Bihar Police: सिर्फ ऊंची आवाज सुनती है बिहार पुलिस
बिहार का पुलिस प्रशासन या तो ऊंचा सुनता है या फिर सुनता ही नहीं। अब इसकी शिकायत विपक्ष ही नहीं सत्ता पक्ष के ही विधायक विधानसभा में कर रहे हैं।

Bihar Police: "बिहार में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी हुई है। अपराधियों के अंदर पुलिस का खौफ नहीं है और आम आदमी की फरियाद थाने में पुलिस नहीं सुनती है। आम आदमी एफआईआर कराने के लिए जाए तो उसका केस थाने में दर्ज नहीं किया जाता। उन्हें अनावश्यक रूप में दौड़ाया जाता है। थाने को एफआईआर करने के लिए पैरवी चाहिए या फिर चढ़ावा।" यदि बिहार में विपक्ष की तरफ से यह सारी बातें कही गई होती तो इस खबर का अधिक महत्व नहीं होता। बिहार के सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल दलों ने ही बिहार में थाने की स्थिति को लेकर यह सवाल उठाया है।
राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के विधायकों ने 27 मार्च को विधानसभा में सवाल उठाया कि एफआईआर के लिए थानेदार आम नागरिकों को दौड़ाते हैं। महीनों बीत जाते हैं लेकिन उनकी एफआईआर दर्ज नहीं होती। एफआईआर के संबंध में विधानसभा में प्रश्न पूछने वाले सत्ता पक्ष के विधायक ऋषि कुमार (आरजेडी), अजय कुमार (सीपीआई (एम), भाई वीरेन्द्र (आरजेडी), विजय शंकर दुबे (कांग्रेस) और प्रहलाद यादव (आरजेडी) थे।
बिहार विधानसभा में मामला उठा, फिर हुआ टावर चोरी का एफआईआर
आरजेडी के विधायक ऋषि कुमार ने कहा कि पूरे बिहार की स्थिति यही है कि आपके साथ कुछ घटना घटती है तो आप एफआईआर के लिए थाने में दौड़ते रहिए। उन्होंने फिर अपने विधानसभा क्षेत्र का एक उदाहरण दिया कि औरंगाबाद जिले के दाउदनगर में एक मोबाइल कंपनी के टावर से सिस्टम और कई अन्य सामान को चोरों ने चुरा लिया था। एफआईआर दर्ज करने के लिए थानेदार कई दिनों तक टावर के मैनेजर को दौड़ाता रहा।
इस मामले में एफआईआर दर्ज करने के लिए राजद विधायक को थाने में फोन करना पड़ा। दिलचस्प यह है कि उसके बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं की गई। थानेदार ने मामला दर्ज करने की जगह टावर के मैनेजर को ही खरी-खोटी सुना दी। आखिर विधायक को यह पूरा मामला विधानसभा में उठाना पड़ा। तब जाकर 20 दिन बाद थाने में मामला दर्ज हुआ। हर आदमी की पहुंच ना विधायक तक है और ना हर मामला विधानसभा में उठाया जा सकता है। सवाल यह उठता है कि फिर 'सोशल जस्टिस' वाली इस सरकार में 'सोशल' क्या है और 'जस्टिस' किसके लिए है?
आठ महीने से एक एफआईआर पर गहन 'शोधपूर्ण जांच'
विधायक अजय कुमार ने कहा कि यह मामला पूरे बिहार का है। जब भी कोई एफआईआर कराने के लिए जाता है, वहां दस दिन, पन्द्रह दिन, बीस दिन तक एफआईआर नहीं होती। जब तक कोई पॉलिटिकल एप्रोच, कोई दबाव नहीं होता है। थाने में एफआईआर नहीं लिखी जाती है। जो पदाधिकारी लापरवाही कर रहे हैं, उनके ऊपर कार्रवाई होगी या नहीं? जो पदाधिकारी एफआईआर दर्ज करने में देर कर रहे हैं, आपका एक्ट, आपका मेनुअल बना हुआ है कि 24 घंटे मे आपको एफआईआर करके कोर्ट में भेजना है। जो थानेदार एफआईआर नहीं कर रहा है, क्या उसके ऊपर सरकार कार्रवाई करेगी या नहीं?
