Rajasthan BJP President: गुटबाजी की कांव कांव, बीजेपी ने लगाया जोशी पर दांव

राजस्थान बीजेपी में पिछले तीन वर्षों से फैल रही गुटबाजी से परेशान केंद्रीय नेतृत्व ने विधानसभा चुनाव से सात महीने पूर्व सतीश पूनिया को हटाकर चितौड़गढ़ से सांसद सीपी जोशी को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है।

Rajasthan BJP President cp joshi bjp brahmin card before rajasthan elections

Rajasthan BJP President: सतीश पूनिया को हटाकर चित्तौड़गढ़ से सांसद सीपी जोशी को राजस्थान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनाकर केंद्रीय नेतृत्व ने कई मैसेज दिए हैं। सतीश पूनिया विधानसभा चुनावों तक अध्यक्ष बने रहना चाहते थे और इसके लिए पूरा जोर भी लगा रहे थे। लेकिन वे अपना पद बचाने में सफल नहीं रहे। केंद्रीय नेतृत्व ने राजस्थान बीजेपी में चल रही गुटबाजी को दूर करने का प्रयास तो किया ही है, साथ ही प्रदेश संगठन में अपेक्षाकृत नए एक नेता को अध्यक्ष बनाकर पुराने नेताओं को संकेत भी दिया है। राजस्थान को लेकर बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व की चिंता इस बात से समझी जा सकती है कि बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बनने की घोषणा के फौरन बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने नए अध्यक्ष जोशी को बुलाकर उनसे मुलाकात की है।

जब यह तय हो गया कि राजस्थान में अनावश्यक रूप से बढ़ रही गुटबाजी को समाप्त करने के लिए प्रदेश अध्यक्ष को बदला जा सकता है तो भाजपा आलाकमान ने किसी ब्राह्मण चेहरे की खोज शुरू की।

प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवाड़ी और प्रदेश महामंत्री भजनलाल शर्मा की दावेदारी की अनदेखी करके एक नए ब्राह्मण चेहरे को आगे बढ़ाकर केंद्र ने भविष्य के लिए युवा ब्राह्मण मतदाताओं को साधने का प्रयास भी किया है। सीपी जोशी को अपेक्षाकृत युवा होने और प्रदेश स्तर पर गुटबाजी से दूर होने के कारण जिम्मेदारी मिल गई। घनश्याम तिवाड़ी और भजनलाल शर्मा दोनों ही वसुंधरा राजे के विरोधी माने जाते हैं।

सूत्र बताते हैं कि पूनिया का तीन साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद भाजपा आलाकमान उन्हें एक साल का एक्सटेंशन देना चाहता था। लेकिन जब सतीश पूनिया का प्रदेश के अन्य नेताओं के साथ टकराव हद से ज्यादा बढ़ने लगा तो केंद्र ने उन्हें हटाने का निर्णय कर लिया। पद बचाने के लिए पूनिया ने अपनी जाति का कार्ड भी खेला और जाट समाज के सम्मेलनों में अपने समाज को लामबंद करने का प्रयास भी किया लेकिन उससे अन्य नेताओं में नाराजगी बढ़ने लगी।

प्रदेश अध्यक्ष पद के एक वरिष्ठ दावेदार गुलाबचंद कटारिया को पहले ही राज्यपाल बनाकर भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने असम भेज दिया था। उसके बाद जब नए अध्यक्ष की तलाश शुरू हुई तो अरुण चतुर्वेदी, भजनलाल शर्मा और सीपी जोशी के नाम चर्चा में थे। लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से नजदीकी होने का जोशी को लाभ मिला। इसके अलावा जोशी सहकारिता विभाग से जुड़ी संसदीय समिति में भी महत्वपूर्ण भूमिका में होने के कारण अमित शाह की नजर में भी थे।

वसुंधरा से टकराना पूनिया को भारी पड़ा

बीजेपी में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे प्रदेश स्तर पर सबसे बड़ी नेता के रूप में जानी जाती हैं। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष बनते ही पहली बार के विधायक सतीश पूनिया ने दो बार भारी बहुमत से मुख्यमंत्री रही वसुंधरा राजे को दरकिनार करके खुद को पार्टी के सर्वेसर्वा के रूप में प्रस्तुत करना प्रारंभ कर दिया। इससे वसुंधरा राजे के समर्थकों और पूनिया के बीच खींचतान बढ़ने लगी। सतीश पूनिया का अध्यक्ष पद का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी जब उनको प्रदेश अध्यक्ष पद पर कायम रखा गया तो यह तल्खी और ज्यादा बढ़ गईं।

