Rajasthan Election: राजस्थान में मोदी की प्रतिष्ठा दांव पर

Rajasthan Election: नरेंद्र मोदी सरकार के नौ साल पूरे होने पर भाजपा ने एक महीने के महाजनसंपर्क अभियान के श्रीगणेश का जो प्रस्ताव मोदी को भेजा था उसमें मोदी की रैली हैदराबाद में आयोजित करने का प्रस्ताव था। मोदी ने इसे बदलकर राजस्थान के अजमेर में रखने को कहा। इसके पीछे मोदी का संदेश साफ था कि राजस्थान विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रचार का नेतृत्व वह खुद करेंगे और अशोक गहलोत से सीधे दो दो हाथ करेंगे।

पिछले आठ महीने में जिस तरह से उन्होंने पांच रैलियां राजस्थान में की है वैसे ही अपनी सरकार के नौ साल पूरे होने के उपलक्ष में छठी रैली अजमेर में करके राजस्थान की चुनावी कमान अपने हाथ में ले ली। 31 मई को अजमेर में रैली कर मोदी ने बता दिया कि 2023 के अंत में होने वाले 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए सेमीफाइनल जैसे हैं, जिन्हें मोदी किसी भी स्थिति में हारना नहीं चाहते हैं। राजस्थान में जीत मोदी की 2024 में वापसी में महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है, वहीं राजस्थान में भाजपा की विफलता मोदी के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।

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प्रधानमंत्री मोदी के राजस्थान दौरे की शुरुआत 30 सितंबर 2022 को हुई थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिरोही जिले के आबू रोड में सभा को संबोधित करने का कार्यक्रम बनाया था। हालांकि अपेक्षा से बहुत कम लोग जुटने के कारण मोदी रात दस बजे के बाद ही सभास्थल पहुंचे और वहां उपस्थित लोगों से लाउडस्पीकर उपयोग की समय सीमा समाप्त हो जाने के कारण भाषण नहीं दे पाने के लिए माफी मांग ली। इस सभा से उन्होंने दक्षिणी राजस्थान के सिरोही, जालोर और पाली सहित आसपास के जिलों की 26 सीटों को साधने का प्रयास किया था। दक्षिण राजस्थान का यह इलाका भाजपा के लिए मजबूत माना जाता है। यहां की 26 में से पिछली बार भाजपा ने 19 सीटों पर जीत दर्ज की थी।

दूसरी बार पीएम मोदी ने एक नवंबर 2022 को बांसवाड़ा के मानगढ़ धाम में सभा कर आसपास की 19 सीटों को साधा था। तीसरी बार प्रधानमंत्री मोदी ने 8 जनवरी 2023 को भीलवाड़ा में गुर्जर समाज के आराध्य देव देवनारायण भगवान की जयंती समारोह में शामिल होकर भीलवाड़ा के आसींद में सभा की थी। यहां से उन्होंने गुर्जर समाज को भाजपा का साथ देने का संदेश दिया था।

चौथी बार 12 फरवरी, 2023 को मोदी दौसा जिले में दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस वे के उद्घाटन के मौके पर आए। यहां मोदी ने पूर्वी राजस्थान के आठ जिलों दौसा, करौली, भरतपुर, टोंक, जयपुर, अलवर, सवाई माधोपुर, धौलपुर की 58 विधानसभा सीटों को साधने के लिए गुर्जर-मीणा बहुल दौसा में सभा की थी। पांचवी बार 10 मई, 2023 को पीएम मोदी ने नाथद्वारा और आबूरोड में बड़ी सभाओं को संबोधित किया था। छठी बार 31 मई, 2023 को मोदी ने अजमेर में रैली की थी। अजमेर रैली से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने पुष्कर के ब्रह्मा मंदिर में दर्शन भी किया था। यहां से मोदी ने पूरे राजस्थान में भाजपा के मूल एजेंडे हिंदुत्व का संदेश देने की कोशिश की थी।

आठ महीने में मोदी के राजस्थान दौरों का आकलन किया जाए तो वे लगभग 100 विधानसभा सीटों को कवर कर चुके हैं। मोदी का अब तक का राजस्थान दौरा जाति-समाजों को साधने के मकसद से ही हुआ है। उनका फोकस आदिवासी, ओबीसी, गुर्जर-मीणा और एससी समुदाय रहा है। कर्नाटक चुनाव में भाजपा की शर्मनाक हार के बाद प्रधानमंत्री मोदी राजस्थान में हर हाल में सरकार बनाने की रणनीति बनाने में जुटे हैं।

भाजपा संगठन राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मोदी की सभाएं राजस्थान के हर जिले में करवाने पर विचार कर रहा है। संभवत: भाजपा देश में ऐसा पहली बार प्रयोग करने जा रही है जब किसी चुनावी राज्य के हर जिले में प्रधानमंत्री सभा करेंगे। हालांकि गुटबाजी में फंसी प्रदेश भाजपा मोदी की अब तक की 6 रैलियों में अपेक्षा अनुरूप भीड़ जुटाने में बार बार विफल रही है। इसलिए राजस्थान को लेकर भाजपा की रणनीति साफ है कि राजस्थान के चुनाव में मोदी ही भाजपा का चेहरा होंगे। बाकी गुटों में बंटे नेता मोहरे तो हो सकते हैं मुख्य चेहरा नहीं। भाजपा का आकलन है कि अगर पीएम मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ा जाता है तो प्रदेश के नेताओं में चल रही गुटबाजी का असर चुनावों पर नहीं पड़ेगा और सभी गुट एकजुट होकर चुनाव लडेंगे।

