Rajasthan Elections: ओबीसी जिधर जाएगा, वही सरकार बनायेगा
राजस्थान में कांग्रेस, बीजेपी और सभी पार्टियों का सारा दारोमदार अब सीधे ओबीसी वोटरों पर है। बीजेपी की कोशिश है कि ओबीसी वोटर उसके साथ जुड़ा रहे, तो विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव में भी उसे सीधा लाभ होगा इसीलिए राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस भी मोदी और बीजेपी दोनों की काट में ओबीसी को अपने साथ जोड़े रखने पर पूरा फोकस किए हुए हैं।
कांग्रेस में अशोक गहलोत और सचिन पायलट सबसे बड़े ओबीसी चेहरे हैं, तो क्षेत्रिय दल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दल के हनुमान बेनीवाल भी अपने ओबीसी होने को ही फोकस कर रहे हैं।

राजस्थान की आबादी में ओबीसी मतदाता सर्वाधिक लगभग 48 फीसदी होने और 200 विधानसभा सीटों में से सीधे सीधे 150 सीटों पर निर्णायक होने के बावजूद ओबीसी को सामान्य वर्ग में ही गिना जाता हैं, क्योंकि विधानसभा सीटों में आरक्षण केवल अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए ही हैं। राजस्थान में एससी 18 फीसदी और एसटी 14 फीसदी हैं, जबकि ओबीसी सबसे ज्यादा 48 फीसदी हैं। ओबीसी वर्ग में तीन सबसे बड़ी जातियां जाट, गुर्जर व माली-सैनी ओबीसी के ताकतवर समुदाय गिने जाते हैं। ओबीसी में जाटों की हिस्सेदारी लगभग 10 फीसदी है, गुर्जर 7.5 फीसदी और माली-सैनी 6.5 फीसदी के आसपास हैं। हालांकि, राजस्थान में जाटों और दलितों की दोस्ती का बीजेपी पर असर क्या होगा, इसकी तस्वीर फिलहाल साफ नहीं है, मगर कांग्रेस को सीधा नुकसान और बीजेपी को लाभ जरूर होगा, यह दिख रहा है।
जाट, गुर्जर व माली-सैनी, ये तीनों जातियां ताकतवर होने व सबसे ज्यादा होने के बावजूद सन 2018 के विधानसभा चुनाव में 200 सीटों में से 38 सीटों पर जाट विधायक जीते, गुर्जर 8 और माली-सैनी केवल 2 ही विधायक जीते। माली-सैनी विधायक सबसे कम होने का सबसे बड़ा कारण है कि इस समाज ने अपनी ताकत की राजनीतिक एकजुटता कभी नहीं दिखाई और ज्यादातर लोग भले ही वोट बीजेपी को भी देते रहे, मगर समाज ने अपनी सारी ताकत तीन बार मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत में निहित मान ली है, क्योंकि वे ही माली-सैनी के सबसे बड़े नेता भी हैं।
जाटों में कई नेता हैं, लेकिन जाट राजघराने धौलपुर रिसायत की पूर्व महारानी होने के कारण वसुंधरा राजे जाटों की भी सबसे बड़ी नेता हैं और इन दिनों राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) जैसे क्षेत्रिय दल के मुखिया के रूप में जाट नेता हनुमान बेनीवाल भी सुर्खियां बटोर रहे हैं, तो गुर्जरों में सचिन पायलट कद्दावर नेता गिने जाते हैं। जाट समुदाय के लोग राजस्थान में कम से कम 65 विधानसभा सीटों पर हार जीत को प्रभावित करते हैं, इसी कारण दोनों पार्टियों में कुल मिलाकर लगभग 20 फीसदी विधायक पदों पर जाट जीतते हैं।
राजस्थान विधानसभा की कुल 200 सीट में से 33 सीटें अनुसूचित जाति और 25 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। बाकी बची 142 सीटें सामान्य वर्ग के लिए है, जिसके लिए बहुत गहराई से अध्ययन करने के बाद ही आरएलपी के मुखिया हनुमान बेनीवाल ने 10 फीसदी जाटों और 18 फीसदी एससी को मिलाकर दलित - जाट मतदाता का गठबंधन बनाया है। इसका अगर सही और सीधा असर रहा, तो माना जा रहा है कि यह आने वाले विधानसभा के चुनावी समीकरण बदलने में जबरदस्त सफल रहेगा। बेनीवाल ने आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के मुखिया चंद्रशेखर आजाद से भी राजस्थान में हाथ मिलाया है।