उधर पूनिया ने प्रदेश के अन्य सभी नेताओं और केंद्र की सलाह छोड़कर खुद को ही भावी मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। उसके लिए वे बार बार जाट और किसान का बेटा होने की दुहाई भी देने लगे। लेकिन प्रदेश संगठन से उन्हें आवश्यक समर्थन नहीं मिल सका। होली से पूर्व वसुंधरा राजे के सालासर में हुए जन्मदिन कार्यक्रम को विफल करने के लिए पूनिया ने उसी दिन जयपुर में प्रदेश भाजपा का एक आंदोलन तय करवा दिया और सभी भाजपा नेताओं को उसमें भाग लेने के लिए पाबंद भी किया। उसके बाद भी अधिकांश भाजपा नेता, विधायक और सांसद वसुंधरा राजे के जन्मदिन समारोह में शामिल होने सालासर चले गए। इसको लेकर प्रदेश और केंद्र दोनों जगह पूनिया की बहुत किरकिरी हुई और भाजपा आलाकमान ने उनका विकल्प खोजना प्रारंभ कर दिया।

पूनिया की बढ़ती महत्वाकांक्षा और जातिवाद की राजनीति के कारण प्रदेश के अन्य नेताओं के साथ साथ कार्यकर्ताओं में भी लगातार नेगेटिव मैसेज जा रहा था। इससे पार्टी में नीचे तक गुटबाजी पनप रही थी। केंद्रीय नेतृत्व ने इसके खतरे को भांपकर पूनिया को हटाने में ही संगठन का फायदा समझा। कुछ दिनों की रस्साकसी के बाद आखिर नए अध्यक्ष के तौर पर सीपी जोशी का नाम घोषित कर दिया गया।

किरोड़ी-पूनिया में भी दिखी थीं दूरियां

वसुंधरा राजे से टकराव के साथ ही सतीश पूनिया ने राज्यसभा सांसद डॉ. किरोड़ीलाल मीणा को भी दरकिनार करने की कोशिश शुरू कर दी थीं। राजस्थान में प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक के मामले में आंदोलन कर रहे डॉ. किरोड़ी लाल ने पूनिया पर सहयोग नहीं करने का आरोप लगाकर पार्टी में खलबली मचा दी थी। हालांकि जब इस मुद्दे पर जनता में आक्रोश बढ़ता दिखा तो पूनिया ने एक बार किरोड़ीलाल मीणा के धरने पर जाकर प्रदेश संगठन की भागीदारी दिखाने की कोशिश की थी। इसके साथ ही वीरांगनाओं के रिश्तेदारों को नौकरी देने को लेकर भी किरोड़ीलाल ने आंदोलन किया था, लेकिन बीजेपी इसमें भी देरी से शामिल हुई।

हालात इस कदर बिगड़े कि मीणा समर्थकों ने बीजेपी ऑफिस के बाहर सतीश पूनिया हाय हाय के नारे तक लगा दिए थे। दूसरी तरफ पूनिया का कहना था कि किरोड़ीलाल पार्टी की ओर से घोषित कार्यक्रमों के बजाय अपने स्तर पर आंदोलन शुरू करते रहे हैं। दोनों ही नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व से एक दूसरे की शिकायत भी की थी।

सोशल इंजीनियरिंग में फिट बैठ गया ब्राह्मण अध्यक्ष

बीजेपी का राजस्थान में चुनाव को देखते हुए सोशल इंजीनियरिंग पर भी फोकस है। राजस्थान से भाजपा के लोकसभा में 25 और राज्यसभा में 3 सांसद है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में राजस्थान की भागीदारी की बात करें तो चार मंत्री हैं। इनमें तीन लोकसभा सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत, अर्जुनराम मेघवाल और कैलाश चौधरी और एक राज्यसभा सांसद भूपेंद्र यादव केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हैं। गजेंद्र सिंह शेखावत राजपूत जाति से आते हैं, जबकि अन्य एक मंत्री जाट, एक यादव और एक अनुसूचित जाति से हैं। लोकसभा अध्यक्ष के पद पर कोटा से सांसद ओम बिड़ला हैं, जो वैश्य वर्ग से आते हैं। इसके अलावा उपराष्ट्रपति के पद पर राजस्थान के ही जगदीप धनखड़ हैं, जो जाट समुदाय से हैं।

