Rajasthan Politics: राजस्थान में ऊंट किस करवट बैठेगा?

अशोक गहलोत के मजबूत आधार को काटने के लिए भाजपा को फिर से जाट, राजपूत और गुर्जर के संयुक्त समीकरण वाली वसुंधरा राजे को ही आगे करना पड़ेगा।

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Rajasthan Politics: विधानसभा चुनावों से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी ने सीपी जोशी को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है| जाट जाति के सतीश पूनिया को हटा कर ब्राह्मण जाति के जोशी को अध्यक्ष बनाने से भाजपा को फायदा होगा या नुकसान यह कहना थोड़ा मुश्किल है। राजस्थान में 89 फीसदी आबादी हिंदू हैं, 9 फीसदी मुस्लिम और 2 फीसदी अन्य धर्मों के लोग हैं| हिन्दुओं में गैर जाट पिछड़ी जातियों की जनसंख्या लगभग 25 प्रतिशत, सभी अनुसूचित जातियों की कुल आबादी 17 फीसदी है, तो अनुसूचित जनजातियों की सम्मिलित आबादी 13 फीसदी है| जाटों की कुल आबादी 10 से 11 फीसदी, राजपूतों की आबादी 7 से 8 फीसदी, ब्राह्मण, मीणा और गुर्जर की आबादी लगभग 6-7 फीसदी है| वैश्य आबादी लगभग 4 प्रतिशत है। बाकी अन्य जातियां हैं।

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तो जनसंख्या के लिहाज से प्रदेश के नेता पद पर पहला हक गैर जाट पिछड़ी जातियों का बनता है। उनके बाद अनूसूचित जाति या जनजाति के नेता का बनता है। अब तक कांग्रेस और भाजपा दोनों ने जाटों को प्रदेश अध्यक्ष बनाया हुआ था, क्योंकि राजस्थान के जाट राजनीतिक तौर पर बहुत मुखर हैं| इसमें यह भी उल्लेखनीय है कि राजस्थान में तीसरी ताकत के रूप में उभर रही राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को जाटों की पार्टी ही माना जाता है, जिसके सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल एक मजबूत जाट नेता के रूप में उभर रहे हैं। इस प्रकार राजस्थान के तीनों बड़े दलों की कमान अब तक जाटों के कब्जे में थी।

भाजपा ने अब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जाट को हटा कर ब्राह्मण को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, तो उसका कारण जाट मतदाताओं का तीनों दलों में बिखराव है। इसके अलावा जाट मतदाता किसी पार्टी के पीछे नहीं रहते और अपने समाज के उम्मीदवार को ही वोट देते हैं, भले ही वह किसी भी पार्टी से हो या निर्दलीय हो। जाटों की तरह ब्राह्मण मतदाता भी भाजपा के उभार से पहले ज्यादातर कांग्रेस के साथ रहता आया है और अब भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति के कारण उसकी तरफ झुका है। उनके मुकाबले वैश्य और राजपूत मतदाता का रुझान भाजपा के साथ रहा है|

एक जमाना था, जब राजस्थान की राजनीति में ब्राह्मणों की तूती बोलती थी| राजस्थान की पहली विधानसभा में 60 ब्राह्मण जीत कर आए थे| वैसे उस जमाने में, जब बाकी जातियां राजनीतिक तौर पर जागरूक नहीं थीं, पूरे देश में ब्राह्मणों की तूती बोलती थी| कांग्रेस ने 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में 41 प्रतिशत टिकट ब्राह्मणों को दिए थे, जबकि ब्राह्मणों की आबादी 12 प्रतिशत थी| बाद में जैसे जैसे दूसरी जातियों में राजनीतिक चेतना आई, स्थिति बदलती चली गई|