बीजेपी जान रही थी कि इस गठबंधन के कारण ओबीसी को साधने का उसका निशाना चूक सकता है, इसी वजह से बीजेपी हनुमान बेनीवाल का निशाना असफल बनाने की कोशिश में बेहद सधे हुए कदमों से अपनी चाल चल रही है। बीजेपी ने अपने कद्दावर जाट नेताओं के सामने आरएलपी - दलित गठबंधन के कमजोर उम्मीदवार देने के मामले में बेनीवाल को मना लिया है, ऐसा साफ लग रहा है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब राजस्थान आए थे, तो उन्होंने ओबीसी वर्ग को बीजेपी द्वारा दिए गए फायदों को गिनाते हुए कहा कि उनकी पार्टी सभी वर्गों का विशेष ध्यान रखती है, खासतौर पर वंचित वर्ग का। मोदी जब यह कह रहे थे, तो उनके दिमाग में स्पष्ट तौर पर यही था कि राजस्थान में ओबीसी से बड़ा वंचित वर्ग और कोई नहीं है।
साफ दिख रहा है कि राजस्थान विधानसभा चुनाव में बीजेपी ओबीसी के सबसे बड़े वर्ग जाटों को साथ रखे रहने की पूरी कोशिश में है, तो गुर्जर वोट भी बड़े पैमाने पर बीजेपी के साथ तेजी से जुड़ रहा है, जो कि पिछली बार नहीं था। इसका सीधा फायदा बीजेपी की सीटों में इजाफा करेगा। राजस्थान में बीजेपी जान रही है कि ओबीसी वर्ग के वोटरों का सबसे बड़ा हिस्सा उसी के पास है। अशोक गहलोत ओबीसी वर्ग से होने और लगातार 5 साल तक मुख्यमंत्री रहने के बावजूद ओबीसी को कांग्रेस के साथ जोड़ने में कोई खास सफल नहीं रहे हैं।
राजनीति के जानकार मानते हैं कि अशोक गहलोत को इस बार के मुख्यमंत्री काल में फ्री हैंड तो मिला, मगर कांग्रेस के अंदरूनी राजनीतिक हालातों और सचिन पायलट द्वारा हर कुछ माह में कुर्सी हड़पने की कोशिशों के कारण वे पूरे पांच साल अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने में ही लगे रहे। इसके कारण वे ओबीसी को अपने साथ नहीं जोड़ सके। गहलोत जाति से सैनी (माली) हैं मगर उनकी अपनी ही जाति के वोट उनके विधानसभा क्षेत्र सरदारपुरा (जोधपुर) को छोड़कर लगभग 70 फीसदी से ज्यादा पूरे राजस्थान में बीजेपी को मिलते हैं।
राजस्थान में कांग्रेस के दूसरे सबसे बड़े नेता सचिन पायलट भी गुर्जर होने के कारण होने को तो ओबीसी ही हैं, मगर वे गुर्जर या ओबीसी नेता के रूप में स्वयं को स्थापित करने से बचते रहे। अपने समुदाय में उनका जबरदस्त प्रभाव है। गुर्जर बीजेपी का परंपरागत वोटर रहा है, लेकिन 2018 के चुनाव में पायलट के मुख्यमंत्री बनने की आस में गुर्जर मतदाता कांग्रेस के साथ खड़ा हो गया था। पायलट के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता के करीब तो पहुंची, मगर बहुमत 200 में से 100 सीटों पर ही होने की वजह से सरकार के कभी भी गिरने की संभावना में गहलोत ही सबसे सही नेता होने के कारण कांग्रेस ने पायलट को किनारे कर दिया और गहलोत मुख्यमंत्री बन गए, तो गुर्जर भी कांग्रेस से बिदक गया। इस चुनाव में पाय़लट शांत शांत से हैं और गुर्जर कांग्रेस को मजा चखाने की फिराक में फिर से बीजेपी की तरफ शिफ्ट कर रहा है।
इसलिए राजस्थान में इतना कहा जा सकता है कि ओबीसी कांग्रेस से अधिक बीजेपी की ओर झुका हुआ दिखाई दे रहा है और यही उसके लिए उम्मीद की किरण भी है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो उसके पास भी राजस्थान में ओबीसी समुदाय से आनेवाला अशोक गहलोत जैसा कद्दावर नेता है। बाकी चुनाव परिणाम बतायेगा कि ओबीसी को कौन पसंद आया। जो पसंद आयेगा, राजस्थान में वही सरकार बनायेगा।












Click it and Unblock the Notifications