Rajasthan Elections: ‘जादूगर’ को निर्दलियों के भरोसे रिवाज बदलने की आस
Rajasthan Elections: राजस्थान में मतदान हो चुका है और अब सरकार बदलने के रिवाज को बदलने की बात चल रही है। इसके पीछे कांग्रेस की फिर से सत्ता में आने की चाहत है। हालांकि, प्रदेश में भले ही हर पांच साल में सरकारें बदलती रही हैं, लेकिन अगर इस बार कांटे का मुकाबला रहता है और कांग्रेस सरकार बना पाती है तो उस सरकार की चाबी निर्दलीय और छोटे दलों के पास ही रहेगी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पिछले दो कार्यकाल में निर्दलियों और छोटे दलों की वजह से ही गहलोत मुख्यमंत्री की कुर्सी बचा सके।
राजस्थान की राजनीति का इतिहास रहा है कि निर्दलियों और छोटे दलों को सीधे सत्ता में सहभागिता चाहिए, इसके बिना वे समर्थन देने के लिए राजी ही नहीं होते, क्योंकि वे अपने बूते पर चुनकर आते हैं। ऐसे में खास बात यह देखने को मिली है कि उनको किसी भी राजनीतिक दल के बजाय किसी खास नेता पर ज्यादा भरोसा होता है। ऐसे में निर्दलीयों व छोटी पार्टियों में वर्तमान मुख्यमंत्री गहलोत पर भरोसा ज्यादा देखा गया है, क्योंकि उनकी सरकार में हर बार निर्दलीयों को सम्मान भी मिला और सत्ता का सुख भी प्राप्त हुआ है।

वर्ष 2008 में अशोक गहलोत जब मुख्यमंत्री बने तो कांग्रेस 96 सीटों और 36.8 प्रतिशत वोट शेयर के साथ सत्ता में आई थी। उस समय निर्दलियों का वोट शेयर 15 प्रतिशत था। तब बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के सभी 5 विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए थे और सरकार को बनाने व बचाने में मदद की थी। इसी तरह से वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद जब कांग्रेस ने शुरुआत में 99 सीटों के साथ सरकार बनाई, तो फिर से छह बसपा विधायकों ने कांग्रेस पार्टी में शामिल होकर इसे मजबूत किया। सन 2018 में 13 निर्दलीय जीते थे और उनका वोट शेयर भी 9.6 प्रतिशत था।
कांग्रेस की सरकार बनने के बाद जून 2020 में जब राजनीतिक संकट के दौरान, मुख्यमंत्री गहलोत को अपने डिप्टी सचिन पायलट और उनके 18 विधायकों के विद्रोह का सामना करना पड़ा, तो 13 में से कम से कम 10 निर्दलीय विधायकों ने गहलोत सरकार को टिकाए रहने में मदद की। बाद में निर्दलीयों और छोटे दलों से कुछ विधायक मंत्री बनाए गए तो कुछ को मुख्यमंत्री का सलाहकार बनाया गया। सरकार के समर्थन में आए पांच निर्दलीय विधायकों लक्ष्मण मीना, बाबूलाल नागर, खुशवीर सिंह, संयम लोढ़ा और ओमप्रकाश हुड़ला को इस बार 2023 के चुनाव में कांग्रेस से टिकट भी दिया गया है।
उधर, बीजेपी के कुछ नेता भी अपनी पार्टी का टिकट नहीं मिलने के बाद बागी के रूप में निर्दलीय चुनाव लड़ चुके हैं। पूर्व मंत्री और वसुंधरा राजे के विश्वासपात्र युनूस खान को सन 2018 के चुनाव में उनकी सीट डीडवाना से हटाकर टोंक से सचिन पायलट के खिलाफ उम्मीदवार बनाया गया, वह चुनाव हार गए, जो हार लगभग तय थी। इस बार टिकट नहीं मिलने के बाद खान डीडवाना से निर्दलीय मैदान में उतरे। चित्तौड़गढ़ में वर्तमान बीजेपी विधायक चंद्रभान सिंह आक्या की जगह बीजेपी के वरिष्ठ विधायक नरपतसिंह राजवी को टिकट दिया गया, तो आक्या निर्दलीय मैदान में उतर गए। शाहपुरा में राजे के एक अन्य वफादार कैलाश मेघवाल को केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के बाद बीजेपी से निलंबित कर दिया गया था, तो 89 वर्षीय मेघवाल भी निर्दलीय मैदान में उतर गये।