विधायक अजय कुमार विधानसभा में दिए अपने वक्तव्य में 24 घंटे की बात कर रहे हैं। वहीं एक अन्य मामले में पश्चिम चंपारण के गौनाहा थाना ने जान से मारने की धमकी से संबंधित शिकायत वीडियो फूटेज के साथ दिए जाने के आठ महीने के बाद नीतिन रवि को एक आरटीआई के जवाब में लिखकर दिया कि एफआईआर पर जांच चल रही है। जांच इस बात पर हो रही है कि आवेदन पर एफआईआर हो सकती है या नहीं।
जवाब की उम्मीद परंतु मिली नसीहत
अभी पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा बाकि है। एक तरफ सत्ता पक्ष के सभी विधायक गृहमंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव की तरफ जवाब की उम्मीद में टकटकी लगाकर देख रहे थे और दूसरी तरफ मंत्रीजी विधानसभा में जवाब की जगह विधायकों के लिए नसीहत लेकर आए थे। उन्होंने कहा कि पुलिस आपका एफआईआर दर्ज नहीं करती तो आप, डीएसपी, एसपी, डीएम और कोर्ट के पास जाकर अपनी शिकायत दर्ज क्यों नहीं करवाते?'
मंत्रीजी द्वारा दिए गए इस सुझाव को पढ़कर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार की सरकार आम आदमी के कानूनी अधिकारों को लेकर क्या सोच रखती है? यहां विधायक प्रहलाद यादव का सदन में दिया गया बयान पढ़ा जाना चाहिए। ''सदन में कहा जा रहा है कि कोर्ट चले जाइए। फिर सरकार ने जो थाना बनाया है। उसमें खर्चा होता है। स्टाफ रहता है। पदाधिकारी रहते हैं। जब कोर्ट ही जाने की बात होगी फिर थाना किसलिए है?''
जदयू के एक नेता ने, नाम ना छापने की शर्त पर कहा कि ''आप विधायक की बात कर रहे हैं। नीतीशजी का फोन अधिकारी नहीं उठाते हैं। नीतीशजी को दो-दो बार, तीन-तीन बार कहना पड़ता है। एक ही काम को करने के लिए। तो नीतीशजी क्या करें? सिस्टम ऐसे ही चलता है। उनके कहने के बाद कुछ काम होता है और कुछ नहीं भी होता है।''
राज्य का कोई नागरिक नहीं है सुरक्षित
पटना उच्च न्यायालय ने पिछले ही साल बिहार पुलिस पर तल्ख टिप्पणी की थी। उसके बावजूद काम काज पर कोई विशेष अंतर आया हो, ऐसा दिखता नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने राज्य के पुलिस स्टेशनों को कंप्यूटरीकृत किये जाने के मामले में दायर एक लोकहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की थी। न्यायालय ने कहा, पुलिस के अनुसंधान में पुलिस के गैर जिम्मेदाराना रवैये की वजह से अक्सर अपराधी सजा से बच जाते हैं। न्यायाधीश अश्विनी कुमार सिंह की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा था कि ऐसी स्थिति में राज्य का कोई नागरिक सुरक्षित नहीं है।
चूंकि बिहार का शासन-प्रशासन थोड़ा ऊंचा सुनता है। इसलिए न्यायालय द्वारा की गई ऐसी टिप्पणी भी कोई विशेष असर नहीं छोड़ पाती और बिहार में कोई मनीष कश्यप जोर-जोर से चिल्लाने लगता है। बिहार के बाहर बसे लोगों को लगता है कि यह लड़का क्या कर रहा है? लेकिन बिहार के लोग समझते हैं कि पब्लिक सोई हुई है। यह जगाने की कोशिश कर रहा है।
अनकहा समझौता
पिछले दिनों बिहार के नेता पप्पू यादव का एक साक्षात्कार बहुत वायरल हुआ। जिसमें वे कह रहे हैं कि उन्हें एक दरोगा ने कहा कि पांच करोड़ रुपया महीना कमाते हैं। अब सस्पेंड हो जाएंगे तो क्या हो जाएगा? इतना ब्याज आ जाएगा कि मत पूछिए। एक दूसरे दारोगा ने पप्पू यादव से कहा कि अगर हम चालीस लाख कमा लिए तो सस्पेंड होंगे और एक महीने बाद दो लाख रुपया देकर दूसरे थाना चले जाएंगे।
बिहार के कुछ समाचार पत्र भी शासन के साथ ताल में ताल मिलाकर चलने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। उनके पास अपराध से जुड़ी कोई खबर पहुंचती है तो पत्रकार एफआईआर की कॉपी मांगते हैं। पुलिस एफआईआर लिखती नहीं। बिना एफआईआर हुए खबर छपती नहीं। इस तरह एक अनकहा समझौता चल रहा है। वर्ना सत्ता पक्ष के विधायकों को यह सवाल विधानसभा में क्यों उठाना पड़ता? एफआईआर को लेकर थाने की लापरवाही से जुड़ी खबरें बिहार के किसी भी जिले में कम नहीं है लेकिन वह स्थानीय संस्करण में दिखाई नहीं देती है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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