Balwant Singh Rajoana: 'माफी नहीं मुझे फांसी दो'

वह एक ऐसा सजायाफ्ता मुजरिम है जो जेल में बैठकर अपनी फांसी का इंतजार कर रहा है। उसे फांसी की सजा हो चुकी है लेकिन इस सजा पर उसे न कोई पछतावा है, न उसने न्यायालय से माफी मांगी है।

Beant Singh assassination case story of Balwant Singh Rajoana

Balwant Singh Rajoana: देश में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें फांसी की सजा हो चुकी है और वे अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। उनमें बहुत से ऐसे लोग हैं, जो न्यायालय से रहम की उम्मीद रखे हुए हैं। न्यायालय के समक्ष दया याचिका डाल रहे हैं। समय समय पर ऐसे लोगों की रिहाई भी होती है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या में शामिल नलिनी 31 सालों के बाद जेल से बाहर आ चुकी है।

लेकिन फांसी की सजा की एक ऐसी कहानी पंजाब के बलवंत सिंह राजोआना की है, जो पंजाब के लुधियाना के राजोआना कलां गांव का रहने वाला है। वह 01 अक्टूबर 1987 को पंजाब पुलिस में कांस्टेबल पद पर भर्ती हुआ। पिछले 27 सालों से जेल में बंद हैं और ग्यारह सालों से फांसी की सजा होने के बाद मौत का इंतजार कर रहा है। इस फांसी की सजा को रोकने के लिए न तो उसने कोई दया याचिका लगाई है और न अपने पक्ष में कोई वकील नियुक्त किया है। जेल में बैठकर वह उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा है जिस दिन उसे फांसी दी जाएगी।

31 मार्च 2012 को उसे फांसी पर चढ़ना था। यह तारीख न्यायालय द्वारा तय की गई थी लेकिन 29 मार्च को यह फैसला स्थगित हो गया। इसी महीने मामला सर्वोच्च न्यायालय के सामने एक बार फिर आया। न्यायालय ने गृह मंत्रालय से कहा है कि इस अपराधी का जो भी करना है, उस पर जल्दी से निर्णय लेकर बताइए कि आप क्या चाहते हैं?

पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह पर हुआ था आत्मघाती हमला

घटना 31 अगस्त 1995 की है, पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या एक आत्मघाती हमले में हुई थी। इस हमले में उनके साथ 17 अन्य लोगों की जान गई थी। वे भारत के पहले मुख्यमंत्री थे, जिनकी इस तरह हत्या हुई थी। वे 1992 में पंजाब के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे और पंजाब में अलगाववादियों की सक्रियता के बीच प्रदेश में सामान्य स्थिति बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे थे। यह बात अलगाववादियों को बिल्कुल पसंद नहीं आ रही थी। इस मामले में एक आत्मघाती हमलावर जो मौके पर मारा गया। उसके अलावा राजोआना समेत नौ लोगों को दोषी पाया गया। सबकी गिरफ्तारी हुई और उनके खिलाफ चार्जशीट हुई। धीरे धीरे इस मामले में सब छूटते गए और एक की सजा उम्र कैद में तब्दील हो गई। जिन लोगों की बेअंत सिंह हत्याकांड में गिरफ्तारी हुई थी, उनमें बलवंत सिंह राजोआना अकेला अपनी फांसी का इंतजार कर रहा है।

बेअंत सिंह की हत्या करने के लिए दो लोग आत्मघाती हमला करने के लिए तैयार हुए थे। उसमें एक बलवंत सिंह राजोआना था, दूसरा था दिलावर सिंह बब्बर। दोनों ही पंजाब पुलिस के सिपाही थे। दोनों ही मानव बम बनने के लिए तैयार थे लेकिन चुना एक को जाना था। इसलिए दोनों के बीच सिक्का उछाला गया। सिक्का उछाल कर हुआ फैसला, दिलावर के पक्ष में गया। बात यहां खत्म नहीं हुई। पूरी तैयारी के साथ ये लोग 31 अगस्त 1995 को मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचे। मौके पर राजोआना भी पूरी तैयारी से पहुंचा था। यदि दिलावर किसी भी कारण से मिशन में असफल होता तो मिशन को अंजाम तक पहुंचाने की जिम्मेवारी राजोआना पर थी। वह भी मौके पर धमाके वाले दिन मौजूद था।

सभी आरोपियों की गिरफ्तारी हुई। फिर उन्हें कोर्ट में पेश किया गया। न्यायालय में बलवंत सिंह राजोआना ने अपना गुनाह स्वीकार किया और उसने यह भी कहा कि जो भी किया है, उसे लेकर कोई पछतावा नहीं है। जांच में यह बात भी सामने आई थी कि बेअंत सिंह की हत्या की साजिश भारत के बाहर से रची गई थी। सिक्ख समाज के कुछ लोगों को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिक्खों के नरसंहार का वास्ता देकर भड़काया गया था। भारत से अलग होने के लिए उन्हें उकसाया गया। बेअंत सिंह की हत्या जिस प्रवृत्ति ने कराई, वो शक्तियां आज भी शांत नहीं बैठी हैं।

