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जब डैडी हो रईस तो डर काहे का?

Pune Accident: उसकी उम्र में सिर्फ चार महीने की कमी रह गयी नहीं तो वेदान्त अग्रवाल वोटरों की लाइन में खड़ा होता और देश का भविष्य तय कर रहा होता। लेकिन वेदान्त अग्रवाल के 18 साल पूरा होने में चार महीने कम थे इसलिए किशोर न्यायालय द्वारा वह नाबालिग घोषित कर दिया गया और 'दो लोगों की हत्या का जिम्मेवार' होने के बाद भी एक निबंध लिखने की सजा पाकर छूट गया।

सरकारी रिकार्ड में वह भले ही बालिग न हुआ हो लेकिन व्यावहारिक जीवन में वह 'बाप' जरूर बन गया था। वह पब में जाकर देर रात दोस्तों के साथ दारू पी सकता था। अपनी मंहगी पोर्शे कार को अनाप शनाप तरीके से ड्राइव कर सकता था। अगर उसकी मंहगी कार के नीचे आकर दो लोग दबकर मर भी गये तो उसकी सेहत को क्या फर्क पड़ा?

Pune Accident

पिता करोड़ों अरबों का प्रापर्टी कारोबार करते हैं। जिनका इतना बड़ा कारोबार होता है पुलिस प्रशासन के लोग और राजनेता उसके आगे पीछे घूमते ही हैं। ऐसे बाप की संतान को डर होगा भी तो किस बात का? वह अपने आसपास जब देखता है कि कैसे मेरे पिता के पैसों के कारण सारा सरकारी सिस्टम आगे पीछे घूमता है तो उसे किस कानून का भय होगा भला? ऐसे अमीर लोग समाज के अनुशासन को तो पहले ही लांघ जाते हैं। वो एक ऐसे इलिट क्लब का हिस्सा हो जाते हैं जो अपने पैसों के कारण अपने आपको समाज, शासन सबके ऊपर पाते हैं।

जब उसका पैसा, मंहगा घर, मंहगी गाड़ी, शानो शौकत भरी जिन्दगी देखकर लोग उसे 'बड़ा आदमी' कहना शुरु करते हैं तब भला वह समाज के किसी नियम कानून से अपने आपको बंधा हुआ क्यों महसूस करेगा? जहां तक सरकारी कानूनों की बात है तो वहां हमेशा से एक अघोषित नियम चलता आया है कि "पैसा बोलता है।" आपकी जेब में पैसा है, आपके पास पॉवर है तो आप कानून के अधीन नहीं हैं बल्कि कानून आपके अधीन है।

यह तो भला हो सोशल मीडिया का जो उसने वेदान्त द्वारा हुई दो हत्याओं और उसके बाद जूविनाइल जस्टिस बोर्ड द्वारा दी गयी 'निबंध लिखने की सजा' पर सवाल उठा दिया। वरना वेदान्त अग्रवाल बड़ी आसानी से दो हत्या का दोषी होने के बाद भी हर सरकारी बाधा पार कर चुका था। पुणे पुलिस ने उसे पकड़ा जरूर लेकिन नाश्ते में पिज्जा खिलाने के लिए। खबर यह भी है वेदान्त की चिन्ता करने के लिए कोई स्थानीय एमएलए तत्काल थाने भी पहुंच गये थे।

वेदान्त अग्रवाल के मामले में सरकारी मशीनरी किस प्रकार से उसकी मदद कर रही थी उसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि आनन-फानन में सरकारी अस्पताल की रिपोर्ट भी तैयार करवा ली गयी कि उसने कोई शराब नहीं पी। रात भर नशे में धुत रहनेवाले वेदान्त के खून में सरकारी अस्पताल को रत्तीभर भी एल्कोहल 'नहीं' मिला। इतनी सारी क्लीन चिट का परिणाम यह हुआ कि जूविनाइल कोर्ट ने उसके अपराध को एक सामान्य सी चूक मानते हुए एक्सीडेन्ट पर निबंध लिखने के साथ 15 दिन ट्रैफिक पुलिस के साथ ड्यूटी करने की सजा देते हुए मुक्त कर दिया।