प्रधानमंत्री मोदी की नजर राजस्थान विधानसभा चुनाव के कुछ माह बाद होने वाले लोकसभा चुनावों पर भी है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में बीजेपी एवं सहयोगी दल ने राजस्थान की 25 में से 25 लोकसभा सीटें जीती थी। मोदी राजस्थान विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने के साथ साथ उसके तुरंत बाद होने वाले 2024 लोकसभा चुनाव में भी सभी सीटें लगातार तीसरी बार जीतना चाहते हैं।

दरअसल, राजस्थान को लेकर प्रधानमंत्री मोदी इतने गंभीर क्यों है, इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में राजस्थान के 33 जिलों में से 7 जिलों में भाजपा का खाता भी नहीं खुला था। वैसे वसुंधरा राजे के नेतृत्व में ही लड़े गए 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 200 में से 163 सीटें जीतकर रिकॉर्ड कायम किया था। लेकिन 2018 में मोदी और वसुंधरा के बीच बढ़ गए तनाव के बीच हुए चुनावों में भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं ने ही "मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं" के नारे लगाकर भाजपा को ही सत्ता से बाहर कर दिया।

2018 में मोदी और अमित शाह ने राजस्थान के चुनाव जीतने में कोई विशेष रुचि भी नहीं दिखाई थी, और अनमने ढंग से ही प्रचार किया था। इसके अलावा 60 से भी अधिक सीटों पर भाजपा के कार्यकर्ता ही निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतर गए और भाजपा के वोट काटकर कांग्रेस उम्मीदवारों को लाभ पहुंचाया। संगठन की ओर से ऐसे निर्दलीय उम्मीदवारों को बिठाने के कोई प्रयास भी नहीं किए गए। इसके बावजूद 2018 में भाजपा को मिले कुल वोट और कांग्रेस को मिले कुल वोट में मात्र आधा प्रतिशत का फर्क रहा।

आत्मघाती मानसिकता के साथ आधे अधूरे मन से लड़े गए 2018 के चुनावों में भाजपा का खाता जिन जिलों में नहीं खुला था उनमें सीकर, भरतपुर, करौली, सवाई माधोपुर, दौसा, प्रतापगढ़ और जैसलमेर शामिल है। इनमें से 4 जिले पूर्वी राजस्थान के हैं। इसके अलावा 4 जिले ऐसे हैं, जहां बीजेपी 70 से 80 प्रतिशत तक सीटें हार गई थी। इनमें मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र शेखावत का गृह जिला जोधपुर भी शामिल है। यहां बीजेपी को 10 में से 2 सीटें ही मिली थी। बाकी 8 सीटों पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था।

वहीं, नागौर जिले में भी बीजेपी का यही हाल हुआ। नागौर में बीजेपी 10 में से केवल 2 सीटें ही जीत पाई थी। अलवर जिले की 11 में से भी 9 सीटों पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा। अलवर से बीजेपी के केवल दो विधायक हैं। नेता प्रतिपक्ष राजेन्द्र राठौड़ के गृह जिले चुरू में भी पिछले विधानसभा चुनावों में बीजेपी 6 में से 2 सीटें ही जीत पाई थी। इसके अलावा जयपुर जिले की 19 में से 6 सीटें ही बीजेपी के खाते में गई थी।

दरअसल राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच खिंची तलवारों से राजस्थान कांग्रेस में आए संकट को मोदी एक अवसर के रूप में देख रहे हैं। इसलिए राजस्थान में हुई रैलियों में अशोक गहलोत सरकार में हुए भ्रष्टाचार और आपस की लड़ाई में जनता के हो रहे बुरे हाल का जिक्र कर रहे हैं। कर्नाटक चुनाव को राष्ट्रीय मुद्दों पर बनाकर हार चुकी भाजपा अब राजस्थान में स्थानीय मुद्दों को आगे कर कांग्रेस को पटकनी देने की रणनीति बना रही है। इस कारण राजस्थान में कांग्रेस की सत्ता के खिलाफ माहौल बनाने के साथ पूरे कैंपेन को स्थानीय मुद्दों पर फोकस करने की रणनीति पर काम कर रही है। मोदी के लिए चुनौती यही है कि वे स्थानीय मुद्दों पर अशोक गहलोत को कितना घेर पाते हैं।

भारतीय जनता पार्टी आस लगाए बैठी है कि मोदी के करिश्मे के कारण राजस्थान में भाजपा की सरकार बनेगी। भाजपा के पक्ष में एक और तर्क दिया जा रहा है कि 1998 के बाद से राजस्थान में कोई भी सरकार दूसरी बार रिपीट नहीं हुई है। ऐसे में भाजपा की सत्ता में वापसी की उम्मीदें बढ़ी हुई है। वहीं अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस भी जनकल्याणकारी योजनाओं और वादों के दम पर सत्ता में बरकरार रहने की हर संभव कोशिश कर रही है। राजस्थान में सत्ता बदलती है या सत्ता बदलने का रिवाज, इसे देखने के लिए नवबंर या दिसंबर तक इंतजार करना होगा जब राजस्थान में विधानसभा चुनाव होंगे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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