक झड़प की खबर सामने आई। जहां फायरिंग हुई, वहां एक व्यक्ति की मृत्यु की सूचना भी सामने आई। बिहार के डीजीपी आरएस भट्टी 02 अप्रैल को वहां पहुंचे। उन्होंने उपद्रवियों से भी पूछताछ की। भट्टी साहब की बिहार में चल रही उपद्रवियों की हरकतों पर नजर है लेकिन ये उपद्रवी नियंत्रण में नहीं आ रहे हैं।
सासाराम के हालात
बात सासाराम की करें तो वहां 30 मार्च देर शाम से प्रारंभ हुआ दंगा अब तक जारी है। उपद्रवी अलग अलग इलाकों में उत्पात मचा रहे हैं और पत्थर फेंक रहे हैं। शहर में हिंसक झड़प के बाद पुलिस की गश्ती बढ़ा दी गई है। सासाराम और आस पास के क्षेत्रों में पुलिस लगातार फ्लैग मार्च कर रही है। बमबाज और पत्थरबाजों पर इसका असर मालूम नहीं पड़ता। सासाराम नगर थाना क्षेत्र मोची टोला में सुबह-सुबह बम फेंक दिया गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 03 अप्रैल को सुबह 05 बजे बम फेंका गया। जानकारी सार्वजनिक होने के बाद मौके पर एसएसबी के जवान तैनात कर दिए गए हैं।
सासाराम में बड़ी संख्या में घर जला दिए गए। लोगों ने घर छोड़कर पलायन भी प्रारंभ कर दिया है। जब लोग घर से पलायन करते हैं तो इसका मतलब उनका स्थानीय कानून व्यवस्था से विश्वास उठ चुका होता है। वे मान चुके होते हैं कि प्रशासन अब उनकी सुरक्षा की जिम्मेवारी संभाल नहीं पाएगा। लोगों का पलायन प्रशासन की असफलता को ही दर्शाता है। एक बात और सामने आई है। बिहार पुलिस के अनुसार - सासाराम में जो बम ब्लास्ट हुआ था और उस बम ब्लास्ट में जो आदमी घायल हुआ था, वह पीड़ित नहीं था। वह खुद बम बना रहा था। बनाते-बनाते ही बम ब्लास्ट हो गया। उसका अभी पुलिस इलाज करा रही है। ठीक होते ही उसे गिरफ्तार करके पूछताछ करेगी।
गिरफ्तारी पर सवाल
नालंदा के बिहार शरीफ में कर्फ्यू है। सासाराम में 144 लागू है। रोहतास में सरकारी स्कूल और मदरसे 04 अप्रैल तक बंद रखने का आदेश है। यह सारे एहतियाती कदम दंगों को नियंत्रित करने के लिए उठाए जा रहे हैं। कुछ लोग बिहार पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी पर सवाल उठा रहे हैं। पहाड़पुरा नालंदा की महिलाएं मीडिया को बता रहीं हैं कि रात को एक बजे पुलिस आकर घर से पुरुष सदस्यों को लेकर चली गई। घर के दरवाजे को तोड़ा। खंती लेकर ग्रील काटने की कोशिश की। एक तरह से यहां हिन्दू परिवार साम्प्रदायिक दंगा और पुलिस उत्पीड़न दोनों का ही शिकार नजर आता है। शाम में सात बजे फायरिंग हुई। स्थानीय महिलाओं के अनुसार - उनका पूरा परिवार फायरिंग के बाद घर के अंदर दुबका हुआ था। रात को एक बजे आकर पुलिस घर से एक एक पुरुष को पूछताछ के नाम पर निकाल कर ले गई।
जवाब की तलाश में कुछ अनसुलझे प्रश्न
बिहार साम्प्रदायिक दंगों से जुड़े कई सवाल है जो बिहार के लोग पूछ रहे हैं। उसका जवाब बिहार की पुलिस और प्रशासन को देना चाहिए। पहला सवाल तो यही है कि जब पहले दिन दंगा पूरी तरह नियंत्रित कर लिए जाने की बात सामने आ गई थी, फिर उसके बाद दंगा कैसे हुआ? ऐसा दंगा जो थमने का नाम ही नहीं ले रहा। यह किसकी असफलता है?
बिहार में ये दंगे अचानक नहीं हुए हैं। बिहार को दंगों की राजधानी कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी।बिहार में 2017 में दंगों के सबसे अधिक 11,698 मामले दर्ज हुए थे। गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने 2018-20 के बीच देश भर में हुए साम्प्रदायिक दंगों का आंकड़ा जारी करते हुए बताया था कि सबसे अधिक साम्प्रदायिक दंगे बिहार में दर्ज किए गए।
तीन साल में बिहार में साम्प्रदायिक दंगों के 419 मामले दर्ज हैं, जिसमें 2777 लोगो को गिरफ्तार किया गया है। जिसमें 2316 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया है। 62 लोग दोषी करार दिए गए हैं। इन तीन सालों में पूरे देश में सांप्रदायिक दंगों से जुड़े 1807 मामले दर्ज हुए थे। जब दंगों और साम्प्रदायिक दंगों को लेकर बिहार का रिकॉर्ड इतना खराब है तो पूरे विषय की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए बिहार सरकार की तैयारी क्या थी?
सवाल यह भी है कि एनआइए ने बिहार जाकर पीएफआई के लोगों की लगातार गिरफ्तारियां की। यह गिरफ्तारी हाल फिलहाल तक जारी रही। बिहार में ही उनके इस षडयंत्र का खुलासा हुआ था कि वे प्रधानमंत्री की हत्या करना चाहते हैं। यह सारी जानकारी बिहार की सुरक्षा एजेन्सियों के पास भी है। ऐसे में बिहार का पूरा खुफिया तंत्र जानकारी के लिए केन्द्रीय एजेन्सियों पर इतना निर्भर क्यों है? जो उनके पास बिहार में होने वाली बड़ी से बड़ी दुर्घटना का कोई सुराग नहीं होता।
सवाल यह भी है कि फ्लैग मार्च के ठीक बाद फिर साम्प्रदायिक दंगों के होने का संकेत क्या है? दंगाइयों को इतना हौसला कहां से मिल रहा है? इतना सारा हथियार उन्हें कौन पहुंचा रहा है? या वे खुद कहां बना रहे हैं कि पुलिस को भी जानकारी नहीं मिल पा रही है।
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हिंसा की घटनाओं की जानकारी आने के बाद 02 अप्रैल को नीतीश कुमार ने बैठक की। उन्होंने मृतक के परिवार वालों को एक लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की, साथ ही दोषियों पर कार्रवाई का निर्देश दिया। नालंदा सासाराम हिंसा में पुलिस वाले भी घायल हुए हैं। उन्हें भी चोट आई है। घायल पुलिस वालों के लिए भी सरकार को सोचना चाहिए। बहरहाल, बिहार के अपराधियों में पुलिस का खौफ क्यों नहीं है? यह बड़ा सवाल है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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