Vasundhara Raje: चेहरा नहीं बनीं, तो चेहरा बिगाड़ भी सकती है वसुंधरा
Vasundhara Raje: राजस्थान में बीजेपी के नेता भले ही यह कहते घूम रहे हों कि चुनाव किसी चेहरे पर नहीं बल्कि कमल के निशान पर ही होगा, लेकिन चुनाव माथे पर आते आते उनको भी यह साफ लगने लगा है कि सत्ता में आना वसुंधरा राजे के बिना आसान नहीं है। भले ही मध्य प्रदेश में वसुंधरा राजे की छोटी बहन यशोधरा राजे से बीमारी के बहाने चुनाव न लड़ने और महल में विराजने की घोषणा करवा दी गई हो, या फिर गुजरात में टिकट काटकर घर बिठा दिए गए ताकतवर नेता नितिन पटेल को राजस्थान में उप प्रभारी जैसे मामूली पद पर बिठाकर ये साफ संकेत दे दिए गए हों कि केंद्र के सामने किसी की मनमर्जी नहीं चलती।
लेकिन राजस्थान न तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह का गुजरात है और न ही मध्य प्रदेश, जहां पर मोदी के कहने पर विधानसभा में सीधे सीधे वोट पड़ जाएं और बीजेपी आसानी से सत्ता में आ सके। दरअसल, अशोक गहलोत ने अपने रणनीतिक कौशल के जरिए राजनीति में खुद को इतना बड़ा बना लिया है कि पार्टी के भीतर ही कांग्रेस आलाकमान भी अब उनके लिए कोई चैलेंज नहीं है। धड़ाधड़ शुरू की गई धमाकेदार जनलाभकारी योजनाओं के जरिए जनता को अपने साथ जोड़कर खुद के लिए एक ऐसा राजनीतिक कवच निर्मित कर लिया है, जिसके कारण बीजेपी की सत्ता आना उतना आसान नहीं है जितना बीजेपी के नेता कह रहे हैं।

राजनीति के इसी मुश्किल मोड़ पर वसुंधरा राजे बीजेपी की राजनीतिक मजबूरी बन रही है, इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर पार्टी के अध्य़क्ष जेपी नड्डा और बीजेपी के चाणक्य कहे जानेवाले ताकतवर गृहमंत्री अमित शाह तक कोई तरकीब तलाशने में व्यस्त हैं कि है कि आखिर वसुंधरा राजे के बिना गहलोत को गुड़काकर राजस्थान में बीजेपी को सत्ता में कैसे लाया जाए?
पहले थोड़ा इतिहास में झांकते हैं। राजस्थान में वर्ष 1993 में बीजेपी के भैरोंसिंह शेखावत लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। मगर उनको हराकर वर्ष 1998 में कांग्रेस से जब अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने, तो उसके बाद से लगातार हर पांच साल बाद एक बार कांग्रेस, और एक बार बीजेपी की सरकारें बनने का सिलसिला चल गया। इन पांच चुनावों में तीन बार कांग्रेस से अशोक गहलोत तो दो बार बीजेपी से वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री रही हैं। हर पांच साल बाद सत्ता के बदलने की कहानी जारी रही है। जनता ने भी इसे एक ट्रेंड के रूप में अपने भीतर उतार लिया है कि जो सरकार है, उसे लगभग बदलना ही है।
इसी वजह से 2013 के चुनाव में जब अशोक गहलोत मुख्यमंत्री थे, तो उन्होंनें लोगों के लिए अनेक लाभकारी योजनाएं लागू की थीं, लेकिन कांग्रेस 200 में से केवल 22 सीटें ही जीत सकी। इसी वजह से इस बार अशोक गहलोत भले ही जबरदस्त योजनाएं लेकर जनता के बीच हैं और लगभग उत्तर प्रदेश में बीजेपी के चुनाव जीतने की तर्ज पर जनलाभकारी योजनाओं के लाभार्थिय़ों से जुड़कर जीत की जुगत लगा रहे हैं, लेकिन बीजेपी गहलोत की हर काट का सामान जुटा रही है।
हां, वसुंधरा राजे का फैक्टर बीजेपी के लिए एक ऐसा फच्चर बन गया है, जिसका तोड़ वह चाहकर भी निकाल नहीं पा रही है। बीजेपी आलाकमान इस संभावना पर आश्रित है कि इस बार चुनाव बेहद रोचक हो गया है। हो सकता है कि अंत में नतीजा तीन दशक से होते रहे बदलाव का रिवाज का साथ निभाता नजर आए लेकिन बीजेपी में वसुंधरा राजे ने इस पूरे चुनाव को चर्चा में ला दिया है। आलम यह है कि राजस्थान को लेकर, खासकर वसुंधरा राजे को लेकर नरेंद्र मोदी, अमित शाह और पूरी बीजेपी सतर्क है, सावधान है।
