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कट्टरपंथी रईसी बनाम ईरान की उदारवादी जनता

Iran ke Rashtrapati: ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत की आधिकारिक पुष्टि हो गयी है। एक दिन पहले उनका हेलिकॉप्टर ईरान के उत्तर पूर्वी इलाके के जंगलों में गिर गया था जिसमें उनके अलावा ईरान के विदेश मंत्री भी सवार थे। उनकी मौत की आशंका और पुष्टि के बीच ईरान में ही दो तरह के लोग सामने आये हैं।

एक ओर वो लोग हैं जो रईसी की मौत पर मातम मना रहे हैं तो दूसरी ओर वो लोग भी हैं जो रईसी की मौत पर राहत की सांस ले रहे हैं। ईरान में इस्लामिक कट्टरपंथ को नयी ऊंचाई पर ले जाने वाले रईसी की मौत से एक ओर जहां ईरान को लेकर विश्व राजनीति पर असर पड़ेगा वहीं घरेलू स्तर पर भी ईरान में उथल पुथल बढेगी।

Iran ke Rashtrapati

ऐसे समय जब रईसी ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्ला खामनेई के एकमात्र उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित हो रहे थे, उनका ना होना, ईरान में एक बड़ी उथल पुथल का कारण बन सकता है। ईरान पहले से ही अमेरिका और अन्य देशों द्वारा जारी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और अंदर से भी कई झंझावातों को झेल रहा है। ऐसे में रईसी का न रहना एक संभावित संकट की ओर भी इशारा कर रहा है।

इस्लामिक तालिमात में महारत रखनेवाले 63 वर्षीय रईसी 2021 में ईरान के राष्ट्रपति चुने गए थे। हालांकि ईरानी जनता के एक बड़े वर्ग ने उनका बहिष्कार किया था क्योंकि इस इस्लामिक गणराज्य के इतिहास में तब सबसे कम वोट, लगभग 45 प्रतिशत पड़े थे। लेकिन ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामनेई का उनको समर्थन प्राप्त हुआ और वे राष्ट्रपति के रूप में पदस्थापित हो गए।

राष्ट्रपति बनकर रईसी एक तरफ अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर आगे बढ़े और साथ ही पश्चिम के साथ टकराव की नीति भी कायम रखी तो दूसरी ओर ईरान में कमजोर पड़ रही इस्लामिक क्रांति को दोबारा से स्थापित करने का प्रयास किया। अभी एक महीने पहले ही रईसी ने इज़राइल पर एक बड़ा हमला करवाया और अमेरिका को भी खुली चुनौती दे डाली थी।

ईरान में रईसी को रूढ़िवादी नेता माना जाता था। उन पर अपनी सरकार में प्रमुख पदों पर अपने रिश्तेदारों की नियुक्ति का भी आरोप लगता रहा, जबकि ईरान की अर्थव्यवस्था एक बड़े संकट का सामना कर रही है। इसके अलावा आसमान छूती कीमतों को लेकर भी ईरान में काफी असंतोष बढ़ने लगा है। सुधारवादी आलोचक बार बार यह कहते रहे कि रईसी के पास किसी भी समस्या का हल नहीं है। हालात इस खतरनाक स्थिति में पहुंचने लगे थे कि 2019 जैसा राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन होने की आशंका बढ़ने लगी है।

लेकिन खुमैनी की तरह रईसी भी ईरान पर इस्लामी आदर्शों और प्रथाओं को थोपने पर ही जोर देते रहे। ईरानी विरासत और संस्कृति की रक्षा के नाम पर ईरान में मजहबी राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया जाने लगा। यहाँ तक कि पारंपरिक लोक संगीत और नृत्य पर भी पाबंदी लगा दी गई। सैय्यद इब्राहिम रईसी को अपने पड़ोसियों पर प्रभुत्व जमाने, व्यक्तिगत अधिकारों का दमन करने और युद्ध पर आमादा रहने के लिए भी जाना जाता है।