फिलहाल राजस्थान विधानसभा के 200 के सदन में सिर्फ 17 ब्राह्मण विधायक हैं, जबकि जाट विधायक 31 है, और अक्सर हर विधानसभा में लगभग 30 जाट विधायक चुनकर आ रहे हैं| जो 200 विधायकों की संख्या का 15 प्रतिशत है। लेकिन इनमें ज्यादा संख्या कांग्रेस से चुने गए जाट विधायकों की ही रही है। राजस्थान में राजपूतों का राजनीतिक प्रभाव भी ज्यादा रहा है। उनकी आबादी 9 प्रतिशत है, लेकिन वे 50 से अधिक सीटों पर असर डालते हैं और 25-26 सीटों पर जीत कर आते हैं| पूर्वी राजस्थान में मीना और गुर्जर मतदाताओं की संख्या अधिक है| मीना 40 सीटों पर अच्छी संख्या में हैं, तो गुर्जर 30 सीटों पर| लेकिन इन सीटों के बाहर इनकी संख्या बहुत कम हैं।

जाट भले ही 30-32 जीत कर आते हैं, लेकिन वे भी 50 से अधिक विधानसभा सीटों पर असर डालते हैं| हालांकि उनका स्पष्ट रुझान अपनी जाति के जिताऊ उम्मीदवार के प्रति होता है, भले ही किसी भी पार्टी का हो। इसलिए राजस्थान में किसी भी दल को सत्ता में आने के लिए गैर जाट ओबीसी वोट को साधना बेहद जरूरी हो जाता है| 2003 और 2013 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने जाति कार्ड खेलते हुए कहा था कि वह जाटों की बहू हैं, राजपूतों की बेटी हैं और गुर्जरो की समधिन हैं| इन तीनों जातियों की राज्य की राजनीति की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका रहती है। हालांकि राजपूत और जाट परस्पर विरोधी माने जाते हैं, लेकिन वसुंधरा राजे के साथ यह समीकरण फिट बैठता है|

राजस्थान में हमेशा से जातिवाद रहा है, लेकिन सत्तर के दशक तक राजनीति में ब्राह्मण हावी रहे, उसके बाद जब अन्य जातियों में राजनीतिक चेतना आई, तब से ब्राह्मण हाशिए पर चले जाते रहे| इसके बाद एक जमाना वह भी रहा था जब किसी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष वोट बैंक को उतना प्रभावित नहीं करता था, तब कांग्रेस और भाजपा दोनों ब्राह्मण अध्यक्ष बना दिया करते थे| कांग्रेस में जयनारायण व्यास, गिरधारी लाल व्यास, गिरिजा व्यास, बीडी कल्ला और सीपी जोशी सहित कई प्रदेशाध्यक्ष रहे| भाजपा में भी उनसे पहले महेश चंद्र शर्मा, ललित किशोर चतुर्वेदी, भंवरलाल शर्मा, और अरुण चतुर्वेदी प्रदेश अध्यक्ष रहे|

हालांकि 1980 के बाद दोनों पार्टियों ने प्रदेश में ब्राह्मण अध्यक्ष बनाए, लेकिन सच यह है कि 1980 के बाद से राजस्थान की राजनीति में ब्राह्मणों का प्रभाव घटता चला गया| उनकी जगह पर ओबीसी, जाट, मीना, गुर्जर, एससी-एसटी प्रभावी होते चले गए| भैरोसिंह शेखावत अपने बूते कभी भाजपा को बहुमत नहीं दिला सके, जबकि राजपूत, जाट, गुर्जर के समीकरण वाली वसुंधरा राजे भाजपा को भारी बहुमत में ले आई| वहीं हिंदुत्व के मुद्दे पर मोदी को पिछले दोनों लोकसभा चुनावों में 25 की 25 सीटों पर जीत मिल गई।

इस बार चुनाव से पहले जातीय सम्मेलनों का शुरू होना बता रहा है कि चुनाव में जातीय राजनीति फिर से ज्यादा हावी रहेगी| पिछले दो सप्ताह पर नजर डालें तो जाट और ब्राह्मण समाज ने बड़ी सभाएं कर अपनी ताकत दिखाई है| 5 मार्च को जहां जयपुर में जाट महाकुंभ हुआ तो वहीं 19 मार्च को जयपुर में ही ब्राह्मण महापंचायत हुई| अब 2 अप्रैल को राजपूतों की बड़ी पंचायत भी जयपुर में होने जा रही है|