बीजेपी से नाराज ये निर्दलीय जीते तो विधायक के रूप में किसी को भी, खासकर कांग्रेस को सत्ता दिलाने में सहजता से ताकतवर भूमिका निभा सकते हैं। कारण यही है कि बीजेपी में कोई भी नेता इस स्थिति में नहीं है, जिसकी बात पर व्यक्तिगत रूप से भरोसा करके निर्दलीय उसे समर्थन दे दें। बीजेपी के इन बागियों के अलावा, किसी भी निर्दलीय अथवा छोटी पार्टी को यह पक्का भरोसा नहीं है कि बीजेपी को समर्थन देने पर उन्हें वही सम्मान मिलेगा, जो गहलोत के राज में निर्दलीयों व छोटी पार्टियों को मिलता रहा है। फिर बीजेपी तो अपने दम पर सत्ता में आती रही है, तथा उसे निर्दलीयों और छोटे दलों तक पहुंचने की जरूरत तीस वर्षों से नहीं पड़ी।
तस्वीर साफ है कि नतीजे अगर कांग्रेस के पूरी तरह से पक्ष में नहीं भी रहे और कुछ सीटें कम भी रहीं, तो गहलोत राजस्थान के राज बदलने के रिवाज को खत्म करने का प्रयास जरूर करेंगे। ऐसे में क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी और क्या आरएलपी, हर पार्टी के नेताओं को भरोसा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अगर बहुमत के नजदीक भी पहुंचने का मौका मिला तो बीजेपी को पछाड़ते हुए जुगाड़ के जरिए फिर से कांग्रेस की सरकार बनाने से नहीं चूकेंगे।
राजस्थान सहित पूरे देश की नजरें 3 दिसंबर को आने वाले नतीजों पर है। हर किसी को चुनाव के नतीजों का इंतजार है। मतगणना से पहले हर सीट के गणित का हिसाब किताब लगाया जा रहा है। कौन कहां हार रहा है और कौन किस तरह से जीत रहा है। इस गणित में खास बात यह है कि किस सीट पर कौन सा निर्दलीय या छोटी पार्टी का नेता जीत रहा है, उससे अभी से संपर्क बनाने की कोशिश की जा रही है, क्योंकि जुगाड़ की सरकार बनी, तो ये लोग ही काम आने हैं।
चुनाव जीतने की स्थिति में जो निर्दलीय वर्तमान में दिखाई दे रहे हैं, बीजेपी और कांग्रेस समेत अन्य छोटे दल भी उनसे संपर्क साधने की कोशिश कर रहे है। इधर, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा है कि सत्ता में फिर से कांग्रेस ही आ रही है। मुख्यमंत्री गहलोत ने यह भी कहा है कि जीतने वाले नेता और सत्ता में आने वाले दल का तो एक स्वाभाविक संबंध होता है। इसके साथ ही गहलोत का यह भी दावा है कि राजस्थान में कांग्रेस की सरकार के खिलाफ कोई एंटी इन्कम्बेंसी नहीं है। मुख्यमंत्री गहलोत की बात का सीधा मतलब है कि कांग्रेस को उम्मीद है कि वह फिर से सत्ता में आ सकती है।
वैसे भी किसी भी राजनीतिक दल के निर्णायक जीत हासिल करने में विफल रहने के बाद निर्दलीय और छोटे दलों के पास ही सरकार बनाने की ताकत होती है। खासकर राजस्थान में जब भी कांग्रेस सत्ता में आई है तो वे मुख्यमंत्री बनाने को लेकर अशोक गहलोत के साथ रहे हैं। ऐसे में अगर गहलोत राज का रिवाज बदलने की मंशा जता रहे हैं तो इसके पीछे उनका अपना कोई अंकगणित जरूर होगा। लेकिन हर गणित के लिए 3 दिसंबर का इंतजार करना होगा जब मतपेटियां खुलेंगी। यदि भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिल जाता है तो जादूगर के नाम से मशहूर अशोक गहलोत को सत्ता से बाहर बैठना पड़ेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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