बीजेपी के केंद्रीय मंत्रिमंडल और राष्ट्रीय संगठन में राजस्थान से कोई भी ब्राह्मण नेता प्रमुख भूमिका में नहीं होने के कारण सीपी जोशी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर बीजेपी ने प्रदेश में ब्राह्मणों को साधने की कोशिश की है। राजस्थान में ब्राह्मणों को बड़ा वोट बैंक माना जाता है। हाल ही में जयपुर में हुई ब्राह्मण महापंचायत में भी समाज को राजनीतिक रूप से कम आंके जाने की बात उठी थी। वैसे राजस्थान में ब्राह्मण मतदाता कांग्रेस और भाजपा के बीच बंटे हुए हैं। कांग्रेस नेता और विधानसभा अध्यक्ष डॉ सीपी जोशी और गहलोत सरकार में वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री बुलाकीदास कल्ला ब्राह्मणों के बड़े नेता माने जाते हैं। इनके अलावा कई दशकों तक कांग्रेस विधायक रहे भंवरलाल शर्मा भी प्रदेश के ब्राह्मणों के नेता के रूप में प्रसिद्ध थे।

पहले कांग्रेस से जुड़े रहे हैं भाजपा के नए अध्यक्ष

छात्र राजनीति में कांग्रेस के संगठन एनएसयूआई के नेता रहे सी पी जोशी अब भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बन चुके हैं। उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1994 में एनएसयूआई से चित्तौड़गढ़ कॉलेज छात्रसंघ में उपाध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने से हुई थी। अगले ही साल 1995 में वे एनएसयूआई से चित्तौड़गढ़ कॉलेज छात्र संघ के अध्यक्ष बने।

बाद में वे भाजपा के नजदीक आ गए और वर्ष 2000 से लेकर 2005 तक वे जिला परिषद सदस्य रहे। 2005 से 2010 तक चित्तौड़गढ़ की भदेसर पंचायत समिति के उप प्रधान रहे। वे चित्तौड़गढ़ बीजेपी के जिलाध्यक्ष भी रह चुके हैं। सितंबर 2014 से 2017 तक प्रदेश युवा मोर्चा के अध्यक्ष रहे। अभी पूनिया की टीम में वे प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर काम कर रहे थे।

सी पी जोशी चित्तौड़गढ़ से लगातार दूसरी बार सांसद हैं। पहली बार उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की गिरिजा व्यास को हराया था। दूसरी बार 2019 में सी पी जोशी ने कांग्रेस के गोपाल सिंह शेखावत को हराया। पिछले चुनाव में सीपी जोशी राजस्थान में भीलवाड़ा सांसद सुभाष बहेड़िया के बाद सबसे ज्यादा वोटों से जीत का रिकॉर्ड बनाने वाले सांसद रहे। उन्होंने 5,76,247 वोटों से जीत हासिल की।

अब वसुंधरा के रुख पर रहेगी नजर

बीजेपी के सीनियर नेताओं का कहना है कि पूनिया द्वारा वसुंधरा राजे को दरकिनार करने के प्रयासों के कारण वह प्रदेश इकाई के कार्यक्रमों से दूरी बनाकर चल रही थीं। चूंकि अब पूनिया को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है, ऐसे में बीजेपी में वसुंधरा के अगले रुख को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। आने वाले दिनों में यह संभव है कि राजे पार्टी की रणनीति और चुनावी तैयारियों में प्रमुख भूमिका में दिखाई दें। लेकिन, वसुंधरा राजे इतने भर से संतुष्ट होने वालो में से नहीं हैं। उनका लक्ष्य तीसरी बार मुख्यमंत्री बनना है और उनके साथ विधायकों और संगठन का भी एक बड़ा तबका पूरी तरह एकजुट है।

ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि सीपी जोशी के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद वसुंधरा राजे क्या रुख अपनाती हैं। उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या जोशी प्रदेश में फैली गुटबाजी को समाप्त करके संगठन को एकजुट कर पाएंगे और भाजपा को सत्ता में ला पाएंगे। अशोक गहलोत की मजबूत चुनौती के सामने जोशी की राह आसान नहीं है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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