2013 में हुए निर्भया हादसे के बाद देश में रेप और किशोर अपराधियों को लेकर बने कानूनों में कई बदलाव किये गये थे। इसका कारण यह था कि निर्भया के साथ जिसने सबसे अधिक बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया था वह 18 साल से कम उम्र का निकला, अत: उसे जेल के बजाय बाल सुधार गृह भेज दिया गया। 2015 से पहले जो किशोर अपराध के दोषी भी पाये जाते थे वो अधिकतम दो साल के लिए बाल सुधार गृह भेज दिये जाते थे।

इसी को देखते हुए 2015 में केन्द्र सरकार ने गंभीर अपराध के मामलों में किशोरों को भी दोषी मानते हुए सात साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान कर दिया था। रेप या हत्या जैसे अपराधों में दोषी पाये जाने पर किशोर नौजवान को बाल सुधार गृह भेजने के बजाय एक वयस्क अपराधी की तरह ही सजा का प्रावधान किया गया। लेकिन वेदान्त अग्रवाल द्वारा किये गये एक्सीडेन्ट को जूविनाइल जस्टिस कोर्ट ने 'गंभीर अपराध' माना ही नहीं जिसके कारण कोर्ट द्वारा सुनाई गयी सजा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

जो दो नौजवान मरे वो दोनों सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे। मरने वाले अगर सड़क पर सोनेवाले गरीब भिखारी होते तब शायद सोशल मीडिया भी उनकी सुध नहीं लेता। लेकिन मरनेवाले नौजवान युवक और युवती भी अच्छे घरों से थे और सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे लिहाजा सोशल मीडिया के लिए ये एक मुद्दा बन गया। महाराष्ट्र सरकार को भी होश आया और दोबारा से जांच पड़ताल शुरु हो गयी। वो दो पब इस 'अपराध' में सील कर दिये गये कि उन्होंने एक 17 साल 8 महीने के नाबालिग को शराब बेची। इसके साथ ही वेदान्त के पिता और प्रॉपर्टी कारोबारी विशाल अग्रवाल को भी गिरफ्तार कर लिया।

उम्मीद करनी चाहिए कि अब कानून अपना काम सही से करेगा और दो लोगों की हत्या का कारण बने वेदान्त अग्रवाल को जरूर कठोर सजा सुनायेगा। लेकिन यह बात यहीं पर खत्म नहीं हो जाती। पूंजीवाद के प्रभाव में देश में एक वर्ग ऐसा निर्मित हुआ है जिसकी कमाई औरों के मुकाबले बहुत ज्यादा है। इनके यहां संतान मुंह में सोने का चम्मच लेकर पैदा होती है और बचपन से इस माहौल में पलती बढती है कि वो एक अलग क्लास हैं जिसका बाकी लोगों से कोई खास लेना देना नहीं हैं। उनके पास कारोबार है, पैसा है इसलिए वो जो करना चाहें वो कर सकते हैं।

पैसे से आसमान खरीदने की ख्वाहिश रखनेवाले इन अमीरजादों की परवरिश में ही खोट है कि अक्सर इनकी गाड़ियों के नीचे कोई न कोई कुचलकर मर जाता है। इनको यह अहसास कराया जाना जरुरी है कि वो समाज से अलग हटकर अमीर क्लास में जरूर शामिल हो गये हैं लेकिन देश का कानून सब पर समान रूप से लागू होता है। वो सरकार और कानून के सौदागर नहीं हैं कि पैसा देकर उसे भी खरीद सकते हैं। वेदान्त और उसके पिता विशाल अग्रवाल को मिलनेवाली सजा उनके भीतर भी कानून का वही डर पैदा करेगी जो किसी भी नागरिक के मन में होता है। वो कानून और समाज के ऊपर नहीं हैं बल्कि उसके बीच रहते हैं जिस दिन इसका अहसास उनमें पैदा होगा उस दिन वो इस देश के एक सभ्य नागरिक बनेंगे।

समाज का अनुशासन और राज्य का शासन माननेवाले ही एक देश समाज के आदर्श नागरिक बनते हैं। कोई अमीर हो या गरीब अगर उसके बच्चों के मन में समाज के अनुशासन और कानून के शासन के प्रति सम्मान नहीं है तो निश्चित रूप से उसकी मानसिकता पर सवाल खड़ा होगा। पैसे और पॉवर हो तो सबकुछ खरीदा जा सकता है इस मानसिकता को भी खत्म किये जाने की जरूरत है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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