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Vasundhara Raje: राजस्थान में भाजपा की मजबूरी है वसुंधरा राजे

Vasundhara Raje: विधानसभा चुनाव के एक्जिट पोल के आकलन से लग रहा है कि बीजेपी में राजस्थानी राजनीति की अंदरुनी गणित गड़बड़ा सकती है, और बीजेपी के पैतृक संगठन कहे जाने वाले आरएसएस अर्थात संघ परिवार ने इसे भली भांति भांप लिया है। आरएसएस को साफ लगने लगा है कि राजस्थान की राजनीतिक स्थिति जो नया आकार ले सकती है और एग्जिट पोल के जो नतीजे सामने आ रहे हैं, ऐसे में तात्कालिक रूप से बीजेपी में मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त चेहरा वसुंधरा राजे ही हो सकती हैं।

संघ परिवार के ताकतवर लोग मान रहे हैं कि राजस्थान में विधानसभा चुनाव भले ही बीजेपी ने वसुंधरा राजे के चेहरे पर नहीं लड़ा, लेकिन बीजेपी अगर सत्ता में आती है तो न तो बीजेपी, न आरएसएस और न ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजस्थान में पूर्व मुख्यमंत्री राजे का रास्ता रोक पाएंगे। माना जा रहा है कि भारी बहुमत के साथ अगर बीजेपी जीतती है, तब तो बात और हो सकती है, मगर किनारे के बहुमत में बीजेपी का वसुंधरा राजे की जगह किसी अन्य को मुख्यमंत्री बनाना खतरे से खाली नहीं होगा। माना जा रहा है कि राजस्थान में वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री न बनाने के लिए आलाकमान ने ज्यादा दबाव डाला तो पार्टी में विद्रोह हो सकता है।

rajasthan election 2023 Vasundhara Raje is important for bjp in rajasthan chunav

बीजेपी और संघ परिवार की मंशा से वसुंधरा राजे को दरकिनार करने की घोषणा विधानसभा चुनाव के दौरान स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी और कहा था कि राजस्थान में बीजेपी का चेहरा कमल है, और उसी पर चुनाव हो रहा है। मगर बीजेपी यदि सत्ता में आती है तो माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी भी पूर्व मुख्यमंत्री राजे का रास्ता आसानी से नहीं रोक पाएंगे। खबर है कि इसी वजह से मुख्यमंत्री बनाने के मामले में राजस्थान में संघ परिवार ने ऐन वक्त पर रणनीति बदलकर वसुंधरा के बारे में सोचना शुरू कर दिया है।

राजस्थान विधानसभा के चुनाव में बीजेपी के कुल 199 विधानसभा उम्मीदवारों में कुल 65 उम्मीदवार वसुंधरा राजे के समर्थक हैं। कम से कम 5 निर्दलीय भी राजे के साथी रहे हैं। इन 70 में से वैसे तो ज्यादातर जीत रहे हैं, मगर आधे भी जीतते हैं, तो भी वसुंधरा राजे के तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के सपने को तोड़ना बीजेपी के लिए खतरे से खाली नहीं होगा। फिर, इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि अगर ताकत दिखाने का मौका आया, तो वक्त के साथ कुछ और विधायकों का समर्थन भी राजे को हासिल हो सकता है।

बीजेपी आलाकमान वसुंधरा राजे की ताकत जानता है और छह महीने बाद लोकसभा के चुनाव हैं, जहां मोदी को तीसरी बार देश का प्रधानमंत्री बनना है। बिहार में बीजेपी के कमजोर होने और कुछ अन्य प्रदेशों में भी सीटें कम होने की संभावना के बीच मोदी राजस्थान जैसे जनाधार वाले राज्य में जनाधार गड़बड़ाने और लोकसभा की सीटें कम होने का खतरा नहीं ले सकते। राजस्थान में फिलहाल कुल 25 लोकसभा सीटों में से बीजेपी की 24 सीटें हैं और ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में विधायकों की अनदेखी करके किसी कमजोर नेता को मुख्यमंत्री बनाकर प्रदेश में मोदी के बारे में धारणा गड़बड़ा कर लोकसभा चुनाव के लिए रिस्क लेना बीजेपी के लिए नई मुश्किल खड़ी कर सकता है।

