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Privileges of MPs/MLAs: सुप्रीम कोर्ट ने सुधारी निर्वाचित प्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार पर अपनी गलती

Privileges of MPs/MLAs: सुप्रीमकोर्ट ने अपनी 26 साल पहले की गलती सुधार ली है| यह कांड 1993 में हुआ था, जब कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने अविश्वास मत में अपनी अल्पमत सरकार बचाने के लिए सांसदों को खरीदा था|

राव के सिपहसालारों ने सांसद तो कई खरीदे थे लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा के चार सांसद शिबू सोरेन, शलेन्द्र महतो, सूरज मंडल, साइमन मरांडी 55 -55 लाख रूपए लेने के सबूत के साथ पकड़े गए थे| उन्होंने रिश्वत में मिले रुपए अपने बैंक खातों में जमा करवा दिए थे| कुछ दिन बाद विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद भवन के भीतर ही एक प्रेस कांफ्रेंस करके सांसदों की खरीद फरोख्त का खुलासा किया था|

Privileges of MPs MLAs

रिश्वत का धन क्योंकि चारों सांसदों ने एक ही दिन बैंक खातों में जमा किया था, इसलिए कोई मुकर भी नहीं सकता था| चारों सांसद उन रुपयों का कोई हिसाब नहीं दे पाए थे| मामला सुप्रीमकोर्ट में गया, उन चारों ही सांसदों ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत मुकदमे की सुनवाई के दौरान स्वीकार किया था कि 1993 में उन्हें विश्वासमत के पक्ष में मत देने के लिए कांग्रेस पार्टी ने धन दिया था|

इसके बावजूद सुप्रीमकोर्ट की पांच जजों की बेंच ने बहुमत के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 105(2) में सांसदों को मिले विशेषाधिकार का हवाला देकर मुकद्दमे को ही रद्द कर दिया था| यह फैसला नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री पद से हटने के दो साल बाद आया था| इस दौरान तीन सरकारें बदल चुकी थीं|

Privileges of MPs MLAs

हालांकि इतनी देर बाद आए फैसले का कोई ज्यादा मतलब भी नहीं रह गया था, इसके बावजूद सारा देश यह मान कर चल रहा था कि रिश्वत के पुख्ता सबूतों के कारण कोई बच नहीं सकता| यहाँ तक कि नरसिम्हा राव के सरकारी आवास को जेल में बदलने की तैयारियां भी शुरू हो गई थीं, लेकिन पांच जजों की बेंच ने अनुच्छेद 105(2) को आधार बना कर सभी आरोपियों को बरी कर दिया|

पांच सदस्यीय बेंच के तीन जज इस अनुच्छेद के तहत सांसदों को मिलने वाली विशेषाधिकार की छूट से सहमत थे, लेकिन दो जज सहमत नहीं थे| यह अनुच्छेद सांसदों को संसद के भीतर किए गए किसी भी भाषण या मतदान पर क़ानून के दायरे से बाहर करता है| इसी तरह का एक प्रावधान अनुच्छेद 194 (2) में भी है, जो विधायकों को भी इसी तरह का विशेषाधिकार देता है|

यह एक अद्भुत फैसला था, रिश्वत संसद के भीतर नहीं दी गई थी, रिश्वत संसद के बाहर दी गई थी| भ्रष्टाचार निरोधक क़ानून के अंतर्गत वह एक अपराध था, लेकिन अगर संविधान का अनुच्छेद सजा देने में आड़े आ रहा था, तो उसी समय अनुच्छेद 105 (2) की समीक्षा की जानी चाहिए थी|

अब 26 साल बाद उसी सुप्रीमकोर्ट ने 1998 का अपना फैसला पलटते हुए कहा है कि इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि घूस लेने वाले ने घूस देने वाले के मुताबिक वोट दिया या नहीं| अनुच्छेद 105 (2) या अनुच्छेद 194 (2) में मिला विशेषाधिकार सदन के साझा कामकाज से जुड़े विषय के लिए है, वोट के लिए रिश्वत लेना विधायी काम का हिस्सा नहीं है|

अब 26 साल बाद जाकर सुप्रीमकोर्ट की सात सदस्यीय बेंच ने सर्वसम्मति से माना कि सांसदों और विधायकों को घूस लेने की छूट नहीं दी जा सकती है, यह विशेषाधिकार के तहत नहीं आता है| चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस ए एस बोपन्ना, एम एम सुंदरेश, पी एस नरसिम्हा, जेबी पारदीवाला, संजय कुमार और मनोज मिश्रा की संविधान पीठ ने कहा कि वे 1998 में दिए गए फैसले से सहमत नहीं हैं, जिसमें सांसदों और विधायकों को सदन में भाषण देने या वोट के लिए रिश्वत लेने पर मुकदमे से छूट दी गई थी|

26 साल बाद आया यह फैसला सुप्रीमकोर्ट के कामकाज पर भी सवाल खड़ा करता है| क्योंकि इसी सुप्रीमकोर्ट ने 26 साल पहले लोकतंत्र का सौदा करने वाले अपराधियों को बरी कर दिया था| अब इस फैसले का उन चार सांसदों पर क्या असर होगा, क्या वह मुकद्दमा फिर से खुलेगा? रिश्वत देने वाले मुख्य आरोपी नरसिम्हा राव का तो देहांत हो चुका है| शिबू सोरेन अभी भी राज्यसभा के सांसद और झारखंड मुक्ति मोर्चे के अध्यक्ष हैं|