1970 के दशक में, ईरान भी अन्य यूरोपीय और पश्चिमी समाजों की तरह खुले विचारों का देश था। महिलाएं कार चलाती थीं, स्कूल कालेज जाती थीं, नौकरियां करती थीं और अपनी इच्छा के अनुसार सड़कों पर चलती थीं, लेकिन जब 70 के दशक के अंत में धार्मिक नेताओं का ईरान पर नियंत्रण हुआ तो सारी सामाजिक प्रगति रुक गई। राष्ट्रपति बनने के बाद रईसी ने समाज को दकियानूसी से निकालने के बजाय लोगों को उल्लंघन के लिए दंड देना शुरू कर दिया।

उन्होंने घरेलू विरोध प्रदर्शनों पर कठोर कार्रवाई की। अपने चुनाव के एक साल बाद ही उन्होंने महिलाओं की पोशाक और व्यवहार को प्रतिबंधित करने के लिए ईरान में हिजाब कानून को सख्ती से लागू कर दिया और जब ईरान के युवा वर्ग ने विरोध किया तो उसे कुचल दिया। उसी दौरान एक युवा कुर्द ईरानी लड़की महसा अमिनी को पुलिस हिरासत में मार दिया गया। दर्जनों अन्य लोग भी मारे गए।

राष्ट्रपति बनने के बाद रईसी ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों और प्रथाओं का भी खूब उल्लंघन किया। उनके अड़ियल रुख के कारण ही ईरान की परमाणु वार्ता विफल हुईं, क्योंकि ईरान लगातार अपनी भूमिगत परमाणु सुविधाओं की स्थापना और विस्तार करता रहा। वह यूरेनियम के भंडार को भी आवश्यकता से कहीं अधिक समृद्ध करने पर जोर देता रहा। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के निरीक्षकों को भी ईरान आने की अनुमति नहीं दी। रईसी धीरे-धीरे परमाणु हथियार क्षमता विकसित करने और उसका इस्तेमाल अपने कथित दुश्मन मुल्कों पर करने की नीति पर चलते रहे।

ईरान ने यमन, सीरिया और लेबनान में भी हथियारों की खेप भेजने के लिए लाखों डॉलर खर्च किए। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और यूक्रेन में बड़े पैमाने पर नागरिक हताहतों के साथ-साथ सीरिया में अमेरिकी सेना के खिलाफ छिटपुट हमलों में भी ईरानी ड्रोन और मिसाइलों के प्रयोग देखे गए। रईसी ने पश्चिम के प्रतिबंधों को बेअसर करने के लिए चीन और रूस की सहायता ली।

रईसी ने हाल के दिनों में अपनी कूटनीतिक गतिविधियां तेज कर दी थी। अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए शायद टकराव का रास्ता छोड़ना जरूरी लगने लगा था। रईसी चीन, सीरिया और वेनेज़ुएला की मध्यस्थता में सऊदी अरब से अपने रिश्ते सुधारने में लगे थे। उन्होंने अरब के राजनयिकों की मेजबानी भी की। अपने विरोधी अमेरिका के साथ भी अप्रत्यक्ष वार्ता के लिए ओमान की सहायता ली।

वह अपने परमाणु कार्यक्रम को कम करने और अमेरिकी कैदियों की रिहाई के माध्यम से तनाव कम करने लिए किसी गुप्त समझौते पर भी काम कर रहे थे। शायद उनको उम्मीद थी कि इस तरह के प्रयासों से ईरान में अनियंत्रित मुद्रास्फीति शांत हो जाएगी और डॉलर के मुकाबले रियाल का मूल्यह्रास भी रुक जाएगा और अर्थव्यवस्था पुनर्जीवित हो जाएगी।

रईसी ने खुद को नई विश्व व्यवस्था में ढालने की कोशिश भी की। उन्होनें चीन, इंडोनेशिया, वेनेजुएला, निकारागुआ और क्यूबा का दौरा किया। जब मौका मिला साम्राज्यवादी शक्तियों की निंदा भी की। उनके नेतृत्व में ईरान को यह उम्मीद थी कि एक दिन पश्चिमी देशों को भी वे यह मानने के लिए मजबूर कर देंगे कि मध्य एशिया में उनको छोड़कर नहीं चल सकते। वो जिन्दा रहते तो इस विरोधाभास को कैसे साधते यह तो पता नहीं लेकिन उनके न रहने से ईरान के भीतर और बाहर उनके समर्थक उदास तो विरोधी खुश दिखाई दे रहे हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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