राजस्थान में सही मायने में वसुंधरा राजे बेहद कद्दावर नेता है। इस बात में किसी को कोई शक नजर नहीं आता। फिर मोदी, शाह और नड्डा की राजे को दरकिनार करने की कोशिशों ने इस तथ्य को स्थापित भी कर दिया है। इसीलिए देखा जाए तो साफ लगता है कि वसुंधरा के राजनीतिक वर्तमान और भविष्य के बीच यह चुनाव झूल रहा है और उसी पर पहुंचकर लगभग अटक सा गया है।
राजस्थान में अपने दम पर बीजेपी को बहुमत दिलाने वाली दो बार की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने खुद को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करवाने की कोशिश में कई साधना, आराधना और जप - तप भी किए हैं। लेकिन बीजेपी आलाकमान चुनाव सिर पर होने के बावजूद यह आकलन करने में लगा है कि क्या वसुंधरा के बिना चुनाव जीता जा सकता है या नहीं। राजस्थान में पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी के 73 विधायक जीते थे। इसमें से लगभग आधे वसुंधरा समर्थक हैं, जो वर्तमान में विधानसभा में बैठे हैं और फिर से उम्मीदवारी भी चाह रहे हैं।
बीजेपी का चतुर आलाकमान यह दिखा तो नहीं रहा है, लेकिन उसे डर जरूर सता रहा है कि अगर वसुंधरा को हाशिये पर लाया गया तो गहलोत के मुकाबले कहीं बीजेपी सत्ता की दौड़ में बैठ न जाए। क्योंकि अशोक गहलोत भी इस बार इतिहास बदलने की कोशिश में चुनावी मुद्रा में मैदान में खड़े हैं और प्रदेश की जनता में अपनी इस बार की योजनाओं व अपने लाभ देनेवाले जनकार्यों के जरिए फिर से आने की धारणा को प्रबल कर चुके हैं। बीजेपी आलाकमान का एक डर यह भी है कि वसुंधरा को दरकिनार करने और गहलोत के बढ़ते कद के कारण त्रिशंकु विधानसभा की सूरत में वसुंधरा राजे कांग्रेस के समर्थन में कोई ऐसा ही खेल न कर दे, जैसा मध्य प्रदेश में उनके भतीजे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बीजेपी के लिए किया था।
राजस्थान में अपनी ही पार्टी में दरकिनार किए जाने की कोशिशों के बीच वसुंधरा राजे जहां भी जाती हैं, जनता उनको घेर लेती हैं। अपने दौरों में वे अपनी ओर से खुद को लगभग मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करते हुए जनता को अपनी शक्ति बताती हैं। वे लोगों से कहती है कि आपकी इस अटूट शक्ति की वजह से मैं राजस्थान से कहीं नहीं जाऊंगी। आपकी सेवा करूंगी, आपके साथ रहूंगी। आपकी आवाज आपके साथ उठाने में कोई कमी नहीं रखूंगी। आपकी शक्ति, आपका साथ, आशीर्वाद बना हुआ है। आपका ये साथ इतना मजबूत है कि जो कोई भी तोड़ने की कोशिश करेगा, टूटेगा नहीं।
लेकिन इसके बाद भी जनसभाओं में नरेंद्र मोदी और अमित शाह द्वारा वसुंधरा को कोई बहुत भाव नहीं देने और महिला आरक्षण विधेयक पारित करवाने के तत्काल बाद ही प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कमल को ही राजस्थान में चुनावी चेहरा घोषित कर देना साफ तौर से वसुंधरा की अहमियत को कमजोर करने की कोशिश माना जा रहा है। हालांकि राजस्थान की महिलाओं में लोकप्रियता के शिखर पर विराजमान वसुंधरा इसके बावजूद मोदी के महिला आरक्षण बिल की प्रशंसा में महिलाओं के बीच यह कहती है कि मोदी जी ने सही किया है क्योंकि मातृ शक्ति की भागीदारी के बिना किसी भी राष्ट्र के नव निर्माण की कल्पना अधूरी है। वे महिलाओं का जोश देख कर यह भी कहती है कि नारी शक्ति का यह प्रवाह राजस्थान की महिला विरोधी कांग्रेस सरकार को बहा कर ले जाएगा।
लेकिन असल मुद्दा चेहरे का है। चेहरा नहीं बनीं, तो क्या चेहरा बिगाड़ कर रख देगी वसुंधरा? बीजेपी आलाकमान इसी कोशिश में है कि वसुंधरा की वजह से बात और चेहरा दोनों ही न बिगड़े और सरकार भी बन जाए। लेकिन राजनीति में हर कोशिश कामयाब ही होती है, ऐसा अक्सर नहीं होता। आखिर मध्यप्रदेश में सिंधिया की तर्ज पर सचिन पायलट के जरिए राजस्थान में भी गहलोत को गिराकर सत्ता हथियाने की कोशिश कहां सफल हुई?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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