राजस्थान विधानसभा चुनाव का प्रचार अभियान गवाह है कि वसुंधरा राजे ने इस चुनाव में सिर्फ अपने समर्थकों के विधानसभा क्षेत्रों में ही पार्टी का प्रचार किया है। इसी से राजे की सत्ता में आने की मजबूत मंशा का अंदाज लगाया जा सकता है। संघ परिवार की राजनीतिक धाराओं एवं रणनीतिक जानकारियों की अंदरूनी जानकारी रखनेवाले एक वरिष्ठ बीजेपी नेता के मुताबिक बीजेपी में संभावित विद्रोह को रोकने के लिए संघ परिवार ने वसुंधरा के विरोध की रणनीति पर गहराई से चिंतन करते हुए कुछ वक्त के लिए उनको प्रदेश में अग्रणी रखे रहने का मन बनाया है। वैसे भी राजस्थान बीजेपी में वसुंधरा राजे के मुकाबले कोई अन्य दमदार चेहरा नहीं है, जो लोकसभा चुनाव में पूरे चुनाव अभियान को अपने कंधों पर उठाकर सफलता के मुकाम तक पहुंचा सके।

हालांकि, छह महीने बाद लोकसभा चुनाव नहीं होता, और बीजेपी को प्रदेश में पूर्ण बहुमत मिल रहा होता, तो किसी को भी मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी आगे बढ़ सकती थी। मगर, भले ही यह कांग्रेस के रणनीतिक प्रबंधन की उपज हो, मगर ज्यादातर एग्जिट पोल ने बीजेपी को सत्ता के किनारे पर खड़ा कर दिया है, ऐसे में बहुमत मिला तो भी वसुंधरा को दरकिनार करना आसान नहीं होगा। क्योंकि संघ परिवार की कई चेहरों को गहराई से परखने के बाद मुख्यमंत्री के चेहरे की तलाश आखिरकार वसुंधरा राजे पर आकर ही समाप्त हो गई है। तस्वीर धीरे धीरे साफ हो रही है कि वसुंधरा राजे ही मुख्यमंत्री के तौर पर संघ परिवार की पसंद के तौर पर फिलहाल आगे है।

हालांकि मुख्यमंत्री पद के लिए साल भर पहले से जाति, समाज और वर्ग एवं क्षेत्र के समीकरणों को साधते हुए संघ परिवार ने लगभग 5 चेहरों पर सोचना शुरू किया था। वसुंधरा के विकल्प के तौर पर सोचे गए गजेंद्र सिंह शेखावत तो वैसे भी 884 करोड़ के संजीवनी घोटाले की आंच में शुरू में ही झुलस गए थे, मगर दलित चेहरे के रूप में केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल, जाट चेहरे के रूप में बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ सतीश पूनिया, सामान्य वर्ग से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला एवं ब्राह्मण व ओबीसी तथा प्रशासनिक प्रखरता के मिले जुले चेहरे के रूप में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को संघ परिवार ने आगे करने की सोची थी।

वसुंधरा राजे के राजसी विकल्प के तौर पर जयपुर राजघराने की दीया कुमारी को भी बीजेपी का एक छोटा सा धड़ा दबे कदमों से आगे बढ़ाता रहा, मगर उनके विरोध में बड़ी ताकतें सफल रहीं। वैसे भी राजस्थान बीजेपी में वसुंधरा से बड़ा नेता और कोई है ही नहीं। या फिर कहें तो वसुंधरा राजे बाकी सारे नेताओं पर अकेले ही बहुत ज्यादा भारी मानी जा सकती है। इसीलिए, बीजेपी अगर सीधे सीधे सत्ता में आती है या बहुमत के किनारे भी पहुंचती है, तो भी वसुंधरा राजे का सीएम बनना लगभग तय माना जा रहा है। कहा जा सकता है कि वसुंधरा अब बीजेपी की जरूरत भी हैं और मजबूरी भी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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