भाजपा क्योंकि केंद्र में सत्ता में है, तो उसके पास जातियों को साधने के ज्यादा संसाधन मौजूद हैं| उन संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए भाजपा ने अपनी तरफ से सबको सत्ता बांटने का काम किया है| केंद्र में एक राजपूत गजेंद्र सिंह शेखावत, एक एससी अर्जुन राम मेघवाल, एक जाट कैशाल चौधरी और एक यादव भूपेंद्र यादव को मंत्री बनाया हुआ है| वैसे भूपेंद्र यादव मूल रूप से हरियाणा के निवासी हैं। इसके अलावा उड़ीसा से राज्यसभा में गए राजस्थान के अश्विनी वैष्णव को ब्राह्मण मंत्री कह सकते हैं| लेकिन उनकी जाति राजस्थान में ओबीसी वर्ग में आती है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला वैश्य वर्ग से आते हैं| जबकि जाट के नाते जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति बनाया है।

भाजपा से संकेत यह भी आ रहे हैं कि अश्विनी वैष्णव को उड़ीसा से राज्यसभा में लाकर, फिर उन्हें रेल मंत्री बनाकर नरेंद्र मोदी उन्हें राजस्थान के भावी नेता के रूप में तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं| हाल ही में हुई राजस्थान की ब्राह्मण महापंचायत में रेलमंत्री अश्निनी वैष्णव भी पहुंचे हुए थे| आमतौर पर राजनीतिक रूप से ज्यादा सक्रिय नहीं रहने वाले अश्विनी वैष्णव इस पंचायत में नारे लगाते दिखे| उनका ये अवतार राजस्थान के सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया| उनका इस तरह पंचायत में पहुंचना कई तरह के सियासी संकेत देता है| हालांकि अश्विनी वैष्णव ओबीसी कार्ड भी चला रहे हैं। वैसे ओबीसी राजनीति के जमाने में देश के सबसे बड़ी ओबीसी आबादी वाले उत्तर प्रदेश में राजपूत मुख्यमंत्री है और सिर्फ 3 प्रतिशत ब्राह्मण आबादी वाले असम में ब्राह्मण मुख्यमंत्री है|

राजस्थान की बात कुछ और है, वहां चेहरा दिखा कर जातीय राजनीति को साधना बहुत जरूरी है| राजस्थान के जातीय समीकरणों की वास्तविकता को नजरअंदाज करके नरेंद्र मोदी राजस्थान में वसुंधरा राजे को मुख्य भूमिका से किनारे करने के कई प्रयास कर चुके हैं और अब तक विफल रहे हैं| शुरू में उन्होंने ओम प्रकाश माथुर का नाम भावी मुख्यमंत्री के रूप में चलवाया, फिर कुछ दिन गजेन्द्र शेखावत का नाम चलवाया, बीच बीच में ओम बिड़ला भी अपना नाम चलवाते रहे, लेकिन कुछ नहीं चला| अब अश्निनी वैष्णव ने अपना नाम चलवाया हुआ है| राजस्थान में मोदी के नाम और चेहरे पर चुनाव लड़ने की बातें भी चल रही हैं, लेकिन ये सारे प्रयास राजस्थान की जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं|

दूसरी तरफ कांग्रेस को देखें तो उसका जातीय समीकरण बहुत मजबूत है। पिछड़ी जाति के अशोक गहलोत मुख्यमंत्री हैं, तो जाट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष है, ब्राह्मण विधानसभा अध्यक्ष है, तो सचिन पायलट गुर्जर नेता हैं| इसके अलावा 9 प्रतिशत मुस्लिम और 17 प्रतिशत अनुसूचित जातियों के भी कांग्रेस के परम्परागत वोटर हैं। कुल मिलाकर यह लग रहा है कि गहलोत के मजबूत आधार को काटने के लिए मोदी को फिर से जाट, राजपूत और गुर्जर के संयुक्त समीकरण वाली वसुंधरा राजे को ही आगे करना पड़ेगा। ब्राह्मण प्रदेश अध्यक्ष वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा की जीत में सहायक सिद्ध हो सकता है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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