इतने बड़े रिश्वत कांड के बावजूद झारखंड मुक्ति मोर्चा की राजनीति पर कोई असर नहीं हुआ| उनके बेटे हाल ही तक झारखंड के मुख्यमंत्री थे, जब उन्हें भी ईडी ने सरकारी जमीन हड़पने, खदानों की लूटखसोट करने के आरोपों में गिरफ्तार किया, तब उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया|

वैसे 26 साल बाद भी एक गलत फैसले की समीक्षा नहीं होती, अगर उन्हीं शिबू सोरेन की पुत्रवधू और झारखंड मुक्ति मोर्चा की ही विधायक सीता सोरेन पर 2012 में राज्यसभा चुनाव के दौरान वोट के बदले रिश्वत लेने का आरोप न लगता| सीता सोरेन ने बचाव में तर्क दिया था कि उन्हें सदन में 'कुछ भी कहने या वोट देने' के लिए संविधान के अनुच्छेद 194(2) के तहत छूट हासिल है|

सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन ने 1998 के फैसले को ही आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट में सीता सोरेन का पक्ष रखा था| उन्होंने हाल ही में लोकसभा में बसपा सांसद दानिश अली के खिलाफ भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी के अपमानजनक बयान का जिक्र करते हुए कहा कि वोट या भाषण से जुड़ी किसी भी चीज के लिए मुकद्दमे से छूट पूरी तरह होनी चाहिए, भले ही वह रिश्वत हो या साजिश हो| हालांकि मोदी सरकार के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा कि राज्यसभा चुनाव के लिए वोटिंग का सदन की कार्यवाही से कोई संबंध नहीं है, इसलिए राज्यसभा चुनाव में वोटिंग के लिए रिश्वत लेने के खिलाफ सीता सोरेन का मामला कानूनी दायरे में आता है|

बहस के दौरान जब सांसदों और विधायकों को मिले विशेषाधिकार का जिक्र आ गया, तो सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि रिश्वतखोरी को कभी भी अनुच्छेद 105(2) और 194(2) के तहत छूट के दायरे में नहीं लाया जा सकता, अपराध भले ही संसद या विधानसभा में दिए गए भाषण या वोटिंग से जुड़ा हो, उसे सदन के बाहर अंजाम दिया जाता है|

इस तरह मोदी सरकार ने 1998 के फैसले को फिर से खोलने का आग्रह कर दिया| 20 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमेबाजी से छूट वाले 1998 के फैसले पर फिर से विचार करने पर सहमति प्रकट की और मामला सात जजों की बेंच को सौंप दिया था| सात जजों की बेंच ने सुनवाई के बाद 23 अक्टूबर 2023 को फैसला सुरक्षित रख लिया था|

चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली सात जजों की बेंच का यह साझा फैसला है, जिसका सीधा असर अब झारखंड मुक्ति मोर्चा की विधायक सीता सोरेन पर पड़ेगा| जबकि उनके देवर हेमंत सोरेन को जब पिछले महीने गिरफ्तार किया गया, तो सीता सोरेन मुख्यमंत्री बनने पर अड़ गई थी| कोर्ट ने साफ किया कि कोई भी विधायक अगर रुपए लेकर सवाल पूछता है या रुपए लेकर किसी को वोट करता है (राज्यसभा चुनाव में) तब उसे कोई संरक्षण नहीं मिलेगा, न ही उसे कोई प्रोटोकॉल मिलेगा बल्कि उसके खिलाफ भ्रष्टाचार का मुकदमा चलेगा|

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पैसे लेकर सवाल पूछना और वोट करना संसदीय लोकतंत्र के लिए जहर जैसा है। यह संसदीय लोकतंत्र के लिए कैंसर है और इसलिए इसे रोकना बहुत जरूरी है| इस तरह अब भविष्य में पैसा लेकर संसद में कुछ भी करने पर कोई इम्युनिटी नहीं होगी| जिस तरह अपराधी के खिलाफ केस चलता है, वैसे ही सासंद के खिलाफ भी केस चलेगा|

फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस डी.वाई. चन्द्रचूड ने कहा- "अगर कोई घूस लेता है तो केस बन जाता है। यह मायने नहीं रखता है कि उसने बाद में वोट दिया या फिर स्पीच दी| आरोप तभी बन जाता है, जिस वक्त कोई सांसद या विधायक घूस स्वीकार करता है|"

बेंच ने कहा- संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 सदन के अंदर बहस और विचार-विमर्श का माहौल बनाए रखने के लिए हैं| लेकिन जब कोई सदस्य घूस लेकर सदन में वोट देने या खास तरीके से बोलने के लिए प्रेरित होता है, तो उसे अनुच्छेद 105 या 194 के तहत छूट हासिल नहीं है| इन दोनों अनुच्छेदों के तहत रिश्वतखोरी के लिए संरक्षण की इजाजत नहीं दी जा सकती| इस फैसले के बाद अब यह सवाल तो उठेगा ही कि तब सुप्रीमकोर्ट ने सत्ता का लिहाज क्यों किया था|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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