Modi Speech: किस कालचक्र परिवर्तन की बात नरेंद्र मोदी ने कही है?
Modi Speech: सोमवार को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रधानमंत्री मोदी जब बोलने के लिए लोगों के सामने आये तो उन्होंने एक ऐसी बात कही जो रहस्यमय थी।
उन्होने कहा कि प्राण प्रतिष्ठा के लिए 11 दिन के अपने व्रत के दौरान रामेश्वरम भी गये थे। वहां समुद्र में स्नान करते समय उन्हें अनभूति हुई कि राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही कालचक्र बदल गया है। अब अगले हजार साल भारत के हैं।

यह एक ऐसा बयान है जिसका कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं हो सकता। नेता का दिमाग 5 साल के अनुसार चलता है। उसका समूचा चिंतन एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक सीमित रहता है। अब मोदी हजार साल तो पीएम रहनेवाले नहीं हैं। फिर यह बात भी अयोध्या के रामलला मंदिर से उन्होने क्यों बोली होगी?
मोदी ने जिस कालचक्र का उल्लेख किया है, वह सनातन धर्म की कालगणना का सिद्धांत है। इसके अनुसार समय सीधी रेखा में नहीं बल्कि गोलाकार या चक्राकार चलता है। सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग का समयचक्र पुन: पुन: आता जाता रहता है। यानी एक बार यह चतुर्युग पूरा हुआ तो पुन: सतयुग से कालचक्र की शुरुआत होती है। इस कालचक्र के अनुसार अभी हम वर्तमान के जिस कलियुग में हैं उसके 5125 वां वर्ष बीत रहा है। कलियुग के कुल 4 लाख 32 हजार वर्ष निर्धारित हैं जिसमें से अगर 5125 को घटा दें तो 4 लाख 26 हजार 875 वर्ष बचे हैं। फिर ये हजार साल की जो अनुभूति रामेश्वरम में मोदी को हुई उसका क्या रहस्य है?
भारत में आध्यात्मिक अनुभूतियां मात्र एक संकेत की तरह होती हैं। कोई भी साधक, सिद्ध, योगी, महात्मा अपनी तपस्या के दौरान जो अनुभूति प्राप्त करता है वह मात्र एक संकेत होता है। आध्यात्मिक जगत के ऐसे ही सिद्ध साधक इस बात का संकेत कर रहे हैं कि इस कलियुग में सतयुग के छोटे से हिस्से का प्रवेश हो रहा है। इसलिए प्राकृतिक शक्तियां भारत की धरती पर धर्म की स्थापना के लिए बहुत बड़े उलटफेर कर रही है। आधात्मिक जगत के लोग संकेत करते हैं कि 2014 में मोदी का प्रधानमंत्री बनना भी उसी प्राकृतिक परिवर्तन का एक हिस्सा था।
हालांकि प्राकृतिक परिवर्तन अचानक नहीं हुआ करते। वह एक निरंतरता में चलते रहते हैं। जैसे सतयुग कोई एक रात में नहीं बीत गया कि अगली सुबह त्रेता युग आ गया। प्रकृति नित्य है इसलिए वह परिवर्तन से मुक्त कभी होती ही नहीं है। इसकी निरंतरता कम से कम 2,000 साल पुरानी है। और पीछे जाएं तो पांच हजार साल पुरानी जब द्वापर युग का अंत हो रहा था और भारत ने महाभारत देखा था। महाभारत के साथ ही द्वापर युग का अंत और कलियुग का प्रवेश हो गया।
इस कलियुग में घटनाओं की एक निरंतरता है। भारतीय जीवन दर्शन के अनुसार कलियुग में तामसी या उग्र शक्तियां अधिक प्रभावी होती हैं और धर्म क्षीण हो जाता है। मानवता विभिन्न प्रकार के स्वार्थी और हिंसक समूहों द्वारा पीड़ित होती है और पूरी प्रकृति का ह्रास होता है। बीते कुछ दशकों से भारत में जिस आर्थिक व्यवस्था को विकास बताकर प्रचारित किया जा रहा है असल में भारतीय काल गणना के अनुसार यह मनुष्य का भौतिक विकास तो हो सकता है लेकिन उसकी चेतना का ह्रास हो रहा है। उसमें क्रोध और उग्रता बढ़ रही है। उसकी सहनशीलता नष्ट हो रही है और उसका समस्त चराचर जगत के प्रति जो संवेदनशील मानवीय दृष्टिकोण होना चाहिए उसका लोप हो रहा है। मनुष्य की तर्कबुद्धि का बहुत ज्यादा विकास हो रहा है जबकि उसकी भावनात्मक शक्ति खत्म हो रही है।