फांसी की सजा मिले हुए 16 साल

01 अगस्त 2007 को सीबीआई विशेष अदालत (चंडीगढ़) ने उसे मौत की सजा सुनाई। इस मामले में कुल छह लोगों को अपराधी ठहराया गया। सजा हो जाने के बाद सिर्फ बलवंत सिंह राजोआना को छोड़कर सभी उच्च न्यायालय में राहत के लिए पहुंचे। उसके बाद यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। बलवंत सिंह ने वहां भी सीबीआई कोर्ट के निर्णय के खिलाफ कोई अपील नहीं की। 2012 में जब न्यायालय में इस मामले को सुना जा रहा था। उसने किसी भी तरह की कानूनी सहायता लेने से भी इंकार कर दिया। उसे अपने लिए कोई वकील नहीं चाहिए था। उसने दया याचिका भी नहीं डाली।

इसके बाद 31 मार्च 2012 को उसे फांसी देने की तारीख तय हो गई। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश शालिनी नागपाल ने यह फैसला सुनाया था। 27 मार्च को यह फैसला आया और सिखों के अलगाववादी संगठन दल खालसा और खालसा एक्शन कमेटी ने 28 मार्च 2012 को राजोआना की फांसी के विरोध में पूरे पंजाब में बंद का आवाहन कर दिया। उसके बाद 60,000 पंजाब पुलिस के जवान और अर्ध सैनिक बल की 15 कंपनियों को अलर्ट मोड पर रखा गया। उनकी जरूरत कभी भी पड़ सकती थी। ऐसे हालात बन गए थे।

पटियाला की जेल में सुबह नौ बजे फांसी दिया जाना तय हुआ था। पूरी जेल को मजबूत सुरक्षा घेरे में लिया गया था। इसी जेल में राजोआना कैद था। जेल के सुपरिटेंडेन्ट एलएस जाखर ने कोर्ट की तरफ से आया राजोआना का डेथ वारंट लेने से इंकार कर दिया। फिर कोर्ट की तरफ से उन्हें कारण बताओ नोटिस भेजा गया। इसी बीच में उच्च न्यायालय में फांसी की तारीख पर मोहलत मांगी जा रही थी। लेकिन राजोआना अपने बचाव में कुछ भी कहने को राजी नहीं हुआ।

शिरोमणि अकाली दल, पंजाब सरकार और गुरूद्वारा प्रबंधक समिति खुलकर राजोआना की फांसी रूकवाने की बात कर रहे थे। 28 मार्च को फांसी की तारीख से ठीक तीन दिन पहले पंजाब के उस समय के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल दिल्ली आकर गृह मंत्री पी चिदम्बरम से मिले। उनका कहना था कि यदि राजोआना को फांसी दे दी गई तो पूरे पंजाब में अराजकता की स्थिति पैदा हो जाएगी। कानून व्यवस्था संभालना मुश्किल हो जाएगा लेकिन सवाल यह था कि उसे राहत भी किस आधार पर दी जाए? वह अपनी सफाई में कुछ कह भी नहीं रहा। ना ही हत्या के लिए उसे कोई पछतावा है। बादल जाकर इस मुद्दे पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से मिले। केन्द्र ने मुद्दे की गंभीरता को समझा और फिर राजोआना की फांसी स्थगित हुई।

वर्ष 2016-17 में आया दसवें गुरू गोविन्द सिंह जी का 350वां प्रकाश पर्व। इस अवसर पर राजोआना की तरफ से सर्वोच्च न्यायालय में क्षमा याचिका शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक समिति ने दायर की। अपील की गई कि उसकी मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दी जाए। इस पर सर्वोच्च न्यायालय का कोई जवाब ही नहीं आया। इस बीच राजोआना ने अपनी फांसी के लिए जेल में दो बार भूख हड़ताल भी कर दी।

दिसंबर 2019 में एक बार फिर राजोआना की फांसी का मुद्दा संसद में उठा। राजोआना को फांसी की सजा मिलेगी भी या नहीं? संसद में यह सवाल उठाया कांग्रेस सांसद बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू ने कि क्या उसे माफी देने पर विचार किया जा रहा है? इस सवाल पर गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि कोई माफी नहीं दी गई है और कानून अपना काम कर रहा है।

अब एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय में मामला उठा है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि जिसे रहम चाहिए वह रहम के लिए अपील नहीं कर रहा है। उसके लिए तीसरी पार्टी अपील कर रही है। इसे कैसे स्वीकार किया जाए? जब तक वह खुद अपने लिए दया नहीं मांगता। उस पर दया कैसे की जा सकती है? सर्वोच्च न्यायालय ने गृह मंत्रालय और सीबीआई से कहा है कि वे बलवंत सिंह राजोआना पर अपनी रिपोर्ट दे, उसके बाद ही अंतिम निर्णय होगा कि इसका करना क्या है?

देखना यह है कि केन्द्र सरकार अब इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में क्या जवाब देती है। लेकिन अकाल तख्त से जिन्दा शहीद की उपाधि पा चुका राजोआना जेल में बैठकर अपनी फांसी की प्रतीक्षा जरूर रहा है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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