मनुष्य ही नहीं समस्त जीव चेतना के स्तर पर बुद्धि से नहीं बल्कि भावजगत पर ही जुड़े हुए हैं। जीव जगत में हम भले ही एक दूसरे की भाषा न समझते हों लेकिन प्रेम, दया, करुणा, ममता ये मनोभाव हर जीव समझता है। दुर्भाग्य से मनुष्य की तर्कबुद्धि के विकास ने इस भावजगत को ही सबसे अधिक चोटिल किया है। भारतीय कालगणना के अनुसार जिस सतयुग का सिद्धांत दिया गया है वह इसी भावजगत का प्रकटीकरण है जहां हर जीव एक दूसरे से प्रेम और करुणा के इसी धरातल पर जुड़ा हुआ है।
तो क्या माना जाए कि त्रेतायुग के राम जब अपने धाम में लौटे हैं तो वह जीवनदर्शन भी लौटेगा जिसमें आसुरी शक्तियां कमजोर पड़ेगी और मानवता जागृत होगी? मोदी को क्या अनुभूति हुई और वो उस अनुभूति को किस रूप में समझते हैं, यह तो वो ही जाने। लेकिन कलियुग में सतुयग का प्रवेश बिना त्रेता युग से गुजरे संभव नहीं है। इस अनुसार भारत की समकालीन परिस्थितियों को देखें तो राजनीति और समाज में सक्रिय आसुरी शक्तियां कमजोर पड़ती हुई तो दिखाई दे रही हैं। लेकिन अभी तक उन्होंने भी अपने हथियार नहीं रखे हैं इसलिए हर हार के बाद वो नयी जीत के लिए नयी रणनीति बनाने में जुट जाते हैं। अयोध्या में रामलला के मंदिर पर भारत से लेकर पाकिस्तान तक अगर आसुरी शक्तियां बेचैन हैं तो उनकी बेचैनी और पीड़ा अनायास नहीं है।
नारायण ने राम के रूप में अवतार क्यों लिया? क्योंकि उस समय आसुरी शक्तियां राक्षस के रूप में मानवीय चेतना को पीड़ित कर रही थीं। तो क्या ऋषि, मुनि उन राक्षसी शक्तियों को परेशान कर रहे थे जो वह उनका यज्ञ भंग करने पहुंच जाते थे? नहीं, वो ऐसा कुछ नहीं करते थे। लेकिन सात्विक शक्तियां जब भी प्रभावी होने लगती हैं तो आसुरी शक्तियों को अपने आप खतरा महसूस होने लगता है। भले ही सात्विक व्यक्ति अपने घर में चुपचाप शांति से रह रहा हो लेकिन आसुरी शक्तियों को यह शांति ही शोर से ज्यादा पीड़ित करती है। इसलिए वो उस शांति को नष्ट करने के लिए व्यग्र हो जाती हैं।
हम जिस समय में जी रहे हैं उसकी आसुरी शक्तियां न तो तलवार लेकर निकलती हैं और न ही वो त्रेता युग की तरह कहीं सूदूर बैठे हैं। वर्तमान समय की आसुरी शक्तियां भी विचार की लड़ाई लड़ रही हैं और हमारे आसपास ही हैं। उनके पास मायावी शक्तियां हैं और धनबल भी है। जैसे सात्विक मनुष्य सात्विकता के लिए उपाय करता है वैसे ही तामसी मनुष्य तामसिकता को बढाने के लिए प्रयास करता है। इसलिए उनकी ओर से भी लड़ाई को जारी रखने तथा अंतत: जीत लेने के प्रयास में कोई कमी नहीं दिख रही है।
लेकिन शास्त्र तो पहले ही घोषणा कर चुके हैं। यतोधर्म:स्ततो जय:। अर्थात जीत उसी की होगी जहां धर्म होगा। अगर मोदी का इस प्रकार के कालचक्र परिवर्तन की ओर है तो निश्चित ही इसका लोकमानस द्वारा स्वागत किया जाएगा। आखिरकार प्रकृति की दैवीय चेतना क्या है? वह भी लोकमानस की सामूहिक चेतना (कलेक्टिव कॉन्शियसनेस) ही है जो अतीत में अवतार पुरुष के रूप में सामने आती रही है। लेकिन कलियुग में किसी अवतार की संभावना नहीं है। कलियुग के कालचक्र परिवर्तन की लड़ाई सामूहिकता में ही लड़ी जाएगी जिसके संकेत बीते कुछ दशकों से दिखाई दे रहे हैं।
अच्छा संकेत यह भी है कि यह सामूहिक चेतना कमजोर होने की बजाय निरंतर प्रबल हो रही है जिससे उम्मीद करनी चाहिए कि अतीत के अतिक्रमण को भविष्य के प्रतिक्रमण से अवश्य समायोजित किया जाएगा। अयोध्या हो या कश्मीर, यह प्रतिक्रमण स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। संभव है इसी प्रतिक्रमण को मोदी ने कालचक्र परिवर्तन के रूप में अनुभव